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पंडितक गप्प ( Panditak gapp ) - खट्टर ककाक तरंग - हरिमोहन झा |

पंडितक गप्प

(खट्टर ककाक तरंग)

लेखक : हरिमोहन झा
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ओहि दिन भुसकौलक बहिरु पंडित कैं खट्टर कका सॅं भिड़न्त भऽ गेलैन्ह । बात ई भेलैक जे पंडितजी छीतनबाबूक ओहि ठाम श्राद्धक नेओत पूरय आयल रहथि । भुटकुनबाबूक मृत्यु पर गप्प चलैत छल । पंडितजी ज्ञानक बात सभ कहऽ लगलथिन्ह – भावी पर ककरो वश नहिं चलैत छैक । हुनका त एखन मरबाक वयस नहि छलैन्ह । परन्तु नाऽकाले म्रियते कश्चित प्राप्तकाले न जीब्रति । जखन काल पूर भऽ जाउक तखन केओ नहिं बाँचि सकैत अछि। और , जा काल नहि पूर्ण होउक ता मरियो नहि सकैत अछि ।

तावत् ठाकुरबाड़ीक पुजेगरी चरणामृत बाँटय एलाह । पंडितजी माथ पर छिटैत श्लोक पढय लगलाह -

           अकालमृत्युहरणं      सर्वव्याधिविनाशनम  ।
           विष्णुपादोदकं  पीत्वा शिरसा धारयाम्यहम ॥

        

एतबहि में कोम्हरो से पहुँचि गेलाह खट्टर कका । ओ अबितहि टोकलथिन्ह - की औ पंडितजी ! अहाँ एखने कहने छलिऎक जे विना काल पूर्ण भेने केओ मरिए नहिं सकैत अछि । तखन फेर 'अकालमृत्युहरणम' किऎक कहैत छिऎक।

पंडितजी एकाएक तेना उलंग पकड़ा गेलाह जे कोनो जवाबे नहिं फुरलैन्हि । गोङियाय लगलाह ।

खट्टर कका हमरा कहलैन्ह – देखै छह ? जखन पंडित लोकनि खंडित भऽ जाइ छथि त एहिना गोंगियाय लगैत छथि ।

हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, हिनका लोकनिक श्लोक में परस्पर-विरोध किऎक रहैत छैन्ह ?

खट्टर कका बजलाह - एकर कारण जे पंडित लोकनि परस्पर-विरोध क प्रेमी होइ छथि। जहिना लोक में, तहिना श्लोक में। तैं हिनका लोकनिक वचन में परस्पर-विरोध रहैत छैन्ह। कहह त फेर देखा दिऔह। [पंडित जी सॅं] की औ पंडितजी ! भावी त सर्वोपरि थीक ?

पंडितजी -अवश्य।

           न भवति यन्न भाव्यं भवति च भाव्यं विनापि यत्नेन।
           करतलगतमपि नश्यति यस्य हि भवितव्यता नास्ति।

        

खट्टर कका- बेस, मानि लिय जे हमरा भावी अछि जे काल्हि मृत्यु भऽ जाएत। आब कह जे लाखो यत्न कैने हम बॉंचि सकैत छी ?

पंडितजी-कथमपि नहिं।

          यद्धात्रा लिखितं ललाटपटले तन्मार्जितुं कः क्षमः।
        

खट्टर कका-और जौं बड़का सॅं बड़का डाक्टर कैं मॅंगाबी ?

पंडितजी-धन्वन्तरिक बापोक ऎने कोनो फल नहिं।

खट्टर कका-और यदि छुटबाक भावी हो, तखन ?

पंडितजी-तखन अनायासे बॉंचि जाएब।

खट्टर कका-तखन त उद्योग करबाक कोनो प्रयोजन नहिं ?

पंडितजी- कनेक कुंठित होइत -नहिं, उद्योग सेहो करबाक चाही।

           उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी-
           दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।
           दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
           यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः।

        

खट्टर कका-[हमरा सॅं] - देखैत छह ? बान्हल लीक पर श्लोकक पहिया कोना गुड़कै त छैन्ह ? परन्तु कनेक लीक सॅं फराक कऽ दिऔन्ह कि गाड़िए उनटि जैतैन्ह । [पंडितजी सॅं] की औ पंडितजी ! एहि वचन सॅं त दैव उड़ि जाइत छथि। त खन भवितव्यता दऽ जे कहने छलिऎक, से ?

पंडितजी-भवितव्यता कैं के काटि सकैत अछि ? तादृशी जायते बुद्धिर्यादृशी भवितव्यता ।

खट्टर कका हमरा कहलन्हि- देखह, ई कोना दूनू पानि मारैत छथुन्ह ?(पंडितजी सॅं ) पंडितजी ! एहि श्लोक सॅं त पुरुषार्थ कटि जाइत अछि ।

पंडितजी - (सशंकित भय) - से कोना ?

खट्टर कका – अहाँ क जेहन भावी रहत तेहने न बुद्धि भऽ जाएत ?

पंडितजी – हॅं ।

खट्टर कका - एकर अर्थ जे अहाँक बुद्धि स्वतंत्र नहिं अछि । और जखन बुद्धिए अपन सक्क नहिं त अपना बुद्धिऍं काज की करब ? तखन पुरुषार्थक की अर्थ?

पंडितजी माथ कुड़ियबय लगलाह । खट्टर कका पुनः कहलथिन्ह - यदि भबितव्यते प्रबल तखन त ककरो उपदेश देव सेहो व्यर्थ थीक ।

पंडितजी - से कोना ?

खट्टर कका – देखू, पंडितजी । यदि कर्ता स्वतंत्र हो तखन ने 'सत्यं वद' ‘धर्मं चर' आदि उपदेशक सार्थकता । परन्तु अहाँ जे श्लोक पढलहुँ तकर आशय बहराइ त अछि जे हमरा लोकनि स्वतंत्र नहिं , प्रयोज्य-कर्ता मात्र छी । तखन विधि-निषेध क की अर्थ ! समुद्राक लहरि कैं केओ आदेश दैत छैक जे तों एहि बाटे चलह ? धनुष सॅं छुटल वाण कैं केओ शिक्षा दैत छैक जे तों एहि गति सॅं चलह ? यदि हमरा लोकनि नियतिक धारा में बहि रहल छी और अपना गति-विधि पर अधिकारे नहिं अछि, तखन 'इदं कर्तव्यम' 'इदं न कर्तव्यम' एहि 'तथ्य' प्रत्ययक की अर्थ ? तखन त 'चाही' शब्दे कोष सॅं उठि जैबाक चाही । एहना स्थिति में पाप-पुण्यक भेद की ? धर्मशास्त्र निरर्थक भऽ जाइछ । की पंडितजी ! अहाँ के ई बात स्वीकार अछि ?

पंडितजी पुनः गोङियाय लगलाह । खट्टर कका रेड़ब शुरू कैलथिन्ह - पंडितजी, हमरा लग लट्ट-पट्ट नहिं चलत । या त भवितव्यता बला श्लोक काटू अथवा धर्मशास्त्र कैं गंगा में विसर्जन करू । दूनू घोडा पर एके संग फानि कऽ चढैत छी, तैं खसि पडैत छी । कोनो एक पर सवार होउ ।

परन्तु पंडितजी कैं दुहू घोड़ा समान रूप सॅं प्रिय छलैन्ह । कोनो एक कैं छोडय नहिं चाहैत छलाह । तैं अक्क-सक्क में पडि गेलाह ।

हम देखल जे पंडितजी घामें-पसीने तर भऽ रहल छथि । ओ बकबका कऽ माटि धयने छथि और खट्टर कका क एहन सन क्रम जे चित्त कइए क छोड़थिन्ह । तैं कोनो दोसर गप्प उठयबाक चाही जाहि सॅं पंडितजी के पलखति होइन्ह । अतएव प्रसंग बदलैत कहलिऎन्ह- पंडितजी, एखन त डॆरा रहतैक ?

पंडितजी कैं उसास भेटि गेलैन्ह । फक्क द निसास छोडैत बजलाह – हॅं । काल्हि धरि त भोज्येक समारोह छैक । परसू हमरा सभ कें विदाइ भेटत ।

हम – पंडितजी, भोज्य त खूब समारोह सॅं भऽ रहल छैक ?

पंडितजी – भला ताहू में कहबाक बात ? तीन दिन सॅं लोक कैं बालूसाहिएक ढेकार भऽ रहल छैक । एहि परोपट्टा में आइधरि एहन मधुरक भोज नहिं भेल छल ।

हम - पंडित लोकनिक विदाइयो त नीक जकाँ करथिन्ह ?

पंडितजी - चाहिऎन्ह त सैह । छीतनबाबू हियबगर लोक छथि । असर्फिए सॅं पिंड कटने छथि । वृषोत्सर्ग सेहो जेहन होमक चाही । शय्यादान में रेशमी तोसक देने छथिन्ह । चालिस हजारक चिट्ठा छैन्ह । तखन जौं पंडित सभ कैं दोसाला नहिं देथिन्ह त लोक की कहतैन्ह ?

हम – भुटकुनबाबू छलाहो तेहने एकबाली !

पंडितजी – अहा हा ! दाता कर्णे बूझू । एहन लोक की आब फेर हैत ? ओ निश्चय कोनो राजा-महराजा घर में जन्म नेने हैताह । जेहन यशस्वी ओ छलाह तेहने श्राद्ध भऽ रहल छैन्ह । स्वर्गो सॅं देखि पुलकित होइत हैताह । प्रेतक निमित्त जे चौदहमासी थारी-बाटी लोटा-गिलास उत्सर्ग भेल छैन्ह से सभटा चानीएक। पुरोहित-महापात्र सभ नेहाल भऽ गेलाह । भगवान भुटकुनबाबूक आत्मा कैं शान्ति प्रदान करथुन्ह ।

खट्टर कका एती काल धरि चुपचाप सुनैत छलाह । आब नहिं रहल गेलैन्ह । बजलाह – अयॅं औ पंडितजी ! अहाँ तीन रंगक बात किएक बजैत छी ? एक रंगक बात बाजू ।

पंडितजी - हम तीन रंगक बात कोना बजैत छी ?

खट्टर कका – अहाँ कैं की विश्वास अछि ? छीतनबाबूक पितर स्वर्गलोक में छथिन्ह ? अथवा प्रेतयोनि में ? अथवा पुनर्जन्म ग्रहण कैने ? तीनू बात त एक संगे नहि भऽ सकैत अछि

आब पंडितजी फेर गोंगियाय लगलाह । खट्टर कका कहलथिन्ह – अहाँ स्वयं ज्ञान क योग दऽ कऽ देखिऔक । जौं भुटकुन बाबू सरिपहुँ ग्रहण कैने हैताह त छठियार वा बरही भेल हेतैन्ह । चेंहो-चेंहो करैत दूध पिबैत होयताह । छौ मासक बाद जा कऽ अन्नप्राशन हैतैन्ह गऽ ! तखन भातक पिंड हुनका कोना पैठ हैतैन्ह ? और यदि ओ स्वर्ग लोक में विहार करैत हैताह तखन ओहिठामक 'अमृतोदक' छोडि एहिठामक हस्तोदक पीबय किऎक औताह ? और यदि ओ प्रेतलोक में भटकैत होथि त हुनका निमित्त छाता जूता किऎक उत्सर्ग करौलिऎन्ह अछि ? कि प्रेतगण पनही पहिरि कऽ चलैत छथि ?

पंडितजी कैं निरुत्तर देखि खट्टर कका बजलाह –औ पंडितजी ! अनका परतारिऔक परन्तु खट्टर झा नहिं मानताह । ई सभटा प्रपंच अहीं लोकनिक पसारल अछि । केवल लेबक हेतु । लोभीक गाम में ठक्क उपास नहिं पडय । से यावत पर्यन्त एहि देश में छीतन बाबू सन-सन स्वर्गकाम व्यक्ति जिबैत छथि तावत अहाँ सन-सन पंडित कैं बालूसाहिक ढेकार होइते रहतैन्ह । परन्तु आब अधिक दिन नहिं चलत से कहि दैत छी ।

पण्डितजी खिसिया कऽ बजलाह – अहाँ चार्वाक जकाँ बजैत छी । आत्मा कैं नहिं मानैत छी । तैं एना कहै छी ।

खट्टर कका पुछलथिन्ह - ‘आत्मा' अहाँ ककरा कहैत छिऎक ?

पंडितजी शास्त्रार्थक मुद्रा में बाजय लगलाह – शरीर, इन्द्रिय, मन , बुद्धि - सभ सॅं पर जे सत-चित-आनन्द स्वरुप छथि ? सैह आत्मा थिकथि ।

खट्टर कका – आत्मा कहियो दुःखितो पडैत छथि ? हुनका कोनो आधि-व्याधि , मामिला-मोकदमा, ॠण पैंच - कथुक चिन्तो रहैत छैन्ह ?

पंडितजी - कथमपि नहिं । आत्मा नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त आनन्द स्वरूप थिकाह । हुनका में शरीर वा मनक धर्म आरोप करब अनर्गल थीक ।

आब खट्टर कका पुनः गसिया कऽ धैलथिन्ह – औ पण्डितजी ! जखन आत्मा स्वतः आनन्द स्वरूप थिकाह तखन अहाँ ई किऎक कहलिऎक जे भगवान भुटकुनबाबूक आत्मा कैं शान्ति प्रदान करथुन्ह ? भुटकुनबाबूक आत्माकैं कि खैंक गड़ल छैन्ह ?

हम देखल जे पण्डितजी पुनः खट्टर कका क चपेट में आबि गेलाह । खट्टर कका तेना न घेरि लैत छथिन्ह जे बेचारे सकपंज भऽ जाइ छथि ।

पण्डितजी क्रोध सॅं फों-फों करय लगलाह । पुनः वीरासन लगवैत बजलाह - अहाँ हमरा सॅं कठ-विवाद करैत छी ? बेस, तखन लियऽ । जखन अहाँ सपरि कऽ ढूह लड़क हेतु आएल छी त हमहूँ फाँड़ भिड़ि कऽ तैयार छी । आइ भइए जाय ।

खट्टर कका हमरा कहलन्हि - देखह, आब केहन धुरपटांग होइत अछि !

पण्डितजीक पूर्वपक्ष सुरु भेलैन्ह – औ खट्टर झा ! पहिने ई कहू जे अहाँ सन्ध्या-गायत्री जपैत छी ?

खट्टर कका उत्तर देलथिन्ह – सन्ध्या-गायत्री हुनका लेल छैन्ह जे पापी ओ मंदबुद्धि होथि ।

पण्डितजी उत्तेजित होइत पुछलथिन्ह - से कोना ?

खट्टर कका शान्त भाव सॅं कहलथिन्ह – देखू 'अघमर्षण' सूक्तक अर्थे छैक पाप छोड़ाबय बला मंत्र । और गायत्री मंत्रक अभिप्राय छैक बुद्धिक हेतु प्रार्थना (धियो यो नः प्रचोदयात) । अतएव जे पाप कैने होथि वा 'धी' (बुद्धि) कें प्रचोदित (प्रेरित) कराबय चाहथि से संध्या-गायत्री करथु ।

पंडितजी तामसे भेर भऽ गेलाह । थरथर कपैत पुछलथिन्ह – अहाँ भोजन-काल भगवानक हेतु नैवेद्य दैत छी ?

खट्टर कका शान्त भाव सॅं उत्तर देलथिन्ह - हम अपने थारी में खायब और हुनका लेल नीचाँ में दू टा भात छीटि देबैन्ह, एहन अपमान नहिं कऽ सकैत छिऎन्हि । भगवान कोनो कुकुर-बिलाड़ि नहिं छथि जे ओहि तरहें कौरा देल जएतैन्ह ।

पण्डितजी क्रुद्ध होइत पुछलथिन्ह – अहांँ चन्दन करैत छी ?

खट्टर कका अविचलित भाव सॅं उत्तर देलथिन्ह - प्राचीन काल में भोगाविलाषिणी युवती स्तन में चन्दन करैत छलीह और भोज्याभिलाषी ब्राह्मण ललाट में । आब केओ भोज्ये नहिं खोअबैत अछि त चंदन कथीपर करू ? यदि हमरो बालूसाहीक नेओत पड़य त चंदन कऽ सकैत छी । परन्तु हमरा त केओ पंडित में मोजरे नहि करैत अछि ।

हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, अहाँ त पंडित-पछाड़ छी । पंडित लोकनि अहाँक डरे छीह कटने भेल फिरैत छथि ।

खट्टर कका बजलाह – हौ, हमरा पंडितबला असलीए गुण नहिं अछि । टीङ ठोप नहिं करय अबैत अछि । अर्घी-सराइ ओ घंटीक टंट-घंट नहिं रखैत छी। चारि घंटा बैसि कऽ नाक दाबल पार नहिं लगैत अछि । आडम्बर पसारय नहिं अबैत अछि । दरबार करबाक लूरि नहिं अछि । नहिं त हमरा कि लड्डू-जिलेवी सॅं अरुचि रहै अछि ?

पंडितजी बजलाह - जे ब्राह्मणक कर्मे नहिं करत तकरा नेओत कोना भेटतैक ?

           न तिष्ठति  तु यः  पूर्वां नोपास्ते  यश्च पश्चिमाम  ।
           स  शूद्रवद्धहिष्कार्यः   सर्वस्मादद्विजकर्मणः     ॥

        

अहाँ सूर्योपस्थान करैत छी ?

खट्टर कका कहलथिन्ह –बिना सूर्योपस्थान कैने कि जिलेबी कंठ में अटकि जाइ छैक ?

पंडितजी तमसाइत बजलाह – ई शुष्क विवाद थीक । एतबा काल श्राद्धस्थला में शास्त्रार्थ करितहुँ त विदाइ भेटैत । अहाँ सॅं की भेटत ? केरा ? एही- ठाम एकटा छीतन बाबू छथि जे पंडितक एतेक सत्कार करैत छथि । और एक अहाँ छी जें पंडितक निन्दा करैत छी । कि पंडित अहाँ लेखें बड्ड अधलाह होइ छथि ?

खट्टर कका विनयपूर्वक कहलथिन्ह - सभ पण्डितक विषय में त नहिं कहि सकैत छी । परन्तु किछु पण्डित में ई सात टा लक्षण घटित होइ छैन्ह -

           लोभी  क्रोधी  तथाऽधीरः  स्त्रैणः  कृपण एव च ।
           निन्दकश्चाटुकारश्च   पण्डितः    सप्तलक्षणः      ॥

        

से जे जेहन भारी पण्डित तेहने लोभी, तेहने खिसियाह, तेहने अगुताह, तेहने कृपण, तेहने निन्दक, ओ तेहने खुसामदी ।

पण्डितजी कचकचाइत बजलाह – अहाँ भारी निन्दक छी ।

खट्टर कका शान्त भाव सॅं बजलाह - एकर कारण जे हमहुँ संस्कृत पढने छी

पंडितजी - संस्कृत ओ परनिन्दा में की सम्बन्ध ?

खट्टर कका - अव्यभिचरित सम्बन्ध। कोनो पण्डित एहन छथि जिनका अनकर नि न्दा वेत्रेक पेटक अन्न पचैत होइन्ह ?

हम पुछलिऎन्ह- खट्टर कका, ई बात यथार्थ। परन्तु एकर कारण की ?

खट्टर कका बिहुँसि उठलाह। पुनः बजलाह- कारण ई जे जैखन केओ संस्कृ त प्रारम्भ करैत छथि तैखन सीखि जाइत छथि जे 'हम' उत्तम पुरुष, 'तों' मध्य म पुरूष, और सभ केओ 'अन्य' अर्थात 'अधम पुरुष'। 'उत्तम' ओ 'मध्यम' क अनन्तर त 'अधमे' कोटि होइ छैक। तैं संसार भरिक लोक हुनका दृष्टि में 'अध म' बूझि पड़ैत छैन्ह।

हम- वाह ! ई त एक लाखक गप्प कहल।

खट्टर कका-तखन खट्टर-पुराणक एकटा और श्लोक सुनि लैह-

           मधुरेषु महाप्रीतिः श्रृंगाररसचिन्तनम।
           परोपदेशे पाण्डित्यं पण्डितस्य त्रयोगुणाः॥

        

हम- खट्टर कका, पण्डित लोकनि अनका एक प्रकारक उपदेश दैत छथिन्ह और स्वयं दोसरा प्रकारक आचरण करैत छथि। एकर की कारण ?

खट्टर कका-एकरो कारण व्याकरणे। संस्कृत भाषा में पहिनहि क्रियाक भेद कऽ देल गेल छैक। 'परस्मैपद' एक रंग, ओ 'आत्मनेपद' दोसर रंग। एही अभ्यासक कार णे पण्डित लोकनि क्रिया मात्र में 'परस्मै' (दोसराक हेतु) ओ 'आत्मने'(अपना हेतु) क भेद करैत छथि।

हम- खट्टर कका, इहो लाख टकाक गप्प भेल। राजा भोज रहितथि त एहन-एहन बात पर अशर्फी उझीलि दितथि।

खट्टर कका-हौ, हमरा त बर्फीओ उझिलयबला गुणग्राहक नहिं भेटैत छथि। छुच्छ प्रशंसा जतेक लियऽ।

हम- खट्टर कका, हमरा त ओतबा अछिऎ नहिं जे अहाँक बातक मूल्य दऽ सकी । परन्तु एकटा ई त कहू जे पण्डित लोकनि लोभी किऎक होइ छथि ?

खट्टर कका मुसकुराइत बजलाह – हौ, जनिका बाल्यावस्थहि सॅं एकटा, दूटा नहिं, दस-दस टा 'लकार' कंठस्थ करा देल जाइन्ह, तनिका जौं 'ल' अक्षरक संस्कार नहिं हेतैन्ह त कि 'द' अक्षरक हैतैन्ह ? एही द्वारे पंडित लोकनि लेबा में प्रवीण होइ छथि , देबा मे कृपण ।

हम - खट्टर कका, अहाँ त सभटा चमत्कारे बजैत छी । तखन ई कहू जे पण्डित लोकनि एतेक रसिक किऎक होइ छथि ?

खट्टर कका बिहुँसैत बजलाह – एकटा कारण त यैह जे ओ वाल्यावस्थहि सॅं 'मनोरमा-कुचमर्दन' क अभ्यास करैत छथि, गुरु ओहि में परीक्षो लैत छथि न्ह । आन कोनो भाषा में एहन पाठ्यग्रन्थ भेटतौह ?

हम - धन्य छी खट्टर कका । तेहन-तेहन मौलिक गप्प कहैत छिऎक जे किनको ध्यान में नहिं आयल हेतैन्ह । तखन ई कहू जे पण्डित लोकनि अपना बुद्धि सॅं किछु सोचि कऽ नव अविष्कार किऎक नहिं करैत छथि ?

खट्टर कका - एकर कारण हम एक बेर कहने छिऔह । प्रारम्भहि सॅं लघुकौमदी में अहं वरदराज भट्टाचार्यः, अहं वरदराज भट्टाचार्यः ......

बहिरू पण्डित कैं त सभ किछु सुनाइ नहि पडलैन्ह, परन्तु सारांश बुझा गेलैन्ह । बजलाह – अहाँ लोकनि एतीकाल सॅं पण्डितक उपहास करैत छी ? परन्तु पण्डित बिना कोनो काज नहिं चलि सकैत अछि ।

खट्टर कका बजलाह - जे असली पण्डित छथि , तिनका हम थोडे किछु कहैत छिऎन्ह ? जे नकली पण्डित छथि तिनके पोल खोलबाक हेतु खट्टर झाक जन्म भेल छैन्ह ।

पंडितजी – असली ओ नकली पण्डित में अहाँ कोना भेद करैत छी ?

खट्टर कका – असली पण्डित विद्या क अन्वेषण में रहैत छथि, नकली पंडित विदाइ क अन्वेषण में । असली पंडित ज्ञानक विस्तार करैत छथि, नकली पंडित धोधिक विस्तार । असली पंडित मूर्खताक संहार करैत छथि, नकली पंडित केवल मधुरक संहार ।

एतबहि में छीतनबाबूक ओहि ठाम सॅं एक चङ्गेरा मधुर पंडितजी कैं आवि गेलैन्ह । ओ फुरफुरा कऽ उठि गेलाह ।

 

 

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