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आयुर्वेद ( Ayurved) - खट्टर ककाक तरंग - हरिमोहन झा |

आयुर्वेद

(खट्टर ककाक तरंग)

लेखक : हरिमोहन झा
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खट्टर कका भाङ्ग धोइत रहथि। हमरा संग एक व्यक्ति कैं देखि पुछ्लथिन्ह - ई के थिकाह ?

हम कहलिएन्ह - ई थिकाह वैद्यजी ।

खट्टर कका हुनका हाथ में एक पुस्तक देखि पुछलथिन्ह – ई कोन पोथी थीक ?

वैद्यजी - भावप्रकाश ।

खट्टर कका - अहा, की सुन्दर काव्य थीक - भावप्रकाश !

वैद्यजी विस्मित होइत बजलाह - भावप्रकाश आयुर्वेदक प्रामाणिक ग्रन्थ थिकैक। तकरा अपने काव्य कहैत छिएक ?

हम पुछलिऎन्ह - खट्टर कका, आहॅं। कैं भाङ्ग त ने लागल अछि ।

खट्टर कका भांग क पानि पसवैत बजलाह - भाङ्ग त हमरा सदिखन लगले रहैत अछि । नहिं त गोनूझा क भिन्ने बथान किएक रहैत ? हमरा त आयुर्वेदो काव्ये बुझना जाइत अछि ।

हम - से कोना ?

खट्टर कका (वैद्य सॅं ) कहू त ज्वरक उत्पत्ति ?

वैद्य -

‘ दक्षापमानसंक्रुद्धः रुद्रनिःश्वाससंभवः '

 

अर्थात जखन दक्ष प्रजापतिक ओहि ठाम महादेवजीक अपमान भेलैन्ह तखन जे ओ खिसियाकऽ फुफकार छोडलन्हि, ताहि फुफकार सॅं जे रोग उत्पन्न भेल सैह ज्वर थीक ।

खट्टर कका (हमरा सॅं) - आब कहह। कोनो डाक्टर क मगज में एहन बात आबि सकैत छैन्ह ? एही द्वारे हम आयुर्वेद कैं काव्य कहैत छिऎक ।

वैद्य - परन्तु आयुर्वेद में जे एतेक द्रव्य-गुण क विवेचना भरल छैक ?

खट्टर कका – ताहू में वैह अलंकार । कहू त, पारा की थिकैक ?

वैद्य -

“शिवाङ्गात् प्रच्युतं रेतः पतितं धरणीतले" ।

 

शिवजी क धातु पृथ्वी पर खसि पडलैन्ह, सैह पारा थीक ।

खट्टर कका – तैं उज्जर ! तैं चिक्कन ! तैं रसराज। और गन्धक की थिक ?

 

“ श्वेतद्वीपे पुरा देव्याः क्रीडन्त्याः रजसाप्लुत ।

दुकूलं तेन वस्त्रेण स्नातायाः क्षीरनीरधौ ।

प्रसृतं तद्रजस्तस्माद गन्धकः समुदीरितः । ”

 

अर्थात् एक समय श्वेतद्विप में क्रीडा करैत-करैत देवी स्खलित भऽ गेलीह। तखन जाकऽ क्षीर समुद्र में स्नान कैलन्हि । ओहि मे नूआ सॅं धोखरि कऽ जे रज खसलैन्ह, सैह गन्धक थिक ।

खट्टर कका – तैं ललौन ! तैं गन्धयुक्त ! तैं ओकरे टा में पारद कैं शोधबाक सामर्थ्य । की औ वैद्यजी ! (हमरा दिस ताकि) कहह ,एहन सरस कल्पना कोनो साइंस (विज्ञान) में भेटि सकैत छौह ?

हम - वास्तव में खट्टर कका ! आब त हमरो बुझि पडैत अछि । आयुर्वेद में एहि तरहक बात कोना ऎलैक ?

खट्टर कका –हौ, एहि देशक जलवायुक कण-कण में रसिकता सन्हियाएल छैक। जहाँ विज्ञान कनेक माथ उठौलक कि तुरन्त कविता-कामिनी आबि कऽ छाती पर सवार भऽ जाइत छथिन्ह। बूझह त अपना देशक विज्ञान कैं खा गेल काव्य । 'काव्येन गिलितं शास्त्रम् ।' आयुर्वेद कैं काव्य तेना भऽ कऽ ग्रसित कैने छैक जे भावप्रकाश ओ भामिनी-विलास में विशेष अन्तर नहि। एही द्वारें हम वैद्य लोकनि कैं कवि कहैत छिऎन्ह । कवियो मे साधारण कवि नहि, कविराज !

हम – वाह ! खट्टर कका । ई त नवीने कहल । वैद्य कैं कविराज किएक कही से हमरा नहि भैटैत छल ।

खट्टर कका - हमरा सॅं त सभटा नवीने सुनबह । महादेव कैं वैद्यनाथ किएक कहल जाइ छैन्ह से जनैत छह ?

हम – नहिं ।

खट्टर कका - तखन सुनह । महादेवक श्वास स ज्वर बहरायल जाहि सॅं वैद्य लोकनि क जीविका चलैत छैन्ह। हुनके धातु सॅं पारा बहराएल जाहि सॅं वैद्य लोकनि मकरध्वज बनवैत छथि । हुनके बूटी (भांग) सॅं वैद्य लोकनि मदनानन्द मोदक बना रुपया मे तीन अठन्नी बनवैत छथि । तखन महादेव जौं वैद्यनाथ नहि कहबथि, त के बैद्यनाथ कहाबय ?

हम- धन्य छी खट्टर कका ।

खट्टर कका – हौ, बूझह त बैद्यो एक प्रकारक महादेवे होइ छथि । हुनके जकां भस्म क प्रेमी । बूटी क पाछां बेहाल । हुनका कंठ में विष छैन्ह, हिनका पुडिया में विष रहैत छैन्ह। दूनू , हर वा संहारकर्ता। ओ भस्मासुरक संहार कैलन्हि, इहो भस्मक रोग क संहार करैत छथि । ओ त्रिपुर क अन्त कैलन्हि, ई कतेक पुर क; अन्त करै छथि, से नहि जानि ।

वैद्यजी खिसियाकऽ बजलाह - परन्तु वैद्य रक्षो त करैत छथि । आयुर्वेद में एक सॅं एक चमत्कारी रस भरल छैक ।

खट्टर कका - सभ सॅं बाढि श्रृंगार रस ।

हम – ऎं ! आयुर्वेद में श्रृंगार रस !

खट्टर कका - किछु एहन-ओहन ? भरि ठेहुन। की औ वैद्यजी ! लोलिम्बराज धाह क केहन रसगर उपचार देखवैत छथि !

 

“हारावलीचंदनशीतलानां सुगन्धपुष्पाम्बरशोभितानाम ।

नितम्बिनीनां सुपयोधराणामालिङ्गनान्यशु हरन्ति दाहम ॥”

 

और सूनू-

 

“जघनचक्रचलन्मणिमेखला सरसचन्दनचन्द्रविलेपना ।

वनलतेव तनुं परिवेष्टयेत् प्रबलदाहनिपीडितमङ्गना ॥”

 

हम - खट्टर कका , कनेक अर्थो बुझाकऽ कहियौक ।

खट्टर कका - तों भातिज थिकाह । बेशी खोलिकऽ कोना कहिऔह? आशय त बुझिए गेल हैभक। आब कहह एहि रसिकताक धार कैं की नाम देबक चाही ? चिकित्साशास्त्र अथवा कोकशास्त्र ?

वैद्य - परन्तु आन रोगक एहन उपचार देखाउ त ?

खट्टर कका - महाराज ! घबराइ छी कियेक? सर्दिओ क उपचार तेहने छैक । भावप्रकाश में देखियौक -

 

तं स्तनाभ्यां सुपीनाभ्यां पीवरोरुर्नितम्बिनी।

युवतिर्गाढमालिंगेत् तेन शीतं प्रशाम्यति ॥

 

विशेषण सभ देखैत छियैक ? एहन उपचार कोनो डाक्टरी ग्रन्थ में भेटत? जाडो युवती ! गर्मो में युवती ! ई युवती की भेलीह ? चाहक प्याली भेलीह औ महाराज ! जखन युवतियो औषधे वर्ग मे छथि तखन और-और दवाइ क संग हुनको आलमारी में किएक नहि रखैत छिऎन्ह ?

हम - खट्टर कका एहन-एहन नुसखा आयुर्वेद में कोना आबि गेलैक ?

खट्टर कका भांगक पत्ती छनैत बजलाह – हौ, बात ई छैक जे आयुर्वेद मुख्यतः राजा लोकनिक हेतु बनल अछि , जनिक एकमात्र व्यायाम छलैन्ह नखछ्त करब । मन कैं उत्तेजना देबय पर कवि रहथिन्ह, तन कैं उत्तेजना देबय पर कविराज । एक रस द्वारा दोसर रसायन द्वारा । काव्य और आयुर्वेद , दुहू मसियौत एक्के दरबार मे पोसायल अछि । तैं जैह रंग जगन्नाथराज पर छैन्ह , सैह लोलिम्बराज पर । कालिदास क ऋतुसंहार पढह वा सुश्रुत क ऋतुचर्या - एके बात थीक ।

वैद्य - से कोना ?

खट्टर कका – देखू -

 

“कस्तूरीवरकुंकुमागरुयुतामुष्णाम्बुशौचं तथा ।

स्निग्धं स्त्रीषु सुखं गुरुष्णवसनं सेवेत हेमन्तके ॥”

 

ई हेमन्तचर्या ककरा हेतु छैक ? जे केसर-कस्तूरी-चर्चित कामिनि क झुंड स घेरल रहय । हमरा सबहक हेतु त 'अग्रहणे' नाम सार्थक। आयुर्वेद राजा-महाराज क वस्तु थिकैक । ऋतुचर्या क अर्थ जे कोन समय में कोन रूपें भोग करी ।

वैद्य - एकर अभिप्राय छैक जे भोग कैं मर्यादाक सीमा में राखल जाय।

खट्टर कका सोंटा कुंडी कैं धोइत बजलाह – एही सीमा लऽ कऽ त आचा र्य लोकनि में घोघाउजि मचैत छैन्ह । एक गोटा कहैत छथि -

 

‘त्रिभिस्त्रिंभिरहोभिर्हि रमयेत प्रमदां नरः ।'

 

अर्थात् तीन-तीन दिन पर रमण करबाक चाही । दोसर आचार्य कैं एतबा सॅं सन्तोष नहिं । कहै छथि-

 

‘प्रकामं तु निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ।'

 

जाड्काला में कोन हिसाब-किताब ! जतेक मन हो ततेक बेर रमण करी। तेसर आचार्य हुनको सॅं टपैत छथि -

 

नित्यं बाला सेव्यमाना नित्यं वर्धयते बलम ।

 

जाडकाला की और गर्मी की ? प्रति दिन बाला क सेवन करक चाही । चारिम आचार्य समयो क तालिका बना दैत छथि -

 

“शीते रात्रौ दिवा ग्रीष्मे बसन्ते तु दिवानिशि ।

वर्षासु वारिदध्वान्ते शरत्सु सरसस्मरः ॥”

 

जाड क राति मे, गर्मीक दिन में , वसन्त ॠतु में राति वा दिन कोनो बेर, वर्षाऋतु में जखन मेघक गर्जन हो, शरद ऋतु में जैखन इच्छा हो, तैखन रमण कर्त्तव्य थिक ।

पञ्चम आचार्य हुनको सॅं वेशी गुरुघंटाल बहराइत छथि-

 

‘निदाघशरदोर्बाला हिता विषयिणां मता ।

तरुणी शीतसमये प्रौढा वर्षावसन्तयोः ॥'

 

गर्मी ओ शरद मे बाला (१६ वर्ष धरि ), जाडकाला मे तरुणी (३२ वर्ष पर्यन्त ), और वर्षा तथा वसन्त ऋतु में प्रौढा (३२ वर्ष सॅं उपरबाली ), पथ्य होइत छथि । आब ई तीन-तीन टा 'सेट' प्रति वर्ष राखल जाय तखन ने ऋतुचर्या क पालन हो । ई केवल राजा- महाराज क हेतु संभव छैन्ह । तैं हम कहैत छिऔह जे आयुर्वेद रोगशास्त्र नहि, भोगशास्त्र थीक। बूझह त आयुर्वेदक जन्मे एही निमित्त भेल छैक ।

वैद्य - अपने जे ई कहैछी तकर की प्रमाण ?

खट्टर कका – प्रमाण आयुर्वेद क इतिहासे ।

 

‘भार्गवश्यच्वनः कामी वृद्धः सन् विकृतिं गतः ।

वीर्यवर्णस्वरोपेतः कृतोश्विभ्यां पुनर्युवा ॥'

 

जखन वृद्ध च्यवन भोग करबा में असमर्थ भऽ गेलाह तखन आदि वैद्य अश्विनीकुमार रसायन क जोर सॅं हुनका पुनः युवा बना देलथिन । जेना जेना आदि कवि कैं क्रौंच पक्षीक मैथुनेच्छा सॅं काव्यक प्रेरणा भेटलैन्ह , तहिना आदि वैद्य कैं वृद्ध मुनिक भोग-तृष्णा सॅं आयुर्वेद क प्रेरणा भेटलैन्ह । एक अनुष्टुप छन्द क अविष्कार कैलन्हि, दोसर च्यवनप्राश क । तहिया सॅं आयुर्वेद क विकास एही दृष्टिऍंं होमय लागल जे रतिमल्लताक संग्राम में राजा क विजयपताका फहराइत रहैन्ह।राजाक ध्वजा भंग नहि होइन्ह से देखबा पर राजमंत्री रहथिन्ह, ध्वज-भंग नहिं होइन्ह से देखवा पर राजवैद्य रहथिन्ह ।

हमरा मुसकुराइत देखि खट्टर कका बजलाह – हॅंसी नहि करैत छिऔह । राजा लोकनि कैं जीवन में दुइएटा वस्तु सॅं प्रयोजन रहैन्ह । आहार ओ विहार । तैं वैद्य लोकनि बूझह त दुइएटा वस्तु बनाबय पर रहथि - पाचक की मोदक । भोजन-शक्ति कैं उद्दीप्त करबाक हेतु क्षुधाग्नि-संदीपन । भोग- शक्ति कैं उद्दीप्त करबाक हेतु कामाग्नि-संदीपन। तेसर वस्तु सॅं प्रयोजने की? ओ लोकनि निश्चिन्त भय कुमारिकासव पान कैल करथि ।

खट्टर कका भांग घोटैत बजलाह – हौ, राजा लोकनि कैं एतबे त काजे रहैन्ह। नित्यप्रति वैह दिनचर्या। कहाँ धरि सकताह? तैं बेचारे वैद्य लोकनि राति-दिन वाजीकरण क पाछाँ बेहाल रहथि । एक सॅं एक स्तम्भनवटी , वानरी गुटिका, कामिनी-विद्रावण `````` एही बात क 'रिसर्च' में समस्त बुद्धि खर्च होमय लागल ।

हम – की औ वैद्यजी ! अपने नहिं किछु बजैत छी !

खट्टर कका - बजताह की ? हिनको त वैह सभ रटाओल गेल छैन्ह । एक आचार्य केहन खीर बनौने छथिन्ह जे -

 

‘भुक्त्वा हृष्यति जीर्णोपि दश दारान् ब्रजत्यपि ।'

 

वृद्धो खाथि त दश टा प्रमदा क मानमर्दन कऽ सकथि। दोसर आचार्य तेहन चूर्ण बनबैत छतिन्ह जे -

 

‘एतत्समेतं मधुनावलीढं , रामाशतं सेवयतीव षष्ढः ।'

 

नपुंसको फांकि जाथि त एक सै कामिनी क दर्प चूर्ण कऽ सकथि - द्रव्योगुण क जे अनुसंधान भेल अछि से मुख्यतः एहि दृष्टि सॅं । देखह , निघंटुकार अबरख दऽ की कहैत छथि -

 

'तारुण्याढ्यं रमयति शतं योषितां नित्यमेव ।'

 

अर्थात एकरा जोर सॅं नित्य एक सै स्त्री सॅं संभोग कैल जा सकैत अछि! जेना स्त्री क भोगे जीवनक चरम लक्ष्य होइक और तकरे साधन उपयोगिता क मानदंड ! कनेक विचारि कऽ देखह , जे नित्य एक सै बेर भोग करत से दोसर काज कोन बेर करत ? ओ ठहरत कतेक दिन ? तैं राजा लोकनि कैं तुरन्त क्षय धऽ लैन्ह, और वैद्य लोकनि ओकरा कहथिन्ह राजरोग ! आब तोंही कहह, एहन शास्त्र कैं आयुर्वेद कहक चाही अथवा आयुर्भेद ?

वैद्य - परन्तु आनो आन रोग क निदान ओ चिकित्सा त आयुर्वेद में छैक।

खट्टर कका - छैक ! परन्तु ताहू तेहन-तेहन मुरखाहा टोना भरल छैक जे चिकित्सा में विचिकित्सा(संशय) भऽ जाइत छैक ।

वैद्य - से कोना ? एकोटा दृष्टान्त दिय ।

खट्टर कका भांग में सौफ-मरीच दैत बजलाह – वन्ध्यारोग क चिकित्सा लिय -

 

‘पुष्योद्धृतं लक्ष्मणायाः मूलं दुग्धेन कन्यया ।

पिष्टं पीत्वा ऋतुस्नाता गर्भ धत्ते न संशयः ॥”

 

ऋतुस्नाता स्त्री पुष्य नक्षत्र में उखाडल जडि कैं कुमारि कन्या सॅं दूध में पिसबाकऽ पिबथि त निश्चय गर्भ धारण करथि , ताहि मे सन्देह नहि । आचार्य कैं सन्देह नहि छैन्ह , परंच हमरा अवश्य अछि। प्रथम प्रश्न त ई उठैत अछि जे गर्भ धारण करैबाक शक्ति कथी में छैक ? लक्ष्मणा क जडि में ? अथवा पुष्य नक्षत्र में ? अथवा कुमारि कन्या क हाथ में ? अथवा तीनूक योग में ? एहि प्रयोग कैं वैद्यक कही ? वा ज्योतिष ? अथवा तंत्र ? अथवा तीनूक खिचडि ?

वैद्य - परन्तु एहनो-एहनो उपचार त छैक , जाहि में नक्षत्र क बन्धन नहि छैक ?

खट्टर कका  - हॅं छैक ! जेना -

 

पत्रमेकं पलाशस्य पिष्ट्वा दुग्धेन गर्भिणी ।

पीत्वा पुत्रमवाप्नोति वीर्यवन्तं न संशयः ॥

 

पलाश क एकटा पात दूध मे पीसि कऽ पीवि लेला उत्तर गर्भिणी कैं निश्च य पुत्रे होइन्ह , सेहो साधारण नहि बलवान् ! औ, हम कहैत छी, जौं बलवान पुत्र क प्राप्ति एतेक सुगम छैक त डंका पीटि कऽ प्रचार करु जे ई भारतवर्ष क अविष्कार थीक और सम्पूर्ण संसार में एहि वस्तु कैं खिरा कय देशक गौरव बढाउ। और यदि ई फूसि थीक त आइये एहि वचन कैं काटि कऽ आयुर्वेद सॅं बाहर करु। एहन-एहन मूर्खता,पाखंड ओ धुर्तताबला बात जौं आयुर्वेद में भरल रहत , त कोन वैज्ञानिक एकर आदर कऽ सकैत अछि ?

क्रोध सॅं खट्टर कका क आंखि लाल भऽ गेलैन्ह । ओ जोर सॅं भांग रगरय लगलाह । थोडेक काल में गोला तैयार भऽ गेलैन्ह ।

हम हुनका शान्त करबाक उद्येश्य सॅं कहलिऎन्ह – खट्टर कका! ठीक कहै छी । एहि देश में अन्धपरम्परा बड्ड छैक । कोनो शास्त्र बनल की तुरन्त क्षेपक क भरमार लागि जाइत छैक । जकरा मन में ऎलैक से दूटा श्लोक जोडि कऽ घुसिया देलक । और वैह कालक्रमे प्रमाण बनि जाइत अछि ।

खट्टर कका लोटा में अङ्गपोछा लगा भांग घोरैत बजलाह - से नहि होय तैक त आयुर्वेद कऽ प्रामाणिक ग्रन्थ में कतहु एहन-एहन श्लोक पाओल जाइत ?

 

‘कृष्णवर्णाश्वपुच्छस्य सप्तकेशेन वेणिका ।

तां बध्वा च गले दन्तकड्मडीं हन्ति मानवः ॥

 

कारी रंग क घोडा क नांगडि में सात टा केश क लट बनाकऽ नेनाक गर में बान्हि दिऎक त दाँत कटकटाएब दूर भऽ जाइक! ई बात कोनो डाक्टर सुनय त कतेक हॅंसत ? परन्तु एखन धरि आयुर्वेदक आचार्य लोकनि इ सभ श्लोक पढबैत छथि और आयुर्वेदक विद्यार्थी लोकनि घोंटि जाइत छथि । एहि सॅं बेसी उपहास क बात और की भऽ सकैत अछि ?

खट्टर कका भांग में चीनी मिलबैत बजलाह - आन देश में चिकित्साक विकास वैज्ञानिक प्रणाली पर भेल छैक । जे केओ शास्त्र क परीक्षा करय चाहैत अछि, तकरा नास्तिक कहि कऽ तिरस्कार कैल जाइत छैक। तैं जहाँ डाक्टरी विद्या आइ उन्नतिक शिखर पर पहुँचि गेल अछि, तहाँ आयुर्वेद एखन धरि प्रदरान्तक रस मे डुबल अछि । जहाँ आइकाल्हु क धन्वन्तरि क कान कतरि रहल अछि, तहाँ वैद्य लोकनि मरिचादि मलहम सॅं आगाँ नहि बढि सकलाह अछि ।

हम- वास्तव में अपना शास्त्र क पुनः परिष्कार होमक चाही। की औ वैद्य जी ! अहाँ लोकनि एहि दिस किऎक ने ध्यान दैत छिऎक ?

खट्टर कका लोटा में भांग घोरैत बजलाह - ‘गद' नाम रोगक थिकैक । तकरा अंधाधुंध हनन करवाक काज जे राति-दिन करैत छथि से एहि दिस कोना कऽ ध्यान देताह ? ओतेक समय कहाँ छैन्ह ? शास्त्रक भार- वहन सॅं अवकाश भेटैन्ह तखन ने ?

हम देखल जे वैद्यजी अप्रतिभ भेल छथि। हुनक तोषार्थ बजलहु - खट्टर कका ! अहॅं। आइ वैद्य पर लागि पडलिएन्ह ! परन्तु बेचारे कैं राज कीय आश्रय प्राप्त नहि छैन्ह । की करथु ?

खट्टर कका व्यंग्यपूर्वक बजलाह – हॅं एक बेर राजकीय आश्रय भेटलैन्ह त हजारो वर्ष धरि मुसलीपाक ओ चोपचीनी क मोदक बनबैत रहलाह । आब पुनः राजकीय भेटतैन्ह त पाक ओ चीनी क गोली बनौताह ।

एकाएक खट्टर कका क ध्यान वैद्यजी पर गेलैन्ह। ओ सकदम्भ भेल बैसल छलाह । ई देखि खट्टर कका क 'मूड' (धारा) बदलि गेलैन्ह । बजलाह- हौजी ! और जे कहह, वैद्य लोकनि पाचक धरि बेस चटकार बनबैत छथि । लवणभास्कर ! हिंग्वष्टक ! दाडिमाष्टक ! एक सॅं एक स्वादिष्ट ! एहन एहन वस्तु डाक्टरी में कहॅं। पाबी ! तैं वैद्य सॅं हमरा मित्रता रहैत अछि । जखन पाचक खा कऽ पानि पिबैत छी त वैद्य क सभटा दोष बिसरि जाइत अछि। जखन वैद्यनाथे क बूटी सधने छी, तखन वैद्य क कोन नेहोरा ?

ई कहि खट्टर कका भांगक लोटा उपर अलगौलन्हि और किछु छिटका शिवजी क नाम पर दय घट-घट सौंसे लोटा चढा गेलाह ।

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