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वेदक भेद ( Vedak Bhed ) - खट्टर ककाक तरंग - हरिमोहन झा |

वेदक भेद

(खट्टर ककाक तरंग)

लेखक : हरिमोहन झा
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ओहि दिन फगुआ रहैक । खट्टर कका तीन बेर पीबि चुकल छलाह और चारिम बेर तैयारी कय रहल छलाह ।

हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, ओहि फगुआ में अहाँ कहने रही जे वेद में श्रृंगार-रस भरल छैक । (देखू,ब्रह्मानन्द वाला तरंग)

खट्टर कका गुलाबी नशा में रहथि । ई सुनितहिं आँखि लाल भऽ गेलैन्ह । बजलाह - बेजाय कोन कहलिऔह ? श्रृंगार कि एहन ओहन ? तेहन-तेहन वर्णन छैक जे की कालिदास में भेटतौह ?

हम - खट्टर कका, कहाँ वैदिक ऋषि ओ कहाँ रसिक-शिरोमणि कालिदास !

खट्टर कका हाथ में सोंटा लैत बजलाह – हौ, वैदिक ऋषि कालिदास क नाना छलाह । तेहन तेहन अश्लील उपमा दऽ गेल छथि जे धिया-पुताक समक्ष बाजल नहिं जा सकैत अछि । तैं हमर विचार जे विद्यार्थी ओ ब्रह्मचारी कै वेद नहिं पढय देवक चाही ।

हम - खट्टर कका, अहाँक त सभटा गप्प अद्भूते होइ अछि । वेद में कतहु अश्लीलता होइक ?

खट्टर कका कुंडी में भांगक पत्ती कुटैत बजलाह - तखन सुनि लैह । एहिना ऊखरि में सोमक पत्ती कुटा रहल अछि । मूसरक चोट पड़ि रहल छैक । से देखि ऋचाकार उत्प्रेक्षा करैत छथि -

 

यत्र द्वाविव जघनाधिषवरण्या
उलूखल सुतानामवेद्विन्दुजल्गुलः । -ऋ०-१/२८/२

 

हम - खट्टर कका , एकर की अर्थ भेलैक ?

खट्टर कका बजलाह - “जेना कोनो विवृतजघना युवती अपन दुनू ` ` ` `” तों भातिज थिकाह । बेसी खोलि कऽ कोना कहिऔह ? ई नहिं बूझह जे ओ लोकनि शुद्ध वैदिके टा छलाह ।

हम - खट्टर कका, अहाँ त तेहन बात कहि दैत छी जे हमर मुँहे बन्द भऽ जाइ अछि ।

खट्टर कका लोटाक मुँह में अङपोछा लगा भाङक गोला ओहि पर रखलन्हि और ऊपर सॅं जल ढारैत आङ्उर सॅं घोरैय लगलाह । पुनः बिहुँसैत बजलाह- देखह एहिना आंगुर चलैत देखि एक ऋषि कहै छथि -

 

अभित्वा योषणो दश, जारं न कन्या नूषत, मृज्यसे सोम सातये। - ऋ०-९/५६/३
 

ई मन्त्र गायत्री छन्द में छैक । एकर अर्थ बुझलहौक ?

हम - नहिं ।

ख ० - तखन सुनह । मंत्रकार उत्प्रेक्षा करैत छथि जे कामातुरा कन्या अपना जार (इयार) कैं बजाबक हेतु एहिना दसो आंगुर सॅं इसारा करैत अछि।

हम चकित भय पुछलिऎन्ह – ऎं ! वैदिको युग में व्यभिचार होइत छलैक ?

खट्टर कका मुसुकाइत बजलाह - केवल होइते नहिं छलैक । वैदिक ऋषि कैं ओहि रसो भेटैत छलैन्ह ।

खट्टर कका कलशी में भाङ ढारय लगलाह। ढारैत ढारैत हँसी लागि गेलैन्ह।

हम पुछलिऎन्ह - खट्टर कका, हँसलहुँ किऎक ?

खट्टर कका बजलाह - देखि एहिना कलशी में रस ढराइत देखि एकटा ऋषि लहर में आबि कऽ की कहैत छथि ?

 

मर्य इव युवतिभिः समर्षति सोमः कलशे शतयाम्ना पथा । -ऋ०- ९/८६/१६
 

अर्थात् कलश में अनेक धार सॅं रसक फोहारा छुटि रहल अछि जेना युवती क

हम - खट्टर कका, ओहन दढियल ऋषि कैं एहन एहन उपमा कोना देल गेलैन्ह ?

खट्टर कका बजलाह - ऋषि लोकनि कैं ई उपमा तेहन रसगर लगैत छैन्ह जे बारंबार दोहरौने छथि । देखह दोसरो मंत्र कहै छिऔह -

 

सरज्जारो न योषणां, वरो न योनिमासदम् । ऋ०९\१०१\१४
 

अर्थात ई रस तहिना कलश में जा रहल अछि जेना युवती में जार क

हम - आश्चर्य ! वेद में कतहु जार कऽ वर्णन हो !

खट्टर कका बजलाह – हौ, ताहि दिन जार क कतेक महत्व छलैक से एही गायत्री छंद सॅं बुझि जाह -

 

अभिगावो अनुषत , योषा जारमिव प्रियम् ,
अगन्नाजिं यथाहितम् । ऋ०-९\३२\५

 

अर्थात् "हे सोम ! हम ताही प्रकारें अहाँ कैं नेहोरा करैत छी जेना स्त्री अपना जार कैं ।" ई जारक चर्चा हजार ठाम भेटतौह । बूझह त वेद में स्वामी सॅं बेसी जारेक चलती छैक ।

हम - खट्टर कका, एहि सभ मंत्र सॅं त यैह सिद्ध होइत छैक जे वैदिक युग में स्त्री कैं बेसी स्वतंत्रता छलैन्ह ।

ख० - ताहि में कोन संदेह ? वैदिक स्त्री स्वच्छन्द होइत छलीह । कतहु कुमारि जार कैं बजबैत छलीह । कतहु विवाहिता जार कैं नेहोरा करैत छलीह। जार प्रेयसी सॅं कोना रमण करैत छलाह [ऋ०-९\१०१\१४] और युवती कैं युवाजार भेटला सॅं केहन तृप्ति होइ छलैन्ह [ऋ०-१०\३०\६] तकरो वर्णन वेद में भेट जैतौह ।

हम - तखन त वैदिक समाज में जारजो संतान होइत छल ?

ख० – ताहू में संदेहे ? व्यभिचार सॅं अनेको स्त्री कैं गर्भ रहि जाइत छलैन्ह ।उर्वशीक पेट सॅं वशिष्ठक जन्म भेलैन्ह । [ऋ०-७\३३\१२] दीर्घतमा क गर्भणी माता वृहस्पति सॅं संभोग कय वर्णसंकर संतान उत्पन्न कैलन्हि। [ऋ१\१४७\३] पुरुकुत्स क स्त्री सप्तर्षि क कृपा सॅं त्रसदस्यु नामक पुत्र प्राप्त कैलन्हि । [ऋ०४\४२\८] कतेको स्त्री गुप्तरूप सॅं प्रसव करैत छलीह [ऋ०२\२९\१] कहाँ धरि कहिऔह ? जौं सभटा व्यभिचार क प्रसंग गनाबय लगिऔह त पाँचम वेद बनि जाय । एही द्वारे त हम वेद कऽ भाषाटीका घर में नहिं रखैत छी । जौं राखी त स्त्रीगण दूरि भऽ जाथि । हम त बुझैत छी जे एही कारणे स्त्री कैं वेद पढबाक अधिकार नहिं देल गेलैन्ह अछि ।

हम - खाट्टर कका, ई त मौलिक गप्प कहल । हम बुझैत छलहुँ जे वैदिक युग में ब्रह्मचर्यक डंका बजैत छल ` ` ` ` ` `

ख० - आब त बुझलहक जे कोन डंका पर चोट पड़ैत छलैक !

हम - खट्टर कका, मानि लेल जाओ, यैह बात सत्य । तथापि ऋषि लोकनि कैं कि एना खुल्लमखुल्ला 'उघारिहंकरिष्ये' उचित छलैन्ह ?

ख०- हौ, जे राति दिन सोमक नशा में बुत्त भेल रहत से और बजबे की करत ?

हम - परन्तु यदि ओ लोकनि भंगक तरंग में लिखि गेल छथि तखन ओहन ओहन गूढ बातक विवेचना कोना कैने छथि ?

खट्टर कका एक लोटा भांग चढबैत बजलाह – हौ, नशा में जेहन जेहन बात मुँह सॅं बहरैबाक चाही तेहने तेहन त बहरायल छैन्ह । देखह, सोमक तरंग में एक ऋषि कतेक दूर धरि बहकि जाइ छथि !

 

शेपो रोमण्वन्तौ भेदौ वारिन्मंडूक इच्छतीन्द्रायेन्दो परिस्रव।-ऋ०९\११२\४

आब एहि सॅं बेसी गूढ बात की हैतैक ?

ख० - अर्थ यैह जे ` ` ` `ई(कामदंड) रोमाच्छादित` ` ` `(विवर) मे प्रवेश कर ` ` `

हे सोम! अहाँ चुबि जाउ । ```` आब तोंही कहह , एहि सॅं बेसी कोनो मदक्की की बाजि सकैत अछि !

हम छुब्ध होइत कहलिऎन्ह - खट्टर कका, हम त यैह जनैत छलहुँ जे ऋचा कार लोकनि द्रष्टा ओ मनीषी छलाह । ऋषिका लोकनि सेहो आजन्म ब्रह्मचारिणी रहि वेदमंत्रक रचना करैत छलीह ।

खट्टर कका भभा कऽ हॅंसि पड़लाह । बजलाह – ऋषिका लोकनि त और जुलुम करैत छलीह । ओ ब्रह्मचारिणी सभ तेहन तेहन मंत्रक रचना कऽ गेल छथि जे विवाहितोक कान कटने छथि ।

हमरा मुँह तकैत देखि खट्टर कका बजलाह – देखह, एक घोषा नामक ब्रह्मचारिणी कहै छथि -

 

को वा शयुत्रा विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते । ऋ० ७\४०\२

अर्थात जेना विधवा स्त्री शयन काल में अपना देवर कैं बजा लैत अछि तहिना हम यज्ञ में अहाँ कैं बजा रहल छी ।

हम - बाप रे बाप ! कुमारि क मुँह सॅं एहन बात ?

खट्टर कका भङघोटना साफ करैत बजलाह – तों एतबे में बपहाड़ि तोड़य लगलाह ? देखह अंगिरा ऋषिक कन्या शश्वती देवी एक युवा पुरुष (आसंग) कैं नग्न अंग देखि कोना उन्मत्त भऽ जाइ छथि -

 

अन्वस्य स्थुरं ददृशे पुरस्तादनस्थ उरुरवरम्बमाणः ।
शश्वती नार्यभिचक्ष्याह सुभद्रमर्य भोजनं विभर्षि ॥

हम- खट्टर कका एकर अर्थ बुझा कऽ कहू ।

खट्टर कका क आँखि नशा सॅं बेसी लाल भऽ गेलैन्ह । बजलाह - “दूनू जंघाक मध्य में लटकल, पुष्ट, लम्बायमान``` देखि क शश्वती कहलथिन्ह - वाह ! ई त खूब सुन्दर भोग करबा योग्य ``` धारण कैने छी !”

हम कान मुनैत कहलिऎन्ह - खट्टर कका ,हद्द भऽ गेल । एना त ओ युवती बाजय जे पीबि कऽ उन्मत्त हो ।

खट्टर कका बजलाह – हौ, ओ सभ मदोन्मत्ता छलीह । सुर्या नाम्नी एक ब्रह्मचारिणी कहैत छथि -

 

यस्या बीजं मनुष्या वपन्ति, या न ऊरु उशती विश्रया,
ते यस्यामुशन्त प्रहराम शेपम् ।

हम - एकर अर्थ नहि बुझलिऎक ।

ख० – ऊरू क अर्थ दूनू जंघा । विश्रय क अर्थ पसारब । शेप क अर्थ जननेन्द्रिय । प्रहराम क अर्थ चोट मारब । आब तों अपने अर्थ लगा लैह । यदि तैयो नहि बुझि पड़ौह त कोनो वैदिक सॅं पूछि लहुन ।

हम देखल जे खट्टर कका भंग क तरंग में बहल जा रहल छथि । भसियाइत भसियाइत कहाँ सॅं कहाँ पहुँचि जैताह तकर ठेकान नहिं । कहलिऎन्ह -

खट्टर कका, हमरा नहि बुझल छल जे वेदो में एतेक अश्लीलता हेतैक ।

खट्टर कका, हमरा नहि बुझल छल जे वेदो में एतेक अश्लीलता हेतैक ।

हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका ` ` `

परन्तु खट्टर कका अपना सूर में बढल गेलाह – इन्द्राणी ताल ठोकि कऽ कहै छथिन्ह -

वृषभो न तिग्मशृंगोऽन्त्रर्यूथेषु रोरुवत् । (ऋ०-१०\८६\८५)

"अर्थात् जेना टेढ सिंघ बला साँढ मस्त भऽ ढैकरैत , रमण करैत अछि तहिना अहूँ हमरा सॅं करू ।" तकरा बाद जे संभोगक नग्न चित्रण अछि से काश्मीरी कोकशास्त्रक कान कटैत अछि ।

हम पुनः टोकलिऎन्ह-खट्टर कका ` ` ` `

परन्तु हुनक प्रवाह रोकब असंभव छल । ओ अपना धुन में बढल गेलाह- युवती लोमशा क संभोग वर्णन पढबह त दंग रहि जैबह । लोमशा यौवनक मद सॅं मत्त भय अपन सभ आवरण उतारि फेकैत छथि और राजा स्वनय कैं कहैत छथिन्ह जे -

 

उपोप मे परामृश मामेदभ्राणिमन्यथा
सर्वाहमस्मि रोमशा गान्धारीणामवाविका । (ऋ०-१\१२६\७)

 

अर्थात् 'अहाँ हमरा लग आउ और निर्धोख भऽ कऽ खूब धरु । देखू जे हमरा भेड़ीक रोइआँ सनसन कतेक रास।' आब एहि सॅं बाढि निर्लज्जता कोनो युवतीक हेतु की भऽ सकैत छैक ? और तकरा बाद जे रति-संग्राम मचैत अछि से कहबा-सुनबा योग्य नहिं। लोमशा तेना कऽ आवेष्टित करैत छथिन्ह जे राजा ओहीकाल गद्गद भय हुनका रतिमल्लता क सर्टिफिकेट दय दैत छथिन्ह -

 

अगाधिता परिगाधिता या कशीकेव जंगहे
ददाति मह्यं यादुरी याशुनां भोज्या शता ।(ऋ०१\१२६\७)

 

अर्थात् ई युवती सपनौर जकाँ सौंसे देह लपटि कऽ तेना रमण करैत छथि जे रस सॅं सराबोर कय दैत छथि ।

हम क्षुब्ध होइत कहलिऎन्ह - खट्टर कका, अहाँ भांगक नशा में त ने ई सभ बाजि रहल छी ?

खट्टर कका बजलाह – तों एतबे में घबरा गेलाह ? कनेक यम-यमीक संभाषण पढह त बुझबहौक जे सहोदर भाइ-बहिन कोन तरहक वार्ता चलैत छैक ! (ऋ० १०/१०/१) तेहन-तेहन अश्लील गप्प छैक जे एखन भाङ्गोक नशा में हमरा मुहँ सॅं नहि बहरा सकैत अछि । विश्वास नहिं हो त ऋग्वेद क दशम मंडल उनटा जाह ।

हम - खट्टर कका, अहाँ वेदक बात कहि रहल छी कि वाममार्गक ?

खट्टर कका क आँखि ओड़हूलक फूल जकाँ लाल भऽ गेलैन्ह । बजलाह - हमरा वेद ओ वाममार्ग में कोनो भेद नहिं बुझि पड़ैत अछि । जखन पिता-पुत्री क वर्णन पढबह जे प्रजापति कोना युवती कन्या में सिंचन करैत छथि त रोमांच भऽ जैतौह ! [१०\६१\५-६]

हम कान पर हाथ रखैत बजलहुँ - शान्तं पापम् । ई त वाममार्गो सॅं टपि गेल।

खट्टर कक बजलाह – हमरा जनैत त वेदे सॅं वाम मार्ग बहराएल अछि । मदिरा , मांस ओ मैथुन- एही सभक वर्णन त वेद में भरल अछि । वाममार्गी की पंचमकार कतहु आन ठाम सॅं लाएल छथि ?

हम - खट्टर कका, तखन त ऋषि लोकनि चार्वाको क कान कटलन्हि

ख० – हौ, वैदिक ऋषि चार्वाक क गुरु छलाह । देखह अगस्त्य मुनि खुल्लम खुल्ला लोपामुद्रा कैं उपदेश दैत छथिन्ह जे मनुष्य़ कैं आजीवन खूब भोग करक चाही [ऋ०-१/१७९/२] यैह बात चार्वाक बजलाह त नास्तिक भऽ गेलाह । और अगस्त्य मुनि बजलाह त आस्तिक बनल रहलाह । परन्तु हम त हौ बाबू स्पष्टवक्ता छी । वेदक कर्ता लोकनि घोर नास्तिक छलाह । लोक कहै अछि-नास्तिको वेदनिन्दकः । हम कहै छी-नास्तिको वेदलेखकः ।

हम - खट्टर कका, अहाँ त तेहन तेहन बात कहै छी जे हमरा किछु फुरतहिं नहि अछि । मदिरा, मांस, मैथुन ! तखन वेद में यैह टा छैक कि और किछु ?

खट्टर कका शान्त भाव सॅं बजलाह - और बहुत किछु छैक । जूआ ! चोरी ! हत्या !

हम – ऎं ! जूआ, चोरी, हत्या ! खट्टर कका, अहाँ होस में त छी ने ?

खट्टर कका बजलाह - तोरा विश्वास नहिं होइ छौह त स्वयं देखि लैह ।ऋग्वेदक एक अध्याय [१०/३४] केवल जूआ ओ जुआड़ी क वर्णन सॅं भरल छैक । ओहि समय तिरपन प्रकारक पासा छल ।[ऋ०१०/३४/८] एक ऋषि कहैछथि जहिना स्त्री अपना इयारक घर जाइत अछि तहिना हमहूँ जूआक अड्डा पर दौड़ल जाइ छी । [१०/३४/५] कतहु इन्द्र चोरी करैत छथि ।[ऋ०३/४८/४] कतहु अग्नि चोरी करैत छथि । [ऋ०१/७२/४] कतहु पणि गाय चोरबैत छथि । [ऋ०-१/९/५] कतहु बड़द लूटल जा रहल अछि ।[ऋ०१/११/५] और हत्याक कोनो हिसाब नहिं । कतहु वृत्र क वध [ऋ०१/३३/४] कतहु नमुचिक वध [ऋ०१/५३/७] कतहु नमुचिक वध [ऋ०१/६३/३] कतहु शुष्ण क वध [१/१७४/७] कतहु कुयबक वध । बूझह त वेदक पात रक्तपात सॅं भरल अछि । जखन नरमेध क ई हाल त पशुवध क कोन गणना ?

हम विषण्ण होइत पुछलिऎन्ह - खट्टर कका, वैदिक युग में एहन एहन बात ! किऎक ?

खट्टर कका नोसि लैत बजलाह – हौ, जे राति-दिन मदिरा मे डूबल रहत से करबे की करत ? सभ देवता में श्रेष्ठ इन्द्रेक चरित्र देखहुन । कोनो कर्म हुनका सॅं छूटल अछि ? ओ गर्भवती स्त्री क हत्या पर्यंन्त कैने छथि [ऋ०१/१०१/१] साँढ क मांस पर्यन्त भक्षण कैने छथि । [ऋ०१०/८६/४]

हम - खट्टर कका, वैदिक युग में भक्ष्याभक्ष क विचार नहिं रहैक ?

खट्टर कका - यदि सैह विचार रहितैक त घोड़े क मांस क वर्णन अबितैक ? [ऋ० १/१६२] और कहाँ धरि जे कुकुर क अँतड़ी पर्यन्त पका कऽ खैबाक वृत्तान्त छैक [ऋ० ४/१८/३] ।

हम - राम राम ! बीभत्सक पराकाष्ठा भऽ गेल ।

ख० - त एहि में हमर कोन दोष ? जे छैक से कहैत छिऔह । मद्य ओ मांस त सुनबे कैलह । ततःपर त मैथुने होइ छैक । से वेद मे देखह । कतहु शिश्नदेवक वर्णन, [ऋ०७/२१/५] कतहु भगदेवता क पूजा, [७/३२/४] कतहु व्यभिचारिणीक चर्चा, [१०/४०/६] कतहु कुमारिक संभोग, [१/६६/४] । कतहु गर्भणी पर बला त्कार [१/१४७/३]। कतहु गुप्त प्रसवक गप्प । [२/२९/१] । कतहु भ्राता भगिनी में अनुचित प्रस्ताव [ऋ०१०/१०] । कतहु पिता-पुत्री में । [ऋ०१०/६१] कतहु जारज सन्तानक जन्म । [ ४/४२/८]। कतहु अप्राकृतिक व्यभिचार । एक ऋषि कैं नहिं किछु भेटलैन्ह त घैले मे रेतःपात कऽ देलन्ह [ऋ०७/३३/१३] ।

हमरा मुँह सॅं बहरायल - हरे राम ! हरे राम ! हम त बुझैत छलहुँ जे वेद में केवल धर्मे क बात हेतैक ।

खट्टर कका बजलाह – हॅं , एक गोटे एहिना बुझैत छथि । परन्तु हम त टीकाकारक अनुसार अर्थ कहलिऔह अछि । वेद में नाना प्रकार क वस्तु छैक। एक सॅं एकअलबेङल बात ! सौतिन के मारबाक उपाय पर्यन्त [१०/१५९] कतहु वृद्धक विवाह युवती सॅं होइ छैन्ह [१/५१/१३] कतहु वृद्धा क विवाह युवा सॅं [१/११७/७] कतहु घोड़ी रथ में जोतल जाइ अछि । कतहु स्त्रीक पलटन पुरुष सॅं लड़य जाइ अछि । [५/३०/९] । कतहु नपुंसक क स्त्री कैं पुत्र होइ छैक ।[१/१२७/२४] । कतहु गर्भे सॅं शिशु झगड़ा करैत छैक जे हम पेट सॅं नहिं बहरायब ।[४/१८ ] कतहु घोड़ी सॅं गायक जन्म होइ छैक ।[१/१२/२] कतहु पुत्र अपना माय कैं जन्म दैत अछि । [१२/९/४] हौ, तेहन तेहन उटपटाँग बात भरल छैक जे बुद्धि काज नहिं देतौह ।

हम छुब्ध होइत पुछलिऎन्ह - खट्टर कका, एहन एहन बात वेद में कोना एलैक ? ई सभ क्षेपक त ने थिकैक ?

खट्टर कका आँखि मुनैत बजलाह - के जानय ? सोम-रसक प्रवाह में जिनका जे फुरलैन्ह से बाजि गेलाह । हम अपना तरंग में कतेक बात बाजि जाइछी से केओ मोजरे नहिं दैत अछि । और ओ लोकनि जे बाजि गेलाह से वेदवाक्य भऽ गेल ! ` ` ` हौ, किछु अनट-विनट त ने बजना गेल अछि ।

हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, फगुआक दिन सभ किछु माफ रहैत छैक । ताहू में अहाँ कैं ।

तावत् काकी एक थार चाशनीदार छेना क मालपूआ ओ मधुर नेने पहुच गेलीह । खट्टर कका उल्लसित होइत बजलाह – देखह, असली यज्ञ क सामग्री आबि गेल ।

हमरा मुँह तकैत देखि कहलन्हि - हौ, वैदिक यज्ञ क रहस्य की थिकैक ? हवनकुंड थीक उदरकुंड क प्रतीक । हुतासन क ज्वाला जठराग्नि क सूचक थीक । समिधा क अर्थ भोज्य पदार्थ । तैं कस्मै देवाय हविषा विधेम, ऋग्वेद- १०/२१/५ एहि प्रश्न क उत्तर हम बुझैत छी 'उदरदेवाय' ।

हम - परन्तु

ख० - परन्तु की ? वैदिक ऋचा क स्रोत थीक मधुर भोजन । मधुर पर छंद फुरैत छैक । एखनो और ताहू दिन । हमरा लोकनि क पूर्वज कें कतहु मीठ गुल्लरो भेटि जाइन्ह त गीत उठा देथि -

 

चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुमुदुम्बरम् [एतरेय ३३/३/१५]

 

मधु वा घृत भेटि गेने आनन्द सॅं नाचि उठथि -

 

मधुश्चुतं घृतमिवं सुपूतम । [ ऋग्वेद ४/५७/२]

 

गाछ-वृक्ष , जल , स्थल , आकाश , सभ में मधुरे जोहने भेल फिरथि -

 

मधुमतीरोषधीर्द्याव आपो मधुमन्नो भवन्तु ।[ ऋ० ४/५७/३]

 

सम्पूर्ण विश्व में हुनका लोकनि कैं मधुरे मधुर सुझैन्ह । आनन्द सॅं मधुपान कय मधु-पाठ करथि -

 

मधुवाता ऋतायते । मधु क्षरन्ति सिन्धवः।
माध्वीर्नः सन्तु ओखधी। मधु नक्तमुतोषसो ।
मधुमत् पार्थिवं रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता ।
मधुमान् नो वनस्पतिः। मधुमान् अस्तु सूर्यः ।
माध्वीर्गावो भवन्तु नः। [यजुर्वेद १३/२७-२९] ।

 

हौ , एहि देश में मुइलो उत्तर पितर कें ओम् मधु मधु मधु कहि कऽ तृप्त कैल जाइ छैन्ह । एहन मधुर-प्रेमी जाति और के हैत ? वेश, आब मधुरेण समापयेत् करह ।

हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, आइकाल्हि हमरा मिष्टान्न वर्जित अछि ।

खट्टर कका बजलाह - मिष्टान्ने तऽ शिष्टान्न थीक । सैह वर्जित, तऽ खैबह की? धृष्टान्न ? हौ, मधुरेण समापयेत् एकर असली तात्पर्य बुझै छहौक ? मधुरे खाइत- खाइत ई जीवन समाप्त कऽ दी। यैह हमरा लोकनि क पूर्वज क मूलमंत्रथीक । बल्कि, हम त एक अक्षर परिष्कारो कऽ दैत छिऎक जे - मधुरेण समापयेत् ।

अर्थात् मधुर भेटैत जाय त हाथ बारबे नहिं करी ।

ई कहि खट्टर कका सस्वर वेदपाठ करय लगलाह -

 

जिह्वया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम् ।
मधुवन्मे निक्रमणं , मधुमन्मे परायणम् ।
वाचा ददामि मधुमद् भूयासं मधुसंदृशम् ॥[अथर्ववेद १/३४/२-३]

 

पुनः बजलाह - एकर अर्थ बुझलहौक ? यावज्जीवन मधुर खाइत रही और मधुर बजैत रही । यैह वेद क सभ सॅं मधुर मंत्र थीकैक ।``` लैह, फगुआ क प्रसाद पाबह ।।

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