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मिथिला का प्रसिद्द लोक पर्व सामा चकेवा

मिथिला अपनी लोक संस्कृति, पर्व-त्योहार व पुनीत परंपरा के लिए प्रसिद्ध रहा है. इसमें भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक के कई त्योहार हैं. उनमें सामा-चकेवा काफी महत्वपूर्ण है. आस्था का महापर्व छठ समाप्त होने के साथ ही भाई-बहनों के अटूट स्नेह व प्रेम का प्रतीक सामा-चकेवा पर्व की शुरुआत हो जाती है.रक्षाबंधन और भैया दूज की तरह सामा चकेवा भी भाई बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक पर्व है। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ ही उम्रदराज महिला साथ-साथ इसे उल्लास से मनाती है। इस पर्व की खास बात यह है कि जहां बहनें अपने भाई के दीर्घ आयु की कामना करती है। वहीं इसके गीत पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जाता है।
इसकी तैयारी छठपूजा के दूसरे दिन से ही प्रारंभ हो जाती है. सामा-चकेवा की मूर्ति निर्माण में बालिका व नवयुवती पूरी तरह से लग गयी हैं. वर्तमान में सामा बनाने में कमी जरूर हुई है. लोग बना हुआ सामा ही खरीद रहे हैं. ग्रामीण क्षेत्रों का हर गली व मुहल्ला सामा-चकेवा के गीतों से गूंजित रहता है.
 
पारंपरिक लोकगीतों से गूंजने लगे गांव : मिथिलांचल में भाइयों के कल्याण के लिए बहना यह पर्व मनाती हैं. इस पर्व की चर्चा पुरानों में भी है. सामा-चकेवा पर्व की समाप्ति कार्तिक पूर्णिमा के दिन होती है. पर्व के दौरान बहनें सामा, चकेवा, चुगला, सतभईयां को चंगेरा में सजाकर पारंपरिक लोकगीतों के जरिये भाइयों के लिए मंगलकामना करती हैं. सामा-चकेवा का उत्सव पारंपरिक लोकगीतों से है. संध्याकाल में खास तौर पर गांव में तोहे बड़का भैया हो, छाऊर छाऊर छाऊर, चुगला कोठी छाऊर भैया कोठी चाऊर व साम चके साम चके अबिह हे, जोतला खेत में बैसिह हे से लेकर भैया जीअ हो युग युग जीअ हो आदि गीतों व जुमले से काफी मनोरंजन करते हैं.
 
पुराण में भी है उल्लेख
लोकपर्व सामा-चकेवा का उल्लेख पद्म पुराण में भी है। सामा चकेवा पर्व भगवान श्रीकृष्ण के पुत्री सामा और पुत्र साम्ब के पवित्र प्रेम पर आधारित है। चुड़क नामक एक चुगलबाज ने एक बार श्रीकृष्ण से यह चुगली कर दी कि उनकी पुत्री साम्बवती वृंदावन जाने के क्रम में एक ऋषि के संग प्रेमालाप कर रही थी। क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने अपनी पुत्री और उस ऋषि को शाप देकर मैना बना दिया। साम्बवती के वियोग में उसका पति चक्रवाक भी मैना बन गया। यह सब जानने के बाद साम्बवती के भाई साम्ब ने घोर तपस्या कर श्रीकृष्ण को प्रसन्न किया और अपने बहन और जीजा को श्राप से मुक्त कराया। तबसे ही मिथिला में सामा-चकेवा पर्व मनाया जाता है।
 
सात दिनों तक चलता है यह त्योहार
7 दिनों तक बहने भाई की खुशहाल जीवन के लिए मंगल कामना करती हैं। इस पर्व में बहनें पारंपरिक गीत गाती हैं। सामा-चकेवा व चुगला की कथा को गीतों के रूप में प्रस्तुत करती हैं। आखिरी दिन कार्तिक पूर्णिमा को सामा-चकेवा को टोकरी में सजा-धजा कर बहनें नदी तालाबों के घाटों तक पहुंचती हैं और पारंपरिक गीतों के साथ सामा चकेवा का विसर्जन हो जाता है।
 
इस पर्व में शाम होने पर युवा महिलाएं अपनी संगी सहेलियों के साथ मैथिली लोकगीत गाती हुईं अपने-अपने घरों से बाहर निकलती हैं. उनके हाथों में बांस की बनी हुई टोकरियां रहती हैं जिसमें मिट्टी से बनी हुई सामा-चकेवा, पक्षियों एवं चुगला की मूर्तियां रखी जाती है. मैथिली भाषा में जो चुगलखोरी करता है, उसे चुगला कहा जाता है.
 
मिथिला में लोगों का मानना है कि चुगला ने ही कृष्ण से सामा के बारे में चुगलखोरी की थी. सामा खेलते समय महिलाएं मैथिली लोक गीत गा कर आपस में हंसी-मजाक भी करती हैं. भाभी ननद के बीच लोकगीत की ही भाषा में मजाक भी होती है. अंत में चुगलखोर चुगला का मुंह जलाया जाता है और सभी महिलाएं पुनः लोकगीत गाती हुई अपने घर वापस आ जाती है. यह पर्व आठ दिनों तक मनाया जाता है और नौवें दिन बहने अपने भाइयों को धान की नयी फसल की चूड़ा-दही खिला कर सामा-चकेवा के मूर्तियों को तालाबों में विसर्जित कर देती हैं. गांवों में तो इसे जोते हुए खेतों में विसर्जित किया जाता है. यह उत्सव मिथिलांचल में भाई-बहन के अटूट प्रेम को दर्शाता है.
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