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देवदास (Devdash) | शरतचंद्र चट्टोपाध्याय | (Chapter - 2)

-: देवदास :-

(उपन्यास)

लेखक : शरतचंद्र चट्टोपाध्याय
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पानी मे डूबने से मनुष्य जिस प्रकार जमीन को पकड़ लेता है और फिर किसी भांति छोड़ना नही चाहता, ठीक उसी भांति पार्वती ने अज्ञानवत देवदास के दोनो पांवो को पकड़ रखा था। उसके मुख की ओर देखकर पार्वती ने कहा-‘मै कुछ नही जानना चाहती हूं, देव दादा!’

‘पत्तो, माता-पिता की अवज्ञा करे?’

‘दोष क्या है?’

‘तब तुम कहां रहोगी।’

पार्वती ने रोते-रोते कहा-‘तुम्हारे चरणो में...।’

फिर दोनो व्यक्ति स्तब्ध बैठे रहे। घड़ी मे चार बज गये। ग्रीष्मकाल की रात थी; थोड़ी ही देर मे भोर होता हुआ जानकर देवदास ने पार्वती का हाथ पकड़ कर कहा-‘चलो, तुम्हे घर पहुंचा आवे।’

‘मेरे साथ चलोगे?’

‘हानि क्या है? यदि बदनामी होगी तो कुछ उपाय भी निकल आयेगा।’ ‘तब चलो।’

दोनो धीरे-धीरे बाहर चले गये।

दूसरे दिन पिता के साथ देवदास की थोड़ी देर के लिए कुछ बातचीत हुई। पिता ने उससे कहा-‘तुम सदा से मुझे जलाते आ रहे हो जितने दिन इस संसार मे जीवित रहूंगा उतने दिन यो ही जलाते रहोगे।

तुम्हारे मुंह से ऐसी बात का निकलना कोई आश्चर्य नही है।’

देवदास चुपचाप मुंह नीचे किए बैठे रहे।

पिता ने कहा-‘मुझे इससे कोई संबंध नही है, जो इच्छा हो, तुम अपनी मां से मिलकर करो।’

देवदास की मां ने इस बात को सुनकर कहा-‘अरे, क्या यह भी नौबत मुझे देखनी बदी थी?’

उसी दिन देवदास माल-असबाब बांधकर कलकत्ता चले गये। पार्वती उदासीन भाव से कुछ सूखी हंसी हंसकर चुप रही। पिछली रात की बात को उसने किसी से नही जताया। दिन चढ़ने पर मनोरमा आकर बैठी और कहा-‘पत्तो, सुना है कि देवदास चले गये?’

‘हां।’

‘तब तुमने क्या सोचा है?’ उपाय की बात वह स्वयं नही जानती थी, फिर दूसरे से क्या कहेगी? आज कई दिनो से वह बराबर इसी बात को सोचती रहती है, किंतु किसी प्रकार यह स्थिर नही कर सकी कि उसकी आशा कितनी और निराशा कितनी है। जब मनुष्य ऐसे दुख के समय मे आशा-निराशा का किनारा नही देखता, तो उसके दुर्बल हृदय बड़े भय से आशा का पल्ला पकड़ता है। जिसमे उसका मंगल रहता है, उसी बात की आशा करता है। इच्छा व अनिच्छा से उसी ओर नितांत उत्सुक नयन से

देखता है। पार्वती को अपनी इस दशा मे यह पूरी आशा थी कि कल रात को व्यापार के कारण वह निश्चय ही विफल -मनोरथ न होगी। विफल होने पर उसकी अवस्था क्या होगी, यह उसके ध्यान के बाहर की बात है। इसी से सोचती थी देवदास फिर आयेगे। फिर मुझे बुलाकर कहेगे- पत्तो, तुम्हे मै शक्ति रहते किसी तरह दूसरे के हाथ न जाने दूंगा। किंतु दो दिन बाद पार्वती ने निम्नलिखित पत्र आया‘पार्वती, आज दो दिन से बराबर तुम्हारी बाते सोच रहा हूं। माता-पिता की भी यह इच्छा नही है कि हमारी तुम्हारे साथ विवाह हो। तुमको सुखी करने मे उन लोगो को ऐसी कठिन वेदना पहुंचानी होगी, जो मुझसे नही हो सकती। अतएव उनके विरुद्ध यह काम कर कैसे सकता हूं? तुम्हे संभवतः अब आगे पत्र लिख सकूंगा, इसलिए इस पत्र मेसब बाते खोलकर लिखता हू। तुम्हारा घराना नीच है। कन्या बेचने और खरीदने वाले घर की लड़की मां किसी भी घर मे नही ला सकती। फिर घर के पास ही तुम्हारा कुटुंब ठहरा, यह भी उनके मत से ठीक नही है। रही बाबू जी की बात, वह तो तुम सभी जानती हो। उस रात की बात सोचकर मुझे बहुत ही दुख होता है। तुम्हारी, जैसी अभिमानिनी लड़की ने वह काम कितनी बड़ी व्यथा पाने पर किया होगा, यह मै अच्छी तरह जानता हूं।

‘और भी एक बात है। तुमको मैने कभी ह्रश्वयार किया हो, यह बात मेरे मन मे नही उठती। आज भी तुम्हारे लिए मेरे हृदय मे कुछ अत्यधिक क्लेश नही है। केवल इसी का मुझे दुख है कि तुम मेरे लिए कष्ट पा रही हो। मुझे भूल जाने की चेष्टा करो। यही मेरा आंतरिक आशीर्वाद है कि तुम इसमे सफल हो।

देवदास-’

जब तक देवदास ने पत्र डाक-घर मे नही छोड़ा था, तब तक केवल एक बात सोचते रहे, किंतु पत्र रवाना करने के बाद ही दूसरी बात सोचने लगे। हाथ का ढेला फेककर वे एकटक उसी ओर देखते रहे।

किसी अनिष्ट की आशंका उनके मन मे धीरे-धीरे उठने लगी। वे सोचते थे कि यह ढेला उसके सिर पर जाकर कैसा लगेगा? क्या जोर से लगेगा? जिंदा तो बचेगी? उस रात मेरे पांव पर अपना सिर रखकर वह कितनी रोती थी। पोस्ट ऑफिस से मैस लौटते समय रासते मे पद-पद पर देवदास के मन मे यही भाव उठने लगा। यह काम क्या अच्छा नही हुआ? और सबसे बउ़ी बात देवदास यह सोचते थे कि पार्वती मे जब कोई दोष नही है, तो फिर माता-पिता क्यो निषेध करते है? उम्र बढ़ने के साथ और कलकत्तानिवास से उन्होने एक बात यह सीखी थी कि केवल लोगो को दिखाने के लिए कुल-मर्यादा और एक क्षुद्र विचार के ऊपर होकर निरर्थक एक प्राण का नाश करना ठीक नही। यदि पार्वती हृदय की ज्वाला को शांत करने के लिए जल मे डूब मरे, तो क्या विश्व-पिता के पांव मे इस महापातक का एक काला धब्बा नही पड़ेगा?

मैस मे आकर देवदास अपनी चारपाई पर पड़ रहे। आजकल वे एक मैस मे रहते थे। कई दिन हुए, मामा का घर छोड़ दिया- वहां उन्हे कुछ असुविधाएं होती थी। जिस कमरे मे देवदास रहते है, उसी के बगल वाले कमरे में चुन्नीलाल नामक एक युवक आज नौ बरस से निवास करते है। उनका यह दीर्घ कलकत्ता-निवास बी.ए. पास करने के लिए हुआ था, किंतु आज तक सफल मनोरथ नही हो सके। यही कहकर वे अब यहां पर रहते है। चुन्नीलाल अपने दैनिक-कर्म-संध्या-भ्रमण के लिए बाहर निकले है।

लगभग भोर होने के समय फिर लौटेगे। बासा के और लोग भी अभी नही आये। नौकर दीपक जलाकर चला गया, देवदास किवाड़ लगाकर सो रहे।

धीरे-धीरे एक-एक करके सब लोग लौट आए। खाने के समय देवदास को बुलाया गया, किंतु वे उठे नही। चुन्नीलाल किसी दिन भी रात को लौटकर बासा मे नही आए थे, आज भी नही लौटे।

रात को एक बजे का समय हो गया। बासा मे देवदास को छोड़ कोई भी नही जागता है। चुन्नीलाल ने बासा मे लौटकर देवदास के कमरे के सामने खड़े होकर देखा, किवाड़ लगा है, किंतु चिराग जल रहा है, बुलाया- ‘देवादास, क्या अभी जागते हो?’ देवदास ने भीतर से कहा- ‘जागता हूं। तुम आज इस समय कैसे लौट आये?’

चेन्नीलाल ने थोड़ा हंसकर कहा- ‘देवदास, क्या एक बार किवाड़ खोल सकते हो?’

‘क्यो नही?’

‘तुम्हारे यहां तमाखू का प्रबंध है?’

‘हां, है।’ - कहकर देवदास ने किवाड़ खोल दिये। चुन्नीलाल ने तमाखू भरते-भरते कहा- ‘देवदास,

अभी तक क्यो जागते हो?’

‘क्या रोज-रोज नीद आती है?’

‘नही आती?’ कुछ उपहास करके कहा= ‘आज तक मै यही समझता था कि तुम्हारे जैसे भले लड़के ने आधी रात का कभी मुख न देखा होगा, किन्तु आज मुझे एक नयी शिक्षा मिली।’

देवदास ने कुछ नही कहा। चुन्नीलाल ने तमाखू पीते-पीते कहा= ‘तुम इस बार जब से अपने घर से यहां आये हो, तुम्हारी तबीयत ठीक नही रहती, तुम्हे कौन सा क्लेश है?’

देवदास अनमने से हो रहे थे। उन्होने कुछ जवाब नही दिया।

‘तबीयत अच्छी नही है?’

देवदास सहसा बिछौना से उठ बैठे। व्यग्र भाव से उनके मुख की ओर देखकर पूछा- ‘अच्छा चुन्नी बाबू, तुम्हारे हृदय मे किसी बात का क्लेश नही है?’

चुन्नीलाल ने हंसकर कहा- ‘कुछ नही।’‘जीवन पर्यन्त कभी क्लेश नही हुआ?’

‘यह क्यो पूछतो हो?’

‘मुझे सुनने की बड़ी इच्छा है।’

‘ऐसी बात है तो किसी दूसरे दिन सुनना।’

देवदास ने पूछा- ‘अच्छा चुन्नी, तुम सारी रात कहां रहते हो?’

चुन्नीलाल ने एक मीठी हंसी हंसकर कहा- ‘यह क्या तुम नही जानते?’

‘जानता हूं, लेकिन अच्छी तरह नही।’

चुन्नीलाल का मुंह उत्साह से उज्ज्वल हो उठा। इन सब आलोचनाओ मे और कुछ रहे या न रहे, किन्तु एक आंख की ओट की लज्जा रहती है। दीर्घ अभ्यास के दोष से वह चली गई। कौतुक से आंख मूंदकर पूछा- ‘देवदास यदि अच्छी तरह से जानना चाहते हो तो ठीक मेरी तरह बनना पड़ेगा। कल मेरे साथ चलोगे?’

देवदास ने कुछ सोचकर कहा- ‘सुनता हूं, वहां पर बड़ा मनोरंजन होता है। क्या यह सच है?’

‘बिल्कुल सच है।’

‘यदि ऐसी बात है तो मुझे एक बार ले चलो, मै भी चलूंगा।’

दूसरे दिन सन्ध्या के समय चुन्नीलाल ने देवदास के कमरे मे आकर देखा कि वे व्यस्त भाव से अपना सब माल-असबाब बांध-छान रहे है। विस्मित होकर पूछा- ‘क्या नही जाओगे?’

देवदास ने किसी ओर न देखकर कहा- ‘हां, जाऊंगा।’

‘तब यह सब क्या करते हो?’

‘जाने की तैयारी कर रहा हूं।’

चुन्नीलाल ने कुछ हंसकर सोचा, अच्छी तैयारी है! कहा - ‘क्या तुम सब घर-द्वार वहां पर उठा ले चलोगे?’

‘तब किसके पास छोड़ जाऊंगा?’

चुन्नीलाल समझ नही सके, कहा ‘मै अपनी चीज-वस्तु किसी पर छोड़ जाता हूं? सभी तो बासे मे पड़ी रहती है।’

देवदास ने सहसा सचेत होकर आंखे ऊपर को उठायी, लज्जित होकर कहा -चुन्नी बाबू, आज मै घर जा रहा हूं।

‘यह क्यो, कब आओगे?’

देवदास ने सिर हिलाकर कहा- ‘अब मै फिर नही आऊंगा।’

विस्मित होकर चुन्नीलाल उनके मुंह की ओर देखने लगे। देवदास ने कहा- ‘यह रुपये लो, मुझ पर जो कुछ उधार हो उसे इससे चुकती कर देना। यदि कुछ बचे तो दास-दासियो मे बांट देना। अब मै फिर कभी कलकत्ता नही लौटूंगा।’

देवदास मन-ही-मन कहने लगे- कलकत्ता आने से मेरा बड़ा खर्च पड़ा।

आज यौवन के कुहिराच्छन्न अंधेरे का उनकी दृष्टि भेद कर गई। वही उस दुर्दांत, दुर्विनीत कैशोर-कालीन अयाचित पद-दलित रत्न समस्त कलकत्ता की तुलना मे बहुत बड़ा, बहुत मूल्यवान जंचने लगा।

चुन्नीलाल के मुख की ओर देखकर कहा- ‘चुन्नी! शिक्षा, विद्या, बुद्धि, ज्ञान, उन्नति आदि जो कुछ है, सब सुख के लिए ही है। जिस तरह से चाहो, देखो, इन सबका अपने सुख के बढ़ाने को छोड़ और कोई प्रयोजन नही है।’

चुन्नीलाल ने बीच मे ही बात काटकर कहा- ‘तब क्या अब तुम लिखना-पढ़ना छोड़ दोगे?’

‘हां, लिखने-पढ़ने से मेरा बड़ा नुकसान हुआ। अगर मै पहले यह जानता कि इतने दिन मे इतना रुपया खर्च करके इतना ही सीख सकूंगा, तो मै कभी कलकत्ता का मुंह नही देखता।’

‘देवदास, तुम्हे क्या हो गया है?’

देवदास बैठकर सोचने लगे। कुछ देर बार कहा- ‘अगर फिर कभी भेट हुई तो सब बाते कहूंगा।’

उस समय प्रातः नौ बजे रात का समय था। बासे के सब लोगो तथा चुन्नीलाल ने अत्यन्त विस्मय के साथ देखा कि देवदास गाड़ी पर माल-असबाब लादकर मानो सर्वदा के लिए बासा छोड़कर घर चले गये। उनके चले जाने पर चुन्नीलाल ने क्रोध से बासे के अन्य लोगो से कहा- ‘ऐसे रंगे सियार के समान आदमी किसी भी तरह नही पहचाने जा सकते।’

बुद्धिमान तथा दूरदर्शी मनुष्यो की यह रीति होती है कि तत्काल ही किसी विषय पर अपनी दृढ़ सम्मति प्रकट नही करते- एक ही पक्ष को लेकर विचार नही करते, एक ही पक्ष को लेकर अपनी धारणा स्थिर नही करते, वरन दोनो पक्षो को तुलनात्मक दृष्टि से परीक्षा करते है और तब कोई अपना गंभीर मत प्रकट करते है। ठीक इसके विपरीत एक श्रेणी के और मनुष्य होते है, जिनमे किसी विषय पर विशेष विचार करने का र्धर्य नही रहता। ये एकाएक अपनी भली-बुरी सम्मति स्थिर कर लेते है। किसी

विषय मे डूबकर विचार करने का श्रम ये लोग स्वीकार नही करते, केवल विश्वास के बल चलते है। ये लोग संसार मे किसी कार्य को न कर कसते हो, यह बात नही है, वरन्‌ काम पड़ने पर समय-समय पर ये लोग औरो की अपेक्षा अधिक कार्य करते है। ईश्वर की कृपा होने से ये लोग उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर प्रायः देखे जाते है और न होने से अवनति की गंभीर कन्दरा मे आजन्म के लिए पड़े रहते है, न उठ सकते है, न बैठ सकते है, और न प्रकाश की ओर देख सकते है, निश्चल, मृत, जलपिंड की भांति पड़े रहते है। देवदास भी इस श्रेणी के मनुष्य थे। दूसरे दिन प्रातः काल वे घर पहुंचे। माता ने आश्चर्य से पूछा- ‘देवा, क्या कॉलेज की छुट्‌टी हो गई?’

दो दिन देवदास ने बड़ी चुस्ती के साथ बिताये। उसकी जो अभिलाषा थी वह पूरी नही हो रही थीपार्वती से किसी निर्जन स्थान पर भेट नही होती। दो दिन बाद पार्वती की भी मां ने देवदास को सामने देखकर कहा- ‘अगर इधर आ गये हो, तो पार्वती के विवाह तक ठहर जाओ।’

देवदास ने कहा- ‘अच्छा।’

दोपहर के समय पार्वती नित्य बांध से जल लाने के लिए जाती थी। बगल मे पीतल की कलसी लेकर आज भी वह घाट पर आयी, देखा, निकट ही एक बेर के पड़ की आड़ मे देवदास जल मे बंसी फेककर बैठे है। एक बार उसके मन मे आया कि लौट चले, एक बार मन मे आया कि चुपके से जल भरकर ले चले। किंतु जल्दी मे वह कुछ भी स्थिर न कर सकी। कलसी को घाट पर रखते समय सम्भवतः कुछ शब्द हुआ, इसी से देवदास की दृष्टि से उस ओर ख्िांच गयी। उसने पार्वती को देख, हाथ के इशारे से बुलाकर कहा- ‘पत्तो, सुन जाओ!’

पार्वती धीरे-धीरे पास जागर खड़ी हुई। देवदास ने एक बार मुख उठाया, फिर बहुत देर तक शून्य दृष्टि से जल की ओर देखते रहे। पार्वती ने कहा- ‘देव दादा, मुझे कुछ कहते हो?’

देवदास ने किसी ओर देखकर कहा- ‘हूं बैठो।’

पार्वती बैठी नही, सिर नीचा किये खड़ी रही। किन्तु जब कुछ देर तक कोई बातचीत नही हुई, तो पार्वती ने धीरे-धीरे एक-एक पांव घाट की ओर बढ़ाना आरंभ किया। देवदास ने एक बार सिर उठाकर उसकी ओर देखा फिर जल की ओर देखकर कहा- ‘सुनो!’

पार्वती लौट आयी, किन्तु फिर भी देवदास ने कोई बात नही कही, यह देख वह लौट गयी। देवदास निस्तब्ध बैठेे रहे, थोड़ी देर बाद उन्होने फिर देखा, पार्वती जल लेकर जाने की तैयारी कर रही है। यह देख वह हंसी हटाकर घाट के ऊपर आ खड़े हुए - ‘मै आया हूं।’ पार्वती ने केवल खड़ा रख दिया, कुछ बोली नही।

पार्वती कुछ देर तक चुपचाप खड़ी रही, अंत मे अत्यन्त मीठे स्वर से पूछा- ‘क्यो?’

‘तुमने लिखा नही था?’

‘नही।’

‘यह क्या पत्तो! उस रात की बात भूल गयी?’

‘नही; किन्तु उस बात से अब काम ही क्या?’

उसका कंठ-स्वर स्थिर, किन्तु रूखा था। देवदास उसका मर्म नही जान सके, कहा- ‘मुझे क्षमा करो, मै तब इतना नही समझ सका था।’

‘चुप रहो, ये सब बाते मुझे नही सुहाती।’

‘मै जिस तरह से होगा, मां-बाप को राजी करूंगा। सिर्फ तुम...!’

पार्वती ने देवदास के मुंह की ओर एक बार तीखी नजर से देखकर कहा- ‘तुम्हारे ही मां-बाप है, मेरे नही? क्या उनकी इच्छा-अनिच्छा से मुझे कोई प्रयोजन नही है?’

देवदास ने लज्जित होकर कहा- ‘क्यो नही है पत्तो, पर वे लोग तो राजी है, सिर्फ तुम...!’

‘तुम कैसे जानतो हो कि वे लोग राजी है, वे बिल्कुल राजी नही है।’

देवदास ने हंसने की व्यर्थ की चेष्टा करके कहा- ‘अरे नही, वे लोग राजी है; यह मै अच्छी तरह से जनता हूं। सिर्फ तुम...!’

पार्वती ने बीच मे ही बात काटकर तीव्र कंठ से कहा- ‘सिर्फ मै तुम्हारे साथ? छि...!’ पलक मारते देवदास की दोनो आंखे अग्नि की तरह जल उठी। उसने अवरुद्ध कंठ से कहा- ‘पार्वती, क्या मुझे भूल गयी।’

पहले पार्वती भी कुछ चंचल हो उठी, किन्तु दूसरे ही क्षण आत्म-संवरण कर शांत और कठिन स्वर से उत्तर दिया- ‘नही, भूलूंगी क्यो? लड़कपन से ही तुम को देखती आयी हूं। होश संभला तभी से तुमसे डरती हूं- क्या उसी डर को तुम दिखाने आये हो? पर क्या मुण्े भी तुम नही पहचानते?’ यह कहकर वह निर्भीक दोनो आंखो को ऊपर उठाकर खड़ी हो रही।

पहले देवदास के मुंह से कोई बात नही निकली, फिर कहा- ‘सर्वदा से मुझसे तुम डरती ही आयी हो और कुछ नही?’

पार्वती ने दृढ़ स्वर से कहा - ‘नही और कुछ नही।’

‘सच कहती हो?’

‘हां, सच कहती हूं। तुम पर मेरी कुछ भी श्रद्धा नही है। मै जिसके यहां जा रही हूं, वे धनवान, बुद्धिमान, शांत और स्थिर है। वे धार्मिक है। मेरे बाप मेरा भला सोचते है, इसी से वे तुम्हारे जैसे अज्ञान, अव्यवस्थित वित्त, दुर्दान्त मनुष्य के हाथ मुझे किसी तरह नही देना चाहते। तुम रास्ता छोड़ दो।’

एक बार देवदास ने कुछ इधर-उधर किया। एक बार रास्ता छोड़ने के लिए भी तैयार हुए; परन्तु फिर दृढ़ता के साथ मुंह उठाकर कहा- ‘इतना अहंकार?’

पार्वती ने कहा - ‘क्यो नही? तुम कर सकते हो और मै नही? तुम मे रूप है, गुण नही, मुझ मे रूप भी है, गुण भी है... तुम बड़े आदमी हो, लेकिन मेरे पिता भी भिक्षुक नही है। इसे छोड़ मै स्वयं भी तुम लोगो से किसी अंश मे हीन नही रहूंगा।’

देवदास अवाक्‌ रह गये। पार्वती ने फिर कहना आरंभ किया- ‘तुम क्या सोचते हो कि तुम मुझे हानि पहुंचाओगे? हां, अधिक नही, तो कुछ हानि अवश्य पहुंचा सकते हो, यह मै जानती हूं। अच्छा वही करो। मुझे सिर्फ रास्ता दो।’

देवदास ने हत्‌बुद्धि होकर कहा- ‘हानि किस तरह पहुंचा सकता हूं?’

पार्वती ने तत्क्षण उत्तर दिया- ‘अपवाद लगाकर वह बात तुम कहोगे।’

यह बात सुनकर देवदास वज्रहत की तरह देखते रहे। उनके मुख से केवल यही बात निकली- ‘अपवाद लगाऊंगा, मै?’

पार्वती ने विषैली हंसी हंसकर कहा- ‘जाओ, बचे हुए समय मे मेरे नाम मे कलंक लगाओ। उस रात मे मै तुम्हारे पास अकेली गयी थी, इसी बात को लेकर लोगो मे चारो ओर फैलाओ। इससे मन की बड़ी सांत्वना मिलेगी।’ यह कहते-कहते पार्वती के दर्पित कु्रद्ध होठ कांपते-कांपते स्थित हो गये।

किन्तु देवदास के हृदय मे क्रोध और अपमान से ज्वलामुखी पर्वत की भांति भीषण अग्नि सुलग रही थी। उन्होने अव्यक्त स्वर से कहा - ‘तुम क्या झूठी बदनामी उठाकर मै सांत्वना पाऊंगा।?’ - और उसी समय बंसी के मुठिये को घुमाकर, पकड़कर भीषण कंठ से कहा- ‘सुनो पार्वती, इतना रूपवान होना ठीक नही, अहंकार बहुत बढ़ जाता है।’ कह कहकर तनिक धीरे स्वर से कहा- ‘देखती नही हो, चन्द्रमा इतना सुन्दर है, इसी से उसमे कलंक का काला धब्बा लगा है। कमल कितना श्वेत है, इसीलिए उसमे काले भैरे बैठते है। आओ, तुम्हारे मुंह मे भी कुछ कलंक का चिन्ह दे दूं।’

देवदास के सह्म की सीमा जाती रही। उन्होने दृढ़ मुट्‌ठी से बंसी के मुठिये को पकड़कर इतने जोर से पार्वती के सिर मे मारा कि लगने के साथ ही सिर बायी भौ के नीचे तक फूट गया। पल भर मे सारा मुख खून से सराबोर हो गया।

पार्वती पृथ्वी पर गिर पड़ी। कहा- ‘देव दादा, क्या किया?’

देवदास ने बंसी टुकड़े-टुकड़े कर, पानी मे फैक उत्तर दिया- ‘अधिक कुछ नही जरा-सा कटा गया है।’

पार्वती आकुल कंठ से रो उठी- ‘बाप रे बाप, देव दादा!’

देवदास ने बारीक कुरते को फाड़कर पानी मे भिगोकर बांधते हुए कहा- ‘घबराओ नही पत्तो, यह हल्की-सी चोट जल्दी ही अच्छी हो जायेगी, सिर्फ दाग रह जायेगा। यदि कोई इसके विषय मे पूछे तो झूठी बात कहना, नही तो अपने कलंक की बात प्रकट करना।’

‘अरे बाप रे बाप!’

‘छिः! ऐसा न कहो पत्तो! विदाई के अंतिम दिनो मे सिर्फ एक निशान बनाये रखने के लिए यह चिन्ह दे दिया है। इस सोने से मुख को तुम आरसी मे कभी-कभी देखोगी तो?’ यह कहकर उत्तर पाने की कोई अपेक्षा न कर देवदास चलने के लिए तैयार हुए।

पार्वती ने व्याकुल होकर रोते-रोते कहा- ‘उफ! देव दादा!’

देवदास लौट आये। आंख के कोने मे एक बिंदु जल था। बहुत स्नेह-भरे कंठ से कहा- ‘क्यो, पत्तो?’

‘किसी से कहना मत।’

देवदास ने क्षण-भर मे ही खड़े होकर झुककर पार्वती के केशो के ऊपर उठाकर अधर स्पर्श कर कहा- ‘छिः! तुम क्या कोई दूसरी हो? शायद तुम्हे याद न हो, बचपन मे मैने शरारत से कई बार तुम्हारे कान मल दिये है।’

‘देव दादा, मुझे क्षमा करो।’

‘यह तुम्हे नही कहना होगा भाई, क्या सचमुच ही मुझे भूल गयी पत्तो? मैने कब तुमको क्षमा नही किया है?’

‘देव दादा...!’

‘पार्वती, तुम तो जानती ही हो, मै अधिक बाते नही कर सकता। बहुत सोच-विचार कर कोई काम मुझसे नही हो सकता, जो मन मे आता है वही कर बैठता हूं।’ यह कहकर देवदास ने पार्वती के सिर पर हाथ रखकर आर्शीर्वाद देते हुए कहा- ‘तुमने अच्छा ही किया। मेरे यहां रहकर सम्भवतः तुम सुख नही पाती, किन्तु तुम्हारे इस देव दादा को अक्षय स्वर्ग सुख मिलता।’

इसी मय बांध की दूसरी ओर से आदमी आ रहे थे। पार्वती धीरे-धीरे जल लेने के लिए उतरी थी।

देवदास चले गये। पार्वती जब घर लौटकर आयी, तो दिन ढल गया था। दादी ने उसे देखकर कहापत्तो, क्या पोखर खन के पानी लाती हो?’

किन्तु उसके मुंह की बात मुंह मे ही रह गयी। पार्वती के मुंह की ओर देखते ही चिल्ला उठी- ‘बाप रे बाप, यह क्या हुआ?’

घाव से अब भी खून बह रहा था। कपड़े का टुकड़ा प्रायः खून से तर हो गया था। रोते-रोते कहा‘बाप रे बाप, तेरा ब्याह है पत्तो!’

पत्तो ने सहज भाव से उत्तर दिया- ‘घाट पर पांव फिसल जाने से सिर के बल र्इंटो पर गिर पड़ी थी, जिससे कुछ चोट आ गयी।’

इसके बाद सब मिलकर सुश्रुषा करने लगे। देवदास ने सच कहा था- ‘आघात अधिक नही है।’

चार-पांच दिनो मे ही वह सूख गया। इसी भांति आठ-दस दिन बीत गये। फिर एक दिन रात के समय हाथीपोता गांव के जमीदार भुवनमोहन चौधरी वर बनकर विवाह करने के लिए आये। उत्सव बहुत तड़क-भड़क के साथ नही मनाया गया। भुवन बाबू नासमझ आदमी नही थी- इस प्रोढ़ावस्था मे दूसरा विवाह करने के समय छोकरा बनकर आना ठीक नही।

वर की उम्र चालीस वर्ष नही, कुछ ऊपर ही है, गौरवर्ण और मोटा-सा थुलथुल शरीर है। कच्चीपक्की मूंछे मिलाकर खिच्ड़ी हो रही थी और सिर का अगला भाग सफाचट हो रहा था। वर को देखकर कोई हंसा और कोई चुप ही रहा। भुवन बाबू शांत गंभीर मुख से किसी अपराधी की भांति विवाह मंडप मे आकर खड़े हुए। कोहबर मे स्त्रियो ने उनके साथ हंसी-मंजाक नही किया। कारण, ऐसे विज्ञ, गंभीर मनुष्य के साथ हंसी करने का किसी को साहस नही हुआ। शुभ-दृष्टि के समय पार्वती किचकिचाकिचकिचाकर देखती रही। होठ कोण मे थोड़ी हंसी की रेखा भी थी। भुवन बाबू ने छोटे बच्चो की तरह दृष्टि नीची कर ली। गांव की स्त्रियां खिलखिलाकर हंस रही थी। चक्रवर्ती महाशय इधर-उधर दौड़-धूप कर रहे थे। प्रवीण जमाता को पाकर वे कुछ व्यस्त से हो उठे। जमीदार नारायण मुखोपाध्याय आज कन्या-पक्ष के सब कर्ता-धर्ता थे। वे पक्के-प्रबंधकर्ता थे। किसी भी तरह की त्रुटि नही होने पायी। शुभ कर्म भली-भांति समाप्त हो गया।

दूसरे दिन प्रातःकाल चौधरी महाशय ने एक बॉक्स गहना बाहर निकालकर रख दिया। ये सब गहने पार्वती के शरीर मे जगमगा उठे। माता ने उसे देख आंचल से आंख का आंसू पेछा। पास ही जमीदारिन खड़ी थी, उन्होने सस्नेह तिरस्कार करके कहा- ‘आज आंख का आंसू बहाकर अशुभ न करो!’

सन्ध्या के कुछ पहले मनोरमा ने पार्वती को एक निर्जन घर मे ले जाकर आर्शीवाद दिया। कहा- ‘जो हुआ, अच्छा ही हुआ, अब देखोगी कि तुम पहले से कितने सुखी हो।’

पार्वती ने थोड़ा हसंकर कहा- ‘हां होऊंगी। जम के साथ-साथ कल थोड़ा परिचय हुआ है न!’

‘यह कैसी बात?’

‘समय पर सब देख लोगी।’ मनोरमा ने बात को दूसरी ओर घुमाकर कहा- ‘यदि तुम्हारी इच्छा हो तो एक बार देवदास को इस सोने की प्रतिमा को लाकर दिखाऊं?’

पार्वती चमक उठी- ‘ला सकती हो बहिन! क्या एक बार बुलाकर नही ला सकती?’

मनोरमा का कंठ स्वर सिहर उठा- ‘क्यो पत्तो?’

पार्वती ने हाथ का कड़ा घुमाते-घुमाते अन्यमनस्क भाव से कहा- ‘एक बार उसके पांव की धूल को सिर पर चढ़ाऊंगी, आज जाऊंगी न!’

मनोरमा ने पार्वती को छाती से लगा लिया, फिर दोनो बहुत देर तक रोती रही। सन्ध्या हो गयी, अंधकार बढ़ गया। दादी ने द्वार ठेलकर बाहर से ही कहा- ‘ओ पत्तो, ओ मनो, तुम लोग जरा बाहर आना बहिन!’

उसी रात पार्वती स्वामी के घर चली गयी।

और देवदास? उन्होने उस दिन कलकत्ता के ईडन गार्डन की एक बेच पर बैठे-बैठे सारी रात बिता दी। उन्हे अत्यंत क्लेश आथवा मार्मिक वेदना हुई हो, यह बात नही है। उनके हृदय मे न जाने कैसा एक शिथिल-उदासीन भाव धीरे-ध्ीरे जमा हो रहा था। निद्रित अवस्था मे हठात्‌ शरीर के किसी एक अंग मे पक्षपात हो जाने से नीद टूटने पर जैसे उसके ऊपर ढूंढने पर भी अपना कोई अधिकार नही पाने से विस्मित और स्तम्भित मन को ठीक नही कर पाते, क्योकि उसका आजन्म का साथी, सर्वदा का

विश्वासी अंग उसके आह्वान का कोई प्रत्युत्तर नही देता; धीरे-धीरे समझ आती है और धीरे-धीरे ज्ञान उत्पन्न होता है कि अब उस पर अपना कोई अधिकार नही है। देवदास भी ठीक उसी भांति धीरे-धीरे समझ रहे थे कि समय और संसार मे अकस्मात पक्षाघात होने से वे उनसे सर्वदा के लिए विलग हो गये। अब उनके ऊपर मिथ्या, क्रोध और अभिमान करके कुछ नही किया जा सकता। अधिक अधिकार की बात सोचने से भी भारी भूल होगी। उसके समय सूर्योदय हो रहा था। देवदास ने खड़े होकर सोचा, कहा चलूं? हठात स्मरण हुआ कि कलकत्ता के उसी मैस मे, वहां पर चुन्नीलाल है। देवदास उसी ओर चलने लगे। रास्ते मे दो बार धक्का खाया, ठोकर खाने से अंगुली लहू-लुहान हो गयी। धक्का लगने से एक आदमी के शरीर पर गिर रहे थे, उसने मतवाला कहकर ढकेल दिया। इसी भांति भटकते-भटकते सन्ध्या के समय मैस के दरवाजे पर आकर खड़े हुए। उस समय चुन्नीलाल सज-धजकर बाहर जा रहे थे- ‘यह क्या, देवदास?’

देवदास चुपचाप देखते रहे। ‘कब आये? मुंह सूखा हुआ हुआ है। नहाना खाना क्या अब तक कुछ नही हुआ?’ देवदास रास्ते मे ही बैठ गये। चुन्नीलाल हाथ पकड़कर भीतर ले गये। अपनी शैया पर बैठकर शांत करके पूछा- ‘क्या मामला है देवदास?’

‘कल मकान से आया हूं?’

‘कल सारे दिन कहां थे? रात भी कहां थे?’

‘ईडन गार्डन मे।’

‘पागल तो नही हो! क्या हुआ है।’

‘सुनकर क्या करोगो?’

‘नही कहो, अभी खाओ-पियो। तुम्हारा सामान कहां है?’

‘कुछ भी साथ नही लाया हूं।’

‘अच्छा रहने दो, अभी चलकर खाओ-पियो।’

तब चुन्नीलाल ने जोर देकर खिलाया-पिलाया; शैया पर सोने का आदेश देकर दरवाजा बंद करते-करते कहा - ‘अभी थोड़ी सोने की चेष्टा करो, मै रात को आकर तुम्हे उठाऊंगा।’ यह कहकर वे उस समय तक के लिए चले गये। रात को दस बजे उन्होने लौटकर देखा कि देवदास उनके बिछौने पर गाढ़ी नीद मे सो रहे है। उन्हे जगाया नही। एक कम्बल ओढ़कर नीचे चटाई पर सो रहे। रात-भर देवदास की नीद नही टूटी और प्रातः काल मे भी सोते ही रहे। दस बजे उठकर बैठे। पूछा- ‘चुन्नी

बाबू, कब आये?’

‘अभी आया हूं।’

‘तुम्हे किसी तरह का कष्ट तो नही हुआ?’

‘कुछ भी नही हुआ।’

देवदास ने कुछ देर तक उनके मुंह की ओर देाखकर कहा- ‘चुन्नीलाल बाबू, मेरे पास कुछ नही है, क्या तुम मुझे आश्रय दोगे?’

चुन्नीलाल कुछ हंसे। वे जानते थे कि देवदास के पिता बड़े धनवान व्यक्ति है। इसी से हंसकर कहा‘मै आश्रय दूंगा? अच्छी बात है, तुम्हारी जितने दिन इच्छा हो, यहां पर रहो, कोई चिन्ता नही।’

‘चुन्नीबाबू, तुम्हारी आमदनी कितनी है?’

‘भाई, मेरी आमदनी मामूली है। मकान पर कुछ जमीदारी है। उसे भाई साहब को सौपकर मै यहां रहता हूं। वे हर महीने सत्तर रुपये के हिसाब से भेज देते है। इतने मे तुम्हारा और मेरा खर्च अच्छी तरह से चल जायेगा।’

‘तुम मकान क्यो नही जाते?’

चुन्नीलाल ने उधर मुंह फिराकर कहा- ‘बहुत सी बाते है।’

देवदास ने और कुछ नही पूछा। धीरे-धीरे भोजन आदि की बुलाहट आई। इसके बाद दोनो भोजनादि समाप्त करके फिर धर मे आकर बैठे। चुन्नीलाल ने पूछा- ‘देवदास क्या बाप के साथ कुछ झगड़ा हो गया है।’

‘नही।’

‘और किसी के साथ?’

देवदास ने उसी भांति जवाब दिया- ‘नही।’

इसके बाद चुन्नीलाल को सहसा दूसरी बात का स्मरण आया। कहा- ‘ओहो, तुम्हारा तो अभी ब्याह नही हुआ है!’

इसी समय देवदास दूसरी ओर मुंह फेरकर सो रहे। थोड़ी ही देर मे चुन्नीलाल ने देखा कि देवदास सो गये। इसी भांति सोते-सोते और भी दो दिन बीत गये। तीसरे दिन प्रातः काल देवदास स्वस्थ होकर बैठे थे। मुख से ऐसा जान पड़ता था मानो वह घनी छाया बहुत कुछ हट गई हो। चुन्नीलाल ने पूछा- ‘आज तबीयत कैसी है?’

‘पहले से अच्छी जान पड़ती है। अच्छा चुन्नी बाबू, रात मे तुम कहां जाते हो?’

आज चुन्नीलाल ने लज्जित होकर कहा- ‘हां, मै जाता हूं, पर उसकी कौन बात है?’ अच्छा, आज कॉलेज जाओगे न?’

‘नही, लिखना-पढ़ना छोड़ दिया।’

‘छिः! ऐसा भी हो सकता है, दो महीने बाद तुम्हारी परीक्षा होगी! पढ़ना भी तुम्हारा ाख्राब नही है।

इस साल परीक्षा दो न!’

‘नही, पढ़ना छोड़ दिया।’

चुन्नीलाल चुप ही रहे। देवदास ने फिर पूछा- ‘कहां

चुन्नीलाल ने देवदास के मुंह की ओर देखकर कहा- ‘उसे जानकर क्या करोगे, मै कुछ अच्छी जगह नही जाता।’

देवदास ने अपने मन-ही-मन मे कहा- ‘अच्छी हो या बुरी इससे क्या मतलब- ‘चुन्नी बाबू, मुझे साथ ले चलोगे या नही।’

‘ले चल सकता हूं, किन्तु मत चलो।’

‘नही, मै चलूंगा। अगर अच्छा नही लगेगा, तो मै फिर नही जाऊंगा। पर तुम जिस सुख की आशा से नित्य उन्मुख रहते हो...। जो हो चुन्नीबाबू, मै निश्चित चलूंगा।’

चुन्नीलाल ने मुंह फेर, कुछ हंस के मन-ही-मन कहा- ‘मेरी दशा! प्रकट मे कहा- ‘अच्छा, चलना।’

सन्ध्या के कुछ पहले ही धर्मदास चीज-वस्तु आ पहुंचा। देवदास को देखकर रोते-रोते कहा‘देवदास आज तीन-चार दिन हुए, मां कितना रो रही है।’

‘क्यो रोती है?’

‘बिना किसी से कहे-सुने एकाएक चले आये।’ एक पत्र बाहर निकालकर हाथ मे देकर कहा- ‘मां की चिट्ठी है।’

चुन्नीलाल भीतर-ही-भीतर खबर जानने के लिए उत्सुक भाव से देख रहे थे। देवदास ने पत्र पढ़कर रख दिया। मां ने घर पर आने के लिए बड़े अनुरोध के साथ बुलाया है। घर मे ही वे केवल देवदास के मानसिक कष्ट का कुछ-कुछ अनुमान कर सकी थी। धर्मदास के हाथ छिपाकर बहुत सा रूपया भी भेज दिया था। धर्मदास ने वह सब देवदास के हाथ मे देकर कहा- ‘देवदास, घर चलो।’

‘मै नही जाऊंगा। तुम लौट जाओ!’

रात मे दोनो मित्र सज-धज के बाहर निकले। देवदास की इन सबकी ओर प्रवृत्ति नही थी; किंतु चुन्नीलाल साधारण पोषाक पहनकर बाहर चलने को राजी नही हुए। रात के नौ के समय एक किराये की गाड़ी चितपुर के एक दो तल्ले मकान के सामने आकर खड़ी हुई। चुन्नीलाल देवदास का हाथ पकड़े हुए भीतर चले गये। गृहस्वामी का नाम चन्द्रस्वामी है- उन्होने आकर अभ्यर्थना की। इस समय देवदास का सारा शरीर जल उठा। वे इधर कई दिनो से अपनी अज्ञानता मे नारी-देह की छाया के ऊपर भी विद्वेष करने लगे थे, यह सब वह स्वयं नही जानते थे। चन्द्रमुखी को देखते ही हृदय की संचित घृणा दावानल की भांति प्रज्ज्वलित हो उठी। चुन्नीलाल के मुख की ओर देखकर भौ चढ़ाकर कहा- ‘चुन्नीलाल, यह किस मनहूस जगह मे ले आये?’ उनके तीव्र कंठ और आंख की दृष्टि देखकर चन्द्रमुखी और चुन्नीलाल दोनो ही हत्‌बुद्धि से हो गये। दूसरे ही क्षण चुन्नीलाल ने अपने को संभालकर देवदास का एक हाथ पकड़कर कोमल कंठ से कहा- ‘चलिये, भीतर चलकर बैठिये।’

देवदास कुछ नही बोले, कमरे मे जाकर बिछौने पर गर्दन झुका के विपन्न-मुख बैठ गये। पास ही चन्द्रमुखी भी चपचाप बैठ गई। दासी तमाखू भरकर चांदी से मढ़ा हुआ नारियल लाई। देवदास ने स्पर्श भी नही किया। चुन्नीलाल गंभीर-मुख बैठे रहे। दासी क्या करे, यह निश्चय न कर कर सकी। अंत मे चन्द्रमुखी के हाथ मे नारियल देकर चली गई। दो-एक फूंक खीचने के समय देवदास ने उसके मुख की ओर देखा और एकाएक अत्यंत घृणा से कह उठे-‘कितने असभ्य और श्रीहीना है?’

इसके पहले चन्द्रमुखी को बातचीत मे कोई हरा नही सका था। उसको अप्रतिभ करना जरा टेढ़ी खीर थी। देवदास की इस आन्तरिक घृणा की सरल और कठिन उक्ति उसके हृदय मे बिंध गई। किंतु कुछ देर बाद ही उसने अपने को संयत कर लिया। परंतु चन्द्रमुखी के मुख से धुंआ नही निकला। तब चुन्नीलाल के हाथ मे हुक्का देकर उसने फिर एक बार देवदास के मुख की ओर देखा और फिर निःशब्द बैठी रही।

तीनो ही निर्विकार हो रहे थे। केवल बीच-बीच मे गड़-गड़ करके हुक्के का शब्द होता था, वह भी मानो डरते-डरते। मित्र मंडली मे तर्क उठने पर एकाएक निरर्थक कलह हो जाने से जैसे प्रत्येक अपने मनही-मन फूले रहते और क्षुब्ध अन्तःकरण से कहते है कि- ‘यही तो!’ ,उसी भांति तीनो आदमी मनही-मन कह रहे थे- ‘यही तो, यह कैसा हुआ?’

जो हो, तीनो मे से किसी को भी आनन्द नही मिला। चुन्नीलाल तो हुक्का रखकर नीचे उतर आये, शायद उन्हे कोई दूसरा काम नही मिला। इसलिए कमरे मे अब केवल दो आदमी रह गये। देवदास ने मुख उठाकर पूछा- ‘तुम अपनी दर्शनी लेती हो?’

चन्द्रमुखी ने सहसा कोई उत्तर नही दिया। इस समय उसकी उम्र छब्बीस वर्ष की थी। इन नौ-दस वर्ष के बीच मे उसका कितने ही विभिन्न प्रकृति के मनुष्यो के साथ घनिष्ठ परिचय हो चुका था, किन्तु इस प्रकार के अद्‌भुत मनुष्य से एक दिन भी भेट नही हुई थी। कुछ इधर-उधर करके उसने कहा‘आपके पांव की धूल जब पड़ी है...!’

देवदस ने बात समाप्त नही होने दी, बीच मे ही कह उठे- ‘पांव की धूल की बात नही रूपया लेती हो?’

‘उसके न लेने से हम लोगो का काम कैसे चलेगा?’

‘बस- यही सुनना चाहता हूं।’ यह कहकर उन्होने पॉकेट से एक नोट निकाला और चन्द्रमुखी के हाथ मे देकर चलने की तैयारी की। एक बार देखा भी नही कि कितना रूपया दिया?

चन्द्रमुखी ने विनीत भाव से कहा- ‘इतनी जल्दी जायेगे?’

देवदास ने कुछ नही कहा, बरामदे मे आकर चुपचाप खड़े हो गये।

चन्द्रमुखी की एक बार इच्छा हुई कि रुपया लौटा दे, किन्तु किसी तीव्र संकोच के कारण लौटा न सकी। सम्भवतः उसे कुछ डर भी मालूम हुआ था। इसे छोड़ उसे अनेको लांछना, भर्त्सना और अपमान सहने का अभ्यास है, इसीलिए निर्वाक्‌, निस्पन्द चौखट के ऊपर खड़ी रही। देवदास सीढ़ी से नीचे उतर गये।

सीढ़ी पर ही चुन्नीलाल से भेट हुई। उन्होने आश्चर्य से पूछा- ‘कहां जाते हो?’

‘बासे को जाता हूं।’

‘यह क्यो?’

देवदास और दो-तीन सीढ़ी उतर गये।

चुन्नीलाल ने कहा- ‘मै भी चलता हूं।’

देवदास के पास आकर उनका हाथ पकड़कर कहा- ‘चलो, थोड़ा यही पर खड़े रहो, मै ऊपर से होकर अभी आता हूं।’

‘नही, मै जाता हूं, तुम फिर आना।’ - यह कहकर देवदास चले गये।

चुन्नीलाल ने ऊपर आकर देखा, चन्द्रमुखी तब भी उसी भांति चौखट पर खड़ी है।

उसे देखकर पूछा- ‘वह चले गये?’

‘हां।’

चन्द्रमुखी ने हाथ का नोट दिखाकर कहा- ‘यह देखो, अच्छा होगा इसे ले जाओ, अपने मित्र को लौटा दो।’

चुन्नीलाल ने कहा- ‘वे अपनी इच्छा से दे गये है, फिर मै क्यो लौटा ले जाऊं?’

इतनी देर बाद चन्द्रमुखी थोड़ा हंसी, किंतु हंसी मे आनन्द का लेश नही था। उसने कहा- ‘इच्छा से नही; मै रूपया लेती हूं इसी से क्रोध करके दे गये है। हां चुन्नी बाबू, वह क्या पागल है?’

‘कुछ भी नही। आज कई दिन से शायद उनका मन ठीक नही है।’

‘क्यो नही मन ठीक है, कुछ जानते हो?’

‘मै नही जानता, शायद मकान पर कुछ हुआ है।’

‘तब यहां पर क्यो लाये?’

‘मै नही लाता था, वे खुद ही जोर देकर आये थे।’

चन्द्रमुखी इस बार यथार्थ मे विस्मित हुई। कहा- ‘खुद जोर देकर आये! सब जानकर!’

चुन्नीलाल ने कुछ सोचकर कहा- ‘और नही तो क्या? वे सभी जानते है। मै भुलवाकर नही लाया।’

चन्द्रमुखी कुछ देर तक चुप रही, फिर न जाने क्या सोचकर कहा-‘चुन्नी, मेरा एक उपकार करोगे?’

‘क्या?’

‘तुम्हारे मित्र कहां रहते है?’

‘मेरे ही साथ।’

‘एक दिन उन्हे और ला सकते हो?’

‘यह मै नही कर सकता। इसके पहले वे किसी ऐसी जगह पर नही गये थे और भविष्य मे भी अब किसी ऐसी जगह पर जाने की उम्मीद नही है। किन्तु क्यो, यह तो बताओ?’

चन्द्रमुखी ने एक मलिन हंसी हंसकर कहा- ‘चुन्नी, चाहे जैसे हो, एक बार उन्हे और लिवा लाओ।’

चुन्नी ने मुस्करा तथा आंखे मारकर कहा- ‘धमकी पाने से कही प्रेम उत्पन्न हुआ है क्या?’

चन्द्रमुखी भी मुस्करायी, कहा- ‘नही देखा, नोट दे गये है, इतना भी नही समझते!’

चुन्नी चन्द्रमुखी को कुछ पहचानते थे, सिर हिलाकर कहा- ‘नही-नही नोट वाली दूसरी होती है, तुम वैसी नही हो। सच बात कहो, क्या है?’

चन्द्रमुखी ने कहा- ‘सच बात तो यह है कि उनकी ओर कुछ मन का खिंचाव हो रहा है।’

चुन्नी ने विश्वास नही किया। हंसकर कहा- ‘इतनी देर मे?’

इस बार चन्द्रमुखी भी हंस पड़ी। कहा- ‘यह होने दो। चित्त स्वस्थ होने पर एक बार और लिवा लाना, फिर एक बार देखूंगी। लिवा लाओगे न?’

‘कह नही सकता।’

‘मेरे सिर की सौगंध है।’

‘अच्छा, कोशिश करूंगा।’

पार्वती ने आकर देखा, उसके स्वामी की बहुत बड़ी हवेली है। नये साहिबी फेशन की नही, पुराने ढंग की है। सदर-महल, अन्दर-महल, पूजा का दालान, नाट्‌य-मंदिर, अतिथिशाला, कचहरी घर, तोशाखाना और अनेक दास-दासियो को देखकर पार्वती आवाक्‌ रह गयी। उसने सुना था कि उसके स्वामी बड़े आदमी और जमीदार है। किंतु इतना नही सोचा था। अभाव केवल आदमियो का था, अर्थात्‌ आत्मीय कुटुम्ब-कुटुम्बिनी प्रायः कोई नही है। इतना बड़ा अन्तःपुर जन-शून्य था। पार्वती नववधू है, किन्तु एकदम गृहिणी हो बैठी। परछन करके घर मे लाने के लिए केवल एक बूढ़ी फूफी थी, इन्हे छोड़ सब दास-दासियो का दल था।

सन्ध्या के कुछ पहले एक सुन्दर सुकान्तिवान बीस वर्षीय नव युवक ने प्रणाम करके पार्वती के निकट खड़े होकर कहा - ‘मां, मै बड़ा लड़का हूं।’

पार्वती ने घूंघट के भीतर से ही देखा, कुछ कहा नही। उसने फिर एक बार प्रणाम करके कहा- ‘मां, मै आपका बड़ा लड़का हूं, प्रणाम करता हूं।’

पार्वती ने लंबे घूंघट को सिर पर उठा, मृदु कंठ से कहा- ‘यहां आओ भाई, यहां आओ।’

लड़के का नाम महेन्द्र है। वह कुछ देरी तक पार्वती के मुख की ओर अवाक्‌ होकर देखता रहा; फिर पास मे बैठकर विनीत स्वर मे कहा- ‘आज दो वर्ष हुए, मेरी मां का स्वर्गवास हो गया। इन दो वर्षों का समय हम लोगो का बड़े दुख और कष्ट से बीता है। आज तुम आयी हो, आर्शीवाद दो कि अब हम लोग सुख से रहे।’

पार्वती खुलकर सरल भाव से बातचीत करने लगी। क्योंकि एकबारगी गृहिणी होने से कितनी ही बातो को जानने ओर कितनी ही बार लोगो से बातचीत करने की जरूरत पड़ती है। किंतु यह कहना कितने ही लोगो को कुछ अस्वाभाविक जंचेगा, पर जिन्होने पार्वती के स्वभाव को अच्छी तरह से समझा है, वे देखेगे कि अवस्था के इन अनेक परिवर्तनो ने उनकी उम्र की अपेक्षा उसे कही अधिक परिपक्व बना दिया है। इसके अतिरिक्त निरर्थक लोक-लज्जा, अकारण जड़ता, संकोच उसमे कभी नही था। उसने पूछा- ‘हमारे और सब लड़के कहां है?’

महेन्द्र ने जरा हंसकर कहा- ‘तुम्हारी बड़ी लड़की- मेरी छोटी बहिन- अपनी ससुराल मे है, मैने उसके पास चिट्‌ठी लिखी थी, पर यशोदा किसी कारणवश नही आ सकी।’

पार्वती ने दुखित होकर पूछा- ‘आ नही सकी या स्वयं इच्छा से नही आयी?’

महेन्द्र ने लज्जित होकर कहा- ‘ठीक नही जानता, मां!’

किन्तु उसकी बात बात और मुख के भाव से पार्वती समझ गयी कि यशोदा क्रोध के कारण नही आयी है; कहा- ‘और हमारा छोड़ा लड़का?’

महेन्द्र ने कहा- ‘वह बहुत जल्दी आयेगा, कलकत्ता मे परीक्षा देकर आयेगा।’

चौधरी महाशय स्वयं ही जमीदारी का काम देखते थे। इसे छोड़ वे नित्य शालिग्राम की बटिया की अपने हाथ से पूजा करते थे; अतिथिशाला मे जाकर साधु संन्यासियो की सेवा करते थे। इन सब कामो मे उनका सुबह से लेकर रात के दस-ग्यारह बजे तक का समय लग जाता था। नवीन विवाह के करने से किसी नवीन आमोद-प्रमोद के चिन्ह उनमे नही दिखायी पड़ते थे। रात मे किसी दिन भीतर आते और किसी दिन नही आ सकते थे। आते भी तो बहुत मामूली बातचीत होती थी। चारपाई पर सोकर एक गावतकिया लगाकर आंख मूंदते-मूंदते यदि बहुत कहते तो केवल यही कि ‘देखो, तुम्हीं घर की मालकिन हो, सब अच्छी तरह से देख-सुन के और समझ-बूझ के काम करना।’

पार्वती सिर हिलाकर कहती- ‘अच्छा!’

भुवन बाबू कहते-‘और देखो, ये लड़की-लड़के... हां, ये सब तो तुम्हारे ही है।’

स्वामी की लज्जा को देखकर पार्वती की आंख के कोने से हंसी फूट निकलती थी। वे भी थोड़ा हंसकर कहते-‘हां, और देखो, यह महेद्र तुम्हारा बड़ा लड़का है। अभी उस दिन बी.ए. पास हुआ है।

इसके समान अच्छा लड़का-इसके समान मोहब्बती-अहा इस...!’

पार्वती हंसी दबाकर कहती-‘मै जानती हूं, यह मेरा बड़ा लड़का है।’

यह तुम क्यो जानोगी। ऐसा लड़का कही भी नही देखने मे आया। और मेरी यशोमती लड़की नही, एकदम लक्ष्मी की प्रतिमा है। वह अवश्य आयेगी-क्या बूढ़े बाप को देखने नही आयेगी? उसके आने से....!’

पार्वती निकट आकर गंजे सिर पर अपने कमलवत कोमल हाथ को रखकर मृदु स्वर से कहती‘तुम को इसकी चिंता नही करनी होगी। यशोदा को बुलाने के लिए मै आदमी भेजूंगी, नही तो महेद्र खुद ही जायेगा।’

‘जायेगा! जायेगा! अच्छा, बहुत दिन बिना देखे हुए। तुम आदमी भेजोगी?’

‘जरूर भेजूंगी। मेरी लड़की है मै बुलवाऊंगी नही?’

वृद्ध इस समय उत्साहित हो उठ बैठते। परस्पर के संबंध को भूलकर पार्वती के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते और कहते-‘तुम्हारा कल्याण हो! मै आशीर्वाद देता हूं, तुम सुखी हो, भगवान तुम्हे दीर्घायु करे!’

इसके बाद सहसा न जाने कौन-कौन सी बाते वृद्ध के मन मे उठने लगती थी। फिर चारपाई पर आंखे मूंदकर मन-ही-मन कहते-आह! वह मुझे बहुत ह्रश्वयार करती थी।

इसी समय कच्ची मूंछो के पास से बहकर एक बूंद आंख का आंसू तकिये पर गिर पड़ता। पार्वती पोछ देती थी। कभी-कभी वे भीतर-ही-भीतर कहते-‘अहा! उन सभी लोगो के आ जाने से एक बार फिर घर-द्वार जगमगा उठेगा...अहा! उन सभी लोगो के आ जाने से एक बार फिर घर द्वार जगमगा उठेगा...अहा! पहले कैसी चहल-पहल रहती थी। लड़का-लड़की, घर मे सब कोई थे, नित्य दुर्गोत्सव का आनंद रहता। फिर एक दिन सबका अंत हो गया। लड़के कलकत्ता चले गये, यशो को

उसके ससुर ले गये, फिर अंधकार, श्मशान....।’

इसी समय फिर मूंछो के दोनो ओर से आंसू बह-बहकर तकिये को भिगोने लगे। पार्वती कातर होकर आंसू पोछते-पोछते कहने लगी-‘महेद्र का क्यो नही विवाह किया?’

बूढ़े कहते-‘अहा, वह मेरे कैसे सुख का दिन होता! यही तो सोचता था। किंतु उसके मन की बात कौन जाने? उसकी जिद को कौन तोड़े? किसी तरह से ब्याह नही किया। इसीलिए तो बुढ़ापे मे...सारा घर भांय-भांय करता था, सारा घर दुखित था, लक्ष्मी को छोड़ दरिद्र का वास होने लगा था;

कोई घर में चिराग जलाने वाला नही रहा। यह सब देखा नही जाता था इसीलिए तो...।’

यह बात सुन पार्वती बड़ी दुखी होती। करूण-स्वर से, हंसी के साथ सिर हिलाकर कहती-‘तुम्हारे बूढ़े होने से मै शीघ्र ही बूढ़ी हो जाऊंगी। स्त्रियो को बूढ़ी होने मे क्या देरी लगती है?’

भुवन चौधरीजी उठकर बैठते; एक हाथ उसके चिबुक पर रखकर निःशब्द उसके मुख की ओर बहुत देर तक देखते रहते। जिस तरह कारीगर अपनी प्रतिमा को सजाकर, सिर मे मुकुट पहनाकर, दाहिने-बाएं घुमाकर बहुत देर तक देखता रहता है-फिर थोड़ा गर्व और अधिक स्नेह का भाव उत्पन्न होता है। ठीक उसी भांति भुवन बाबू को भी होता है। किसी दिन उनके अस्फुट मुख से बाहर निकल पड़ता-‘आहा!

अच्छा नही किया।’

‘क्या अच्छा नही किया?’

‘सोचता हूं, यहां पर तुम्हारी शोभा नही है।’

पार्वती हंसकर कहती-‘खूब शोभा है। हम लोगो कि क्या वृद्ध फिर लेटकर मन-ही-मन कहते-मै समझता हूं, वह मै समझता हूं। तब तुम्हारा भला हो। भगवान

तुम्हे देखेगे।

इसी भांति एक महीना बीत गया। बीच मे एक बार चक्रवर्ती महाशय कन्या को लेने आये थे। पार्वती अपनी इच्छा से नही गयी। पिता से कहा-‘बाबूजी, बड़ी कच्ची गृहस्थी है, कुछ दिन बाद जाऊंगी।’

वे भीतर-ही-भीतर हंसे और मन-ही-मन कहा स्त्रियो की जाति ही ऐसी है। वे चले गये, पार्वती ने महेद्र को बुलाकर कहा-‘भाई, एक बार मेरी बड़ी लड़की को बुला लाओ।’

महेद्र इधर-उधर करने लगा। वह जानता था कि यशोदा किसी तरह नही आयेगी। कहा-‘एक बार बाबूजी का जाना अच्छा होगा।’

‘छिः यह क्या अच्छा होगा? इससे तो अच्छा है कि हमीं मां-बेटे चलकर बुला लावे।’

महेद्र ने आश्चर्य से कहा-‘क्या तुम जाओगी?’

‘क्या नुकसान है? मुझको इसमे लज्जा नही है। मेरे जाने से अगर यशोदा आवे, अगर उसका क्रोध दूर हो जाये, तो मेरा जाना कौन कठिन है?’

अस्तु, महेद्र दूसरे ही दिन यशोदा को लाने गया। उसने वहां जाकर कौन-सा कौशल किया, यह मै नही जानता, किंतु चार ही दिन बाद यशोदा आ गयी। उस दिन पार्वती सारी देह मे विचित्र, नये और बहुत मूल्यवान गहने पहने थी। कुछ ही दिन हुए इन्हे भुवन बाबू ने कलकत्ता से मंगवा लिया था।

पार्वती आज वही सब गहने पहने हुए थी। रास्ते मे आते समय यशोदा बहुतेरी क्रोध और अभिमान की बातो को मन-ही-मन दुहरा रही थी। नयी बहू को देखकर वह एकदम अवाक्‌ हो गयी। कोई भी विद्वेष की बात उसके मन मे नही रही। केवल अस्फुट स्वर से कहा-‘यही!’

पार्वती यशोदा का हाथ पकड़ कर घर ले गयी। पास मे बैठकर एक पंखा हाथ मे लेकर कहा‘यशोदा, मां के ऊपर इतना क्रोध करना होता है?’

यशोदा का मुख लज्जा से लाल हो उठा। पार्वती तब सारे गहने एक-एक करके यशोदा के अंग मे पहनाने लगी। यशोदा ने विस्मित होकर पूछा-‘यह क्या?’

‘कुछ नही, सिर्फ मां की साथ।’

गहना पहनने से यशोदा का शरीर खिल उठा और पहन चुकने पर उसके अधर पर हंसी की रेखा दिखाई दी। सारे शरीर मे आभूषण पहनाकर निराभरण पार्वती ने कहा-‘यशोदा, मां के ऊपर भला क्रोध करना चाहिए?’

‘नही, नही क्रोध कैसा? क्रोध किस पर?’

‘सुनो यशोदा, यह तुम्हारे बाप का घर है; इतने बड़े मकान मे कितने ही दास-दासियो की जरूरत है।

मै भी तो एक दासी हूं। छिः बेटी, तुच्छ दासी के ऊपर इतना क्रोध करना क्या तुम्हे शोभा देता है?’

यशोदा अवस्था मे बड़ी है, किंतु बातचीत करने मे छोटी है। वह विह्वल हो गयी। पंखा हांकतेहां कते पार्वती ने फिर कहा-‘दुखी की लड़की को तुम लोगो की दया से यहां पर थोड़ा-सा स्थान मिला है; मै तो भी उन्ही मे से एक हूं। आश्रित....।’

यशोदा सब तल्लीन होकर सुनती रही। अब एकाएक आत्म-विस्मरण कर पांव के पास धप्‌ से गिरकर प्रणाम करके कहा-‘तुम्हारे पांच लगती हूं मां।’

दूसरे दिन महेद्र को अकेले मे बुलाकर कहा-‘क्यो, क्रोध कम हुआ?’

यशोदा ने भाई के पांच पर हाथ रखकर चटपट कहा-‘भैया, क्रोध के वश, छिः-छिः, कितनी ही बाते कही है, देखो वे सब प्रकट न होने पावे।’

महेद्र हंसने लगा। यशोदा ने कहा-‘अच्छा भैया, क्या कोई सौतेली मां इतना आदर-भाव करती रख सकती है?’

दो दिन बाद यशोदा ने पिता से आकर आप ही कहा-‘बाबूजी, वहां पर चिट्ठी लिख दो कि मै अभी और दो महीने यही पर रहूंगी।’

भुवन बाबू ने कुछ आश्चर्य से कहा-‘क्यो बेटी?’

यशोदा ने कहा-‘मेरी तबीयत कुछ अच्छी नही है, इसी से कुछ दिन छोटी मां के पास रहूंगी।’

आनंद से वृद्ध की आंखो मे आंसू उमड़ आये। संध्या को पार्वती को बुलाकर कहा-‘तुमने मुझे लज्जा से मुक्त कर दिया। जीती रहो, सुखी रहो!’

पार्वती ने कहा-‘वह क्या?’

‘वह क्या, यह तुम्हे नही समझा सकूंगा। नारायण ने आज कितनी ही लज्जा से मेरा उद्धार कर दिया।’

संध्या के अंधेरे मे पार्वती ने नहीं देखा कि उसके स्वामी की दोनो आंखे जल से डबडबा आयी है। और विनोद लाल-भुवन बाबू का छोटा लड़का, वह परीक्षा देकर घर आया, अभी तक पढ़ने ही न गया।

दो-तीन दिवस देवदास ने पागलो की भांति इधर-उधर घूम-घामकर बिताये। धर्मदास कुछ कहने गया तो उस पर आंखें लाल-लाल कर धमका के भगा दिया। उनका विकृत भाव देखकर चुन्नीलाल को भी कुछ कहने का साहस न हुआ। धर्मदास ने रोकर कहा-‘चुन्नी बाबू, देवदास ऐसे क्यो हो गये?’

चुन्नीलाल ने कहा-‘क्या हुआ धर्मदास?’

एक अंधे ने दूसरे अंधे से रास्ता पूछा। दोनो मे एक भी हृदय की नही जानते, आंखे पोछतेपोछते धर्मदास ने कहा-‘चुन्नी बाबू, जिस तरह से हो सके, देवदास को उनकी मां के पास पहुंचवाओ; अगर अब लिखे पढ़ेगे नही तो यहां रहने की जरूरत क्या?’

बात बहुत सच है। चुन्नीलाल सोचने लगे। चार-पांच दिन बाद एक दिन संध्या के ठीक उसी समय चुन्नी बाहर रहे थे। देवदास ने कही से आकर उनका हाथ थामकर कहा-‘चुन्नी बाबू, वही जाते हो?’

चुन्नी ने कुंठित होकर कहा-‘हां, नही कहो तो न जाऊं।’

देवदास ने कहा-‘नही, मै अपने को मना नही करता हूं; पर यह कहो, किस आशा से तुम वहां जाते हो?’

‘आशा क्या है? यो ही जी बहलाने को।’

‘जी बहलाने? मेरा तो जी नही बहला। मै भी जी बहलाना चाहता हूं।’

चुन्नी बाबू कुछ देर तक उनके मुख की ओर देखते रहे। संभवतः उनके मुख से उनके मन के भाव को जानने की चेष्टा करते थे। फिर कहा-‘देवदास, तुम्हे क्या हुआ है, साफ-साफ कहो?’

‘कुछ भी नही हुआ है।’

‘नही कहोगे?’

चुन्नीलाल ने बहुत देर बाद नीचा सिर किये हुए कहा-‘देवदास मेरी एक बात रखोगे?’

‘क्या?’

‘वहां पर तुमको एक बार और चलना होगा? मैने वचन दिया है।’

‘जहां उस दिन गया था?’

‘हां।’

‘वहां पर तुमको एक आर और चलना होगा? मैने वचन दिया है।’

‘जहां उस दिन गया था?’

‘हां।’

‘छिः! वहां मुझे अच्छा नही लगता।’

‘जिससे अच्छा लगेगा, मै वही करूंगा।’

देवदास अन्यमनस्क की भांति कुछ देर चुप रहे; फिर कहा-‘अच्छा चलो, मै चलूंगा।’

अवनति की एक सीढ़ी नीचे उतरकर चुन्नीलाल न जाने कहां चले गये। अकेले देवदास ही चंद्रमुखी के घर के नीचे के खंड मे बैठकर शराब पी रहे है। पास ही चंद्रमुखी विषण्ण-मुख से बैठी हुई देख रही है। उसने कहा-‘देवदास, अब मत पियो।’

देवदास ने शराब का ग्लास नीचे रखकर भौ चढ़ाकर कहा-‘क्यो?’

‘अभी थोड़े ही दिन से शराब नही पीता हूं। यहां रहने के लिए शराब पीता हूं।’

यह बात चंद्रमुखी कई बार सुन चुकी है। दो-एक बार उसने सोचा कि कही दीवाल से टकराकर वे लहू की नदी बहाकर मर न जाये। देवदास को वह ह्रश्वयार करती थी। देवदास ने शराब के ग्लास को ऊपर के उछाल दिया, कौच के पांव से लगकर चह चूर-चूर हो गया। फिर तकिये के सहारे लेटकर लड़खड़ाती हुई जबान से कहा-‘मुझमे उठने का बल नही है, इसी से यहां पड़ा रहता हूं, ज्ञान नही है, इसी से तुम्हारे मुख की ओर देखकर बात करता हूं, चंद...र...तब अज्ञानता नही रहती, थोड़ा-सा ज्ञान रहता है। तुम्हे छू नही सकता, मुझे बड़ी घृणा होती है।’

चंद्रमुखी आंख निकालकर धीरे-धीरे कहा-‘देवदास, यहां कितने ही आदमी आते है, किंतु वे लोग शराब छूते तक नही।’

देवदास आंख निकालकर उठ बैठे। कुछ झूमते हुए इधर-उधर हाथ फेककर कहा-‘छूते नही? मेरे पास बंदूक होती तो गोली मार देता वे लोग मुझसे भी अधिक पापिष्ठ है, चंद्रमुखी!’

कुछ देर सोचने लगे; फिर कहा-‘यदि कभी शराब का पीना छोड़ दूं-यद्यपि छोड़ूगा नही-तो फिर यहां कभी न आऊंगा। मुझे उपाय मालूम है; पर उन लोगो का क्या होगा?’

थोड़ा रूककर फिर कहने लगे-‘बड़े दुख से शराब को अपनाया है। मेरी विपद और दुख की साथिन! अब तुझे कभी नही छोड़ सकता।’ देवदास तकिये के ऊपर मुंह रगड़ने लगे। चंद्रमुखी ने चटपट पास आकर मुख उठा लिया। देवदास ने भौ चढ़ाकर कहा-‘छिः, छूना नही, अभी मुझमे ज्ञान है।

चंद्रमुखी, तुम नही जानती-केवल मै जानता हूं कि मै तुमसे कितनी घृणा करता हूं। सर्वदा घृणा करूंगा-तब भी आऊंगा, तब भी बैठूंगा, तब भी बाते करूंगा। इसे छोड़ दूसरा उपाय नही है। इसे क्या तुम लोग कोई समझ सकती हो? हा-हा! लोग पाप अंधेरे मे करते है, और मै यहां मतवाला हूं-ऐसा उपयुक्त स्थान जगत मे और कहां है? और तुम लोग....’

देवदास ने दृष्टि ठीक कर कुछ देर तक उसके विषण्ण मुख की ओर देखकर कहा-‘आहा! सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति! लांछना, भर्त्सना, अपमान, अत्याचार, उपद्रव इस सबको स्त्री सह सकती है-तुम्ही इसका उदाहरण हो!’

फिर चित होकर गए धीरे-धीरे कहने लगे-‘चंद्रमुखी कहती है कि वह मुझे बहुत ह्रश्वयार करती है। मै यह नही चाहता-नही चाहता-नही चाहता-लोग थियेटर करते है, मुख में चूना और कालिख पोतते है भिक्षा मांगते है - राजा बनते है - ह्रश्वयार करते है, कितनी ही ह्रश्वयार की बाते करते है-कितना रोते है-मानो सब ठीक है, सत्य है! मेरी चंद्रमुखी थियेटर करती है, मै देखता हूं। किंतु वह जो बहुत याद आती है, क्षण भर मे सब हो गया। वह कहां चली गई-और किस रास्ते से मै आया हूं? अब एक सर्व जीवनव्यापी मस्त अभिनय आरंभ हुआ है, एक घोर तवाला-और यही एक-होने दो, हो-हर्ज क्या?

आशा नही, है वही भरोसा है-सुख भी नही, साध भी नही-वाह! बहुत अच्छा!’

इसके बाद देवदास करवट बदलकर न जाने क्यो बक-झक करने लगे। चंद्रमुखी उन्हे नही समझ सकी। थोड़ी देर मे देवदास सो गये। चंद्रमुखी उनके पास आकर बैठी। आंचल भिगोकर मुख पोछ दिया और भीगे हुए तकिये को बदल दिया। एक पंख लेकर कुछ देर हवा की, बहुत देर तक नीचा सिर किये बैठी रही। तब रात के एक बज गये थे, वह दीपक बुझा कर द्वार बंद कर दूसरे कमरे मे चली गयी।

दोनो भाई-द्विजदास और देवदास-तथा गांव के बहुत-से लोग जमीदार मुखोपाध्याय की अंतेष्टिक्रिया समाप्त कर घर लौट आये। द्विजदास चिल्ला-चिल्लाकर रोते-रोते पागल की भांति सो गये, गांव के पांच-पांच, छः-छः आदमी उनको पकड़कर रख नही सकते थे और देवदास शांत भाव से खंभे को पास बैठे थे। मुख मे एक शब्द नही था, आंखो मे एक बिंदु जल नही था, कोई उनको पकड़ने भी नही जाता था, कोई सान्त्वना भी नही देता था। केवल मधुसूदन घोष ने एक बार पास आकर कहा‘भाई, यह सब ईश्वर के अधीन की बात है। इसमे....।’

देवदास ने द्विजदास की ओर हाथ से दिखाकर कहा-‘वहां...’

घोष महाशय ने अप्रतिभ होकर कहा-‘हां-हां, उनको तो बहुत शोक...।’

इत्यादि कहते-कहते चले गये। और कोई पास नही आया। दोपहर बीतने पर देवदास मूर्च्छिता माता के पांव के पास जाकर बैठे। वहां पर बहुत-सी स्त्रियां उनको घेरकर बैठी थी। पार्वती की दादी भी उन्ही मे बैठी थी। टूटे-टूटे स्वर से शोकार्त विधवा माता से कहा-‘बहू, देखो, देवदास आया है।’

देवदास ने बुलाया-‘मां!’

उन्होने केवल एक बार देखकर कहा-‘देवदास!’ फिर डबडबायी हुई आंखो से झर-झर आंसू गिरने लगे। स्त्रियां भी चिल्ला उठी। देवदास कुछ देर तक माता के चरणाें मे अपना मुख ढके रहे, फिर उठकर चले गये-पिता के सोने के कमरे मे। आंखो मे जल नही था। मुख गंभीर तथा शांत था। लाल-लाल आंखो को ऊपर चढ़ाये हुए जाकर भूमि पर बैठ गये। उस मूर्ति को यदि कोई देखता तो संभवतः भयभीत हो जाता। दोनो कनपटियां फूली हुई थी। बड़े-बड़े रूखे केश ऊपर की ओर खड़े थे।

तपाये हुए सोने के समान शरीर का रंग काला पड़ गया। कलकत्ता के जघन्य अत्याचार मे रातो का दीर्घ जागरण हुआ था-और उस पर पिता की मृत्यु हुई। एक वर्ष पहले अगर उनको कोई देखे होता; तो संभवतः एकाएक को पहचान न सकता। कुछ देर के बाद पार्वती की माता उन्हे ढूंढती हुई दरवाजा ठेलकर भीतर आई और पुकारा-‘देवदास!’

‘क्या है छोटी चाची?’

‘ऐसा करने से तो नही चलेगा।’

देवदास ने उनके मुंह की ओर देखकर कहा-‘क्या करता हूं चाची?’

चाची सब समझती थी, किंतु कह नही सकी। देवदास के सिर पर हाथ फेरते-फेरते कहा-‘देवतामेरा!’

‘क्या चाची?’

‘देवता-’

इस बार देवदास ने उसकी गोद मे अपना मुख छिपा लिया, आंखो से दो बूंद गरम-गरम आंसू गिर पड़े।

शोकार्त परिवार की दिन भी किसी भांति बीता। नियमित रूप से प्रभावित हुआ, रोना-धोना बहुत कम हो गया। द्विजदास धीरे-धीरे अपने आपे मे आये। उनकी माता भी कुछ संभल कर बैठी। आंख पोछते पोछते आवश्यक काम करने लगी। दो दिन बाद द्विजदास ने देवदास को बुलाकर कहा-देवदास, पिता के श्राद्व-कर्म के लिए कितना रुपया खर्च करना उचित है?’

देवदास ने भाई के मुख की ओर देखकर कहा-‘जो आप उचित समझे, करे।’

‘नही भाई, केवल मेरे ही उचित समझने से काम नही चलेगा, अब तुम भी बड़े हुए तुम्हारी सम्मति भी लेना आवश्यक है।’

देवदास ने पूछा-‘कितना नकद रुपया है।’

‘बाबूजी की तहवील मे डेढ़ लाख रुपया जमा है। मेरी सम्मति से दस हजार रुपये खर्च काफी होगा, क्या कहते हो?’

‘मुझे कितना मिलेगा?’

द्विजदास ने कुछ इधर-उधर करके कहा-‘तुम्हे भी आधा मिलेगा, दस हजार खर्च होने से सत्तर हजार तुम्हे और सत्तर हजार मुझे मिलेगा।’

‘मां नकद रुपया लेकर क्या करेगी? वे तो घर की मालकिन ही है। हम लोग उनका खर्च संभालेगे।’

देवदास ने कुछ सोचकर कहा-‘मेरी सम्मति है कि आपके भग से पांच हजार रुपया खर्च हो और मेरे भाग से पच्चीस हजार रुपया खर्च हो, बाकी पच्चीस हजार मां के नाम जमा रहेगा। आपकी क्या सम्मति है?’

पहले द्विजदास कुछ लज्जित हुए। फिर कहा-‘अच्छी बात है। किंतु यह तो जानते ही हो कि मेरे स्त्रीपुत्र और कन्या है। उनके यज्ञोपवीत, विवाह आदि मे बहुत खर्च पड़ेगा। इसलिए यही सम्मति ठीक है।’

फिर कुछ ठहर कर कहा-‘तो क्या जरा-सी इसकी लिखा-पढ़ी कर दोगे?’

‘लिखने-पढ़ने का क्या काम है? यह काम अच्छा नही मालूम होगा। मेरी इच्छा है कि रुपये पैसे की बात इस समय छिपी-छिपाई रहे।’

‘तो अच्छी बात है; किंतु क्या जानते हो भाई...?’

‘अच्छा मै लिखे देता हूं।’ उसी दिन देवदास ने लिख-पढ़ दिया।

दूसरे दिन दोपहर के समय देवदास सीढ़ी से नीचे उतर रहे थे। बीच मे पार्वती को देखकर रुक गए।

पार्वती ने मुख की ओर देखा-देखकर पहचानते हुए उसे क्लेश हो रहा था। देवदास ने गंभीर और शांत मुख से आकर कहा-‘कब आयी पार्वती?’

वही कंठ-स्वर आज तन वर्ष बाद सुना। सिर नीचा किये हुए पार्वती ने कहा-‘आज सुबह आयी।’

‘बहुत दिन से भेट नही हुई अच्छी तरह से तो रही?’ पार्वती सिर नीचा किये रही।

‘चौधरी महाशय अच्छी तरह से है? लड़के-लड़की सब अच्छी तरह से है?’

‘सब अच्छी तरह से है।’ पार्वती ने एक बार मुख की ओर देखा, पर एक भी बात पूछ नही सकी वे कैसे है, क्या करते है, इत्यादि वह कुछ भी पूछ नही सकी।

देवदास ने पूछा-‘अभी तो यहां कुछ दिन रहना होगा?’

‘हां।’

‘तब फिर क्या’-कह कर देवदास चले।

श्राद्ध समाप्त हो गया। उसका वर्णन करने मे बहुत कुछ लिखना पड़ेगा, इसी से उसके कहने की आवश्यकता नही है। श्राद्ध के दूसरे दिन पार्वती ने धर्मदास को अकेले मे बुलाकर उसके हाथ मे एक सोने का हार देकर कहा-‘धर्म, अपनी कन्या को यह पहना देना।’

धर्मदास ने मुंह की ओर देखकर आर्द्र नेत्र और करूण कंठ-स्वर से कहा-‘अहा! तुमको बहुत दिनो से नही देखा, सब कुशल तो है?’

‘सब कुशल है। तुम्हारी लड़की-लड़के तो अच्छे है?’

‘हां पत्ताें, सब अच्छे हैं।’

‘तुम अच्छे हो?’

इस बार दीर्घ निःश्वास खीचकर धर्मदास ने कहा-‘क्या अच्छा हूं? अब यह जीवन भार-सा मालूम होता है-मालिक ही चले गये...।’ धर्मदास शोक के आवेग मे कुछ और कहना चाहता था, किंतु पार्वती ने बाधा दी। इस सब बातो को सुनने के लिए उसने हार नही दिया था।

पार्वती ने कहा-‘यह क्यो धर्मदास, तुम्हारे जाने से देव दादा को कौन देखेगा?’

धर्मदास ने माथा ठोककर कहा-‘जब छोटे लड़के थे, तब देखने की जरूरत थी। अब नही देखने से ही अच्छा है।’

पार्वती ने और पास आकर कहा-‘धर्म, एक बात सच-सच बताओगें?’

‘क्यो नही बताऊंगा, पत्तो?’

‘तब सच-सच कहो कि देवदास इस समय अभी क्या कर रहे है?’

‘मेरा सिर कर रहे है, और क्या करेगे?’

‘धर्मदास, साफ-साफ क्यो नही कहते?’

धर्मदास ने फिर सिर पीटकर कहा-‘साफ-साऊ क्या कहूं? भला यह कुछ कहने की बात है। अब मालिक नही है। देवदास के हाथ अगाध रुपया लग गया है, अब क्या रक्षा हो सकेगी?’

पार्वती का मुख एकबारगी मलिन पड़ गया। उसने आभास और संकेत से कुछ सुना था। दुखित होकर पूछा-‘क्या कहते हो धर्मदास?’ वह मनोरमा के पत्रो से जब कोई समाचार पाती थी तो उस पर विश्वास नही करती थी। धर्मदास सिर नीचा करके कहने लगा-‘खाना नही, पीना नही, सोना नही, केवल बोतल पर बोतल शराब, तीन-तीन, चार-चार दिन तक न जाने कहां रहते है, कुछ पता नही। कितने ही रुपये फूंक दिए। सुनता हूं, कई हजार रुपये का गहना बनवा दिया।’

पार्वती सिर से पैर तक सिहर उठी-‘धर्मदास, यह क्या कहते हो? क्या यह सब सच है?’

धर्मदास ने अपने मन मे ही कहा-शायद तुम्हारी बात सुने, तुम एक बार मनाकर देखो। कैसा शरीर था, कैसा हो गया? ऐसे असंयम और अत्याचार से कितने दिन जिएेंगे? किससे यह बात कहूं मां, बाप, भाई से ऐसी बात नही कही जाती। धर्मदास ने फिर सिर ठोक कर कहा-‘इच्छा होती है, जहर खाकर मर जाऊं पत्तों, अब आगे जीने की साध नही है।’

पार्वती उठकर चली गई। नारायण बाबू के मरने का समाचार पाकर वह चली आई थी। सोचा था, इस विपत्ति के समय देवदास के पास जाना आवश्यक है। किंतु उसके परमप्रिय देवदास की यह अवस्था है!

कितनी ही बाते उसके मन मे उठने लगी, जिनका अंत नही। जितना धिक्कार उसने देवदास को दिया, उसका हजार गुना अपने को दिया। हजार बार उसके मन मे उठा कि क्या उसके होने पर वह ऐसे बिगड़ सकते? पहले ही उसने अपने पांव मे आप कुठार मारा, किंतु वह कुठार उसके सिर पर गिरा। उसके देव दादा ऐसे हो रहे है।-इस प्रकार नष्ट हो रहे है, और वह दूसरे की गृहस्थी के बनाने मे लगी हुई है, दूसरे को अपना समझकर नित्य अन्न बांट रही है, और उसके सर्वस्व-आज भूखो मर रहे है! पार्वती ने प्रतिज्ञा की आज वह देवदास के पांव में माथा पटक कर प्राण त्याग देगी।

अभी भी संध्या होने मे कुछ देर है। पार्वती ने देवदास के कमरे मे प्रवेश किया। देवदास चारपाई पर बैठे हुए हिसाब देख रहे थे, इधर देखा-पार्वती धीरे-धीरे किवाड़ बंद कर फर्श पर बैठ गई। देवदास ने सिर उठाकर, हंसकर उसकी ओर देखा, उनका मुख विषण्ण, किंतु शांत था। हठात कौतुक से पूछा-‘यदि मै अपवाद उठाऊं तो?’

पार्वती ने अपनी सलज्ज, श्याम कमलवत दोनो आंखो से एक बार उनकी ओर देखा, फिर नजर नीची कर ली। देवदास की इस बात ने भली-भांति जता दिया कि वह बात उनके हृदय मे आजन्म के लिए अंकित हो गई है। वह देवदास से कितनी ही बाते कहने के लिए आयी थी, किंतु सब भूल गई, एक भी बात न कह सकी। देवदास ने फिर हंसकर कहा-‘समझता हूं, समझता हूं! लज्जा लगती है न?’ तब भी पार्वती कोई बात न कह सकी। देवदास ने कहा-‘इसमे लज्जा की क्या बात है? हम तुम दोनो ही लड़कपन मे बराबर एक साथ उठते-बैठते और खेलते थे। इसी बीच मे एक गड़बड़ी हो गई। क्रोध करके जो तुम्हारे जी मे आया कहा, और मैने भी तुम्हारे सिर मे यह दाग दे दिया। कैसा हुआ?’

देवदास की बात मे श्लेष व विद्रूप का लेश भी नही था; हंसते-ही-हंसते पहले की बीती दुख की कहानी कह सुनाई। पार्वती का हृदय भी सुनकर फटने लगा। मुंह मे आंचल देकर एक गहरी सांस खीचकर मन-ही-मन कहा-देव दादा, यह दाग ही मेरे ढाढस का कारण है, एकमात्र यही मेरा साथी है।

तुम मुझे ह्रश्वयार करते थे, इसी से दया करके, हम लोगो के बाल्य-इतिहास को इस रूप मे, इस ललाट मे अंकित कर दिया है। इससे मुझे लज्जा नही, कलंक नही, यह मेरे गौरव का चिह्न है।

‘पत्तो!’

मुख से आंचल न हटाकर ही पार्वती ने कहा-‘क्या?’

‘तुम्हारे ऊपर मुझे बड़ा क्रोध आता है।’

इस बार देवदास का कंठ-स्वर विकृत हो गया-‘बाबूजी नही है, आज मेरे विपत्ति का समय है, किंतु तुम्हारे रहने से कोई चिंता न रहती! बड़ी भाभी को जानती ही हो, भाई साहब का स्वभाव भी तुमसे कुछ छिपा नही है; और तुम्ही सोचो, मां को इस समय लेकर मै क्या करूं, और मेरा कुछ ठिकाना ही नही कि क्या होगा? तुम्हारे रहने से मै सब-कुछ तुम्हारे हाथ मे सौपकर निश्चिंत हो जाता-‘क्यो पत्तो?’

पार्वती फफककर रो पड़ी। देवदास ने कहा-‘रोती हो क्या? अब और कुछ नही कहूंगा।’

पार्वती ने आंख पोछते-पोछते कहा-‘पत्तो, अब तो तुम खूब पक्की घरनी हो गई हो न?’

घूंघट के भीतर-ही-भीतर होठ चबाकर, मन-ही-मन उसने कहा-घरनी क्या हुई हूं! क्या सेमल का फूल कभी देव-सेवा मे लगता है?

देवदास ने हंसते-हंसते कहा-‘बड़ी हंसी आती है! तुम कितनी छोटी थी और अब कितनी बड़ हो गर्इं। बड़ा मकान, बड़ी जमीदारी है, बड़े-बड़े लड़की-लड़के है और सबसे बड़े चौधरी जी, क्यो पत्तो?’

चौधरी जी पार्वती के लिए बड़ी हंसी की चीज है; उनके ध्यान मात्र आने से उसे हंसी आ जाती है।

इतने कष्ट मे भी इसी से उसे हंसी आ गई। देवदास ने बनावटी गंभीरता से कहा-‘क्या एक उपकार कर सकती हो?’

पार्वती ने मुख उठाकर कहा-‘क्या?’

‘तुम्हारे गांव मे कोई अच्छी लड़की मिल सकती है?’

पार्वती ने खांसकर कहा-‘अच्छी लड़की! क्या करोगे?’

‘मिलने पर विवाह करूंगा। एक बार गृहस्थी बनने की साध होती है।’

पार्वती ने गंभीरतापूर्वक पूछा-‘खूब सुंदरी न?’

‘हां, तुम्हारी तरह।’

‘और खूब शांत?’

‘नही, खूब शांत से काम नही है; वरन्‌ कुछ दुष्ट हो, तुम्हारी तरह मुझसे झगड़ा कर सके।’

पार्वती ने मन-ही-मन कहा-यह तो कोई नही कर सकेगी देव दादा, क्योकि इसके लिए मेरे समान प्रेम चाहिए। प्रकट मे कहा-‘मै अभागिन क्या हूं, मेरे ऐसी न जाने कितनी हजार तुम्हारे पांव की धूलि लेक अपने को धन्य मानेगी?’

देवदास ने मजाक से हंसकर कहा-‘क्या अभी एक ऐसी ला सकती हो?’

‘देव दादा, क्या सचमुच विवाह करोगे?’

‘वैसा ही, जैसा मैने बतलाया है।’

केवल यही खोलकर नही कहा कि उसे छोड़ इस संसार मे उनके जीवन की कोई सहवासिनी नही हो सकती!

‘देवदास, एक बात बताओगे?’

‘क्या?’

पार्वती ने अपने के बहुत संभालकर कहा-‘तुमने शराब पीना कैसे सीखा?’

देवदास ने हंसकर कहा-‘पीना भी क्या कही सीखना होता है?’

‘यह नही तो अभ्यास कैसे किया?’

‘किसने कहा-धर्मदास ने?’

‘कोई भी कहे; क्या यह बात सच है?’

देवदास ने छिपाया नही, कहा-‘कुछ है?’

पार्वती ने कुछ देर स्तब्ध रहने के बाद पूछा-‘और कितने हजार रुपये का गहना गढ़ा दिया है?’

देवदास ने गंभीरता से कहा-‘दिया नही है; गढ़ाकर रखा है। तुम लोगो?’

पार्वती ने हाथ फैलाकर कहा-‘दो, यह देखो, मुझ पर एक भी गहना नही है।’

‘चौधरी जी ने तुम्हे नही दिया?’

‘दिया था; पर मैने सब उनकी बड़ी लड़की को दे दिया।’

‘जान पड़ता है अब तुम्हे जरूरत नही है।’

पार्वती ने मुख हिलाकर सिर नीचा कर लिया। देवदास की आंखो मे आंसू भर आया। देवदास ने मन-ही-मन सोचा कि साधारण दुःख से स्त्रियां अपने गहने खोलकर नही देती। किंतु आंख से निकलते हुए आंसुओ को रोककर धीरे-धीरे कहा-‘झूठी बात है; किसी स्त्री से मैने प्रेम नही किया। किसी को मैने गहना नही दिया।’

पार्वती ने दीर्घ निःश्वास फेककर मन-ही-मन कहा-ऐसा ही मुझे भी विश्वास है।

कुछ देर तक दोनो ही चुप रहे। फिर पार्वती ने कहा-‘किंतु प्रतिज्ञा करो कि अब शराब नही पीऊंगा।’

‘यह नही कर सकता। तुम क्या प्रतिज्ञा कर सकती हो कि तुम मुझे भुला दोगी?’

पार्वती ने कुछ नही कहा। इसी समय बाहर से संध्या की शंख-ध्वनि हुई। देवदास ने खिड़की से बाहर देखकर कहा-‘संध्या हो गई है, अब घर जाओ पत्तो!’

‘मै नही जाऊंगी, तुम प्रतिज्ञा करो।’

‘क्यो, मै नही कर सकता।’

‘क्यो नही कर सकते?’

‘क्या सभी सब कामो को कर सकते है?’

‘इच्छा करने से अवश्य कर सकते है।’

‘तुम मेरे साथ आज रात मे भाग सकती हो?’

पार्वती का हृदय-स्पंदन सहसा बंद हो गया। अनजाने मे धीरे से निकल गया-‘यह क्या हो सकता है?’

देवदास ने जरा चारपाई के ऊपर बैठक कहा-‘पार्वती, किवाड़ खोल दो।’

देवदास खड़े होकर धीमे भाव से कहने लगे-‘पत्तो, क्या जोर देकर प्रतिज्ञा कराना अच्छा है? उससे क्या कोई विशेष लाभ है? आज की हुई प्रतिज्ञा कल शायद न रहेगी। क्यो मुझे झूठा बनाती हो?’

और भी कुछ क्षण यो ही निःशब्द बीत गये। इसी समय न जाने किस घर मे टन-टन करके नौ बजा।

देवदास भाव से कहने लगे-‘पत्तो, द्वार खोल दो।’ पार्वती ने कुछ नही कहा।

‘जा पत्तो!’

‘मै किसी तरह नही जाऊंगी।’-कहकर पार्वती अकस्मात पछाड़ खाकर गिर पड़ी। बहुत देर तक फूटफूटकर रोती रही। कमरे के भीतर इस समय गाढ़ा अन्धकार था, कुछ दिखायी नही पड़ता था। देवदास ने केवल अनुमान से समझा कि पार्वती जमीन मे पड़ी रो रही है, धीरे-धीरे बुलाया-‘पत्तो!’

‘देव दादा, मै मर भी जाऊंगी, किन्तु कभी तुम्हारी सेवा नही कर सकी, यह मेरे आजन्म की साध है।’

अंधेरे मे आंख पोछते-पोछते देवदास ने कहा-‘वह भी समय आयेगा।’

‘तब मेरे साथ चलो। यहां पर तुम्हे कोई देखने वाला नही है।’

‘तुम्हारे मकान पर चलूंगा तो खूब सेवा करोगी?’

‘यह मेरे बचपन की ही साध है। हे स्वर्ग के देवता! मेरी इस साध को पूर्ण करो इसके बाद यदि मर भी जाऊं तो भी दुख नही है।’

इस बार देवदास की आंखो मे पानी भर आया। पार्वती ने फिर कहा-‘देवदास, मेरे यहां चलो!’

देवदास ने आंखे पोछकर कहा-‘अच्छा चलूंगा।’

‘मेरे सिर पर हाथ रखकर कहो कि चलोगे।’

देवदास ने अनुमान से पार्वती का पांव छूकर कहा-‘यह बात मै कभी नही भूलूंगा। अगर मेरे जाने से ही तुम्हारा दुख दूर हो, तो मै अवश्य आऊंगा। मरने के पहले भी मुझे यह बात याद रहेगी।’

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