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बॅंटवारा - Bantwara

बॅंटवारा
| गोनू झा की कहानी |
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गोनू झा और भोनू झा सहोदर थे। उनके पास पैतृक संपत्ति अधिक नहीं थी।

अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और हाजिरजवाबी के कारण गोनू झा को अकसर मिलनेवाले सम्मानॊं-पुरस्कारों से समाज के कुछ लोग जलते और नीचा दिखाने की चाल चलते रहते थे, किंतु गोनू झा साजिश को हॅंसते-हॅंसते नाकाम कर देते थे।

कुछ दिनों से उनके अनुज की दोस्ती गाँव के ईष्यालुओं और लठैतों से खूब देखी जा रही थी। गोनू झा के लाख मना करने पर भी भाई पर कोई असर नहीं पड़ता, उलटे वह चिढ और जाता । अंततः उसने बँटवारा ही करने को कह दिया।

गोनू झा ने भी आजिज आकर हामी भर दी और कहा,'ठीक है, तुम ही पंच तय कर लो।'

बॅंटवारा होने लगा। फैसला सुन-सुनकर गोनू झा स्तब्ध होते जा रहे थे कि वाह रे न्याय!

कंबल, भैंस और अमरूद का पेड़ एक-एक ही था। उनका बॅंटवारा करते हुए पंचों ने फैसला सुनाया, कंबल दिन में गोनू झा और रात में भोनू झा रखेंगे। भैंस का सिर गोनू झा का और धड़ भोनू झा का होगा। अमरूद के पेड़ की जड़ गोनू झा की और शीर्ष भाग भोनू झा का होगा।

गोनू झा पंचों के षड्यंत्र जानते ही थे, फिर भी पंचों का फैसला स्वीकार करना ही था, किंतु ग्रामीणॊं को कैसे बताऍं कि पंच भी साजिश में शामिल हैं। खैर, फैसला सिर आँखों पर।

जाड़े का समय था। गोनू झा ने कंबल को दिनभर पानी में भिगोए रखा। शाम को भोनू झा माँगने आया । गोनू झा ने पानी से निकालकर देते हुए कहा, लो बहुत भारी हो गया है; इसे ठीक से पकड़ो ।

भोनू झा कंबल का हाल देखकर झुँझलाया । गोनू झा ने कहा, 'मैने अपने समय मे भिगोया है; इससे तुम्हे क्या मतलब ?

भोनू झा को उत्तर न सूझा ।

वह भैंस दूहने बैठा और भोनू झा भैंस के सिर पर डंडा बरसाने लगा । भोनू झा झल्लाया । भोनू झा ने सहजता से कहा, मैं तुम्हारे हिस्से को तो नहीं, अपने हिस्से को पिट रहा हूँ ।

भोनू झा फिर भुनभुना कर रह गया । एक दिन गोनू झा फलों से लदा अमरुद का पेड़ काट्ने पहुँच गए ।

भोनू झा दौड़ा । गोनू झा ने गुस्साते हुए कहा, तुम मना करनेवाले कौन होते हो ? मैं अपने हिस्से का जो चाहे करूँ? पंचों ने यही फैसला सुनाया था।

उस समय क्यों नहीं बोले? अपने ही स्वार्थी मित्रों को पंच बनाकर तुमने सोचा था कि मेरा 'कल्याण कर दोगे, परंतु मैं तुम्हारा अग्रज हूँ। पंचायत से पूर्व उन्हीं पंचों से मैंने भी गुपचुप कर पक्की दोस्ती कर ली। अब समझो कि पक्षपाती पंच का क्या कुफल होता है!'

भोनू झा ने डंडा उठाया और उन पंचों को ही खोज-खोजकर पीटने लगा। आखिर गाँव के कुछ भलेमानुसों ने बीच-बचाव किया।

सारा वृत्तांत बताया गया। बड़े-बुजुर्गों ने फिर पंचायत की और दूध का दूध, पानी का पानी हुआ-'कंबल और भैंस चौबीस घंटों तक एक के और फिर दूसरे भाई के पास रहेंगे। अमरूद का पेड़ एक-एक वर्ष तक एक-एक भाई के अधिकार में रहेगा।' इस फैसले को गोनू झा ने भी खुशी-खुशी स्वीकार किया।

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