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कर्ज की वसूली - karj ki wasuli

अनुराधा (Anuradha) | शरतचंद्र चट्टोपाध्याय |

 

कर्ज की वसूली
| गोनू झा की कहानी |
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गोनू झा का मुँहलगा भानजा पलटनमा दो-चार दिनों के बाद ही अपने गाँव से वापस हो आया। उसे देखते ही मामा ने चिढते हुए कहा, 'तुम्हें कोई काम-धाम नहीं है क्या? ऎसे ही घूमते रहते हो?

वह भी आखिर गोनू झा का भानजा था; कम ढीठ न था। गोनू झा दूसरों के लिए तीसमार खाँ भले हों, उसके लिए तो वह बाप के साले ही थे, अतः उसने निर्लज्जता पूर्वक कहा, 'मामा हो, बात क्या हुई कि कल शाम मैंने अपने दादा से मिठाई खाने के लिए पैसे माँगे तो उन्होंने डाँटते हुए कहा कि अपने मामा से क्यों नहीं कहते हो ? मैंने भी गुस्से में कहा कि जितनी मिठाइयाँ मामा खिला देंगे,उतनी आप भी खिलाइएगा ? इस पर दादा ने कहा अरे, जाओ-जाओ ! एक भी खिला दें तो गनीमत; वह तो स्वयं एक नंबर का ठग है ।'

गोनू झा ने मुसकराते हुए कहा, 'तो ठीक है, चलो मेरे साथ ।'

दूर से ही एक दुकान दिखाते हुए कहा, 'उस दुकान में जो-जो मिठाई खानी हो, इच्छा भर खा लेना; मैं आ रहा हूँ।'

कुछ देर बाद गोनू झा पहुँचे और भानजे के पास बैठकर उसे भरपेट खाने के लिए उत्साहित करते रहे। उसके डकार लेने के बाद गोनू झा ने धीरे से कहा, 'अब तुम अपने गाँव चले जाओ !'

भानजा चला गया। गोनू झा अन्य ग्राहकों से भी गाँव-जबार का हालचाल पूछकर विदा होने लगे तो दुकानदार ने झट याद दिलाते हुए कहा, 'वह लड़का, जो खाकर गया है, उसके पैसे तो देते जाइए।'

गोनू झा चौंके, 'कौन? किसका पैसा? मैं तो अकेले ही आया था; मेरे साथ तो कोई नहीं आया था।'

दुकानदार ने झुँझलाकर याद दिलाते हुए कहा, 'अरे वही लाल बुश्शर्टवाला छौंड़ा, जो आपके सामने खा रहा था और बहुत प्रेम से आपसे बतिया भी रहा था!

गोनू झा ने उपसाहपूर्वक ठहाका लगाते हुए कहा, 'अरे, भाई साहब, शायद आप भी ठगे गए; उसे तो मैं जानता भी नहीं हूँ। जहाँ तक बात करने का प्रश्न है, वह तो मैं सबसे बतियाता हूँ; विशेषकर दूसरे ग्रामवासियों से बतियाने में मुझे अच्छा लगता है। इससे देश-कोस का हाल समाचार मालूम होता है।

अन्य ग्राहक भी हाँ में हाँ मिलाने लगे। दुकानदार माथा पीटता रह गया। वह लड़का तो अच्छी-अच्छी मिठाइयाँ सोधकर चला गया था।

घर लौटने पर गोनू झा की पत्नी ने बटुवे में पैसे सही-सलामत देखकर कहा, 'आप भी हद करते हैं। बेचारा किस मुँह से घर गया होगा? अपनी तो जगहॅंसाई कराते ही हैं, उसकी भी नाक कटवा दी,'

गोनू झा ने हॅंसते हुए कहा, 'मुझे भी अपने ही मायके का समझती हो क्या? तुम्हारे पीहर में तो एक मिठाई माँगेगा, तो एक ही देगा! अरे, भरपेट खाकर गया है; अब वह छह महीने मिठाई खाने का नाम न लेगा। उसके खानदान में किसी ने इतनी मिठाइयाँ पत्तल पर देखी भी न होंगी।

पत्नी चौंकी, ;किंतु पैसे! बटुआ से तो एक भी न निकला है'।

गोनू झा ने पंच के लहजे में कहा, 'अरी मानिनी, सब जगह पैसे का ही कर्ज नहीं उतारा जाता है; कभी-कभार गलत बात के समर्थन के प्रायश्चित्त स्वरूप भी क्षति उठानी पड़ती है।

ऎसे ही कर्म का परिणाम उस दुकानदार को भुगतना पड़ा है।

दो वर्ष पूर्व उसने मुझे अपरिचित तथा एक हजाम को अपना परिचित बताकर उसकी अनुचित बात में हाँ मे हाँ मिला दी थी। उसी दिन मैंने निश्चय कर लिया कि देर-सवेर दुकानदार को यह कर्ज उतारना पड़ेगा।

उसी के प्रायश्चित्त में आज उसने भानजे को भरपेट मिठाई खिलाई है।'

 

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