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देवदास (Devdash) | शरतचंद्र चट्टोपाध्याय | (Chapter - 3)

-: देवदास :-

(उपन्यास)

लेखक : शरतचंद्र चट्टोपाध्याय
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पिता की मृत्यु के बाद धीरे-धीरे छः महीने बीत गये। देवदास घर में एकदम ऊब गये। सुख नही, शान्ति नही, उस पर एक ही तरह की जीवनचर्या से मन बिल्कुल विरक्त हो चला। तिस पर पार्वती की चिन्ता से चित और भी अव्यवस्थित हो रहा था; फिर आजकल तो उसके एक-एक काम, एक-एक हावभाव के चित्र हर समय आंखो के सामने नाचा करते थे। उस पर भाई-भौजाई के उदासीन व्यवहारो ने देवदास के सन्ताप को और भी दूना कर दिया था।

माता की अवस्था भी देवदास की ही तरह थी। स्वामी की मृत्यु के साथ-ही-साथ उनके सारे सुखो का लोप हो गया। पराधीन होकर इस मकान मे रहना उनके लिए भी धीरे-धीरे असह्य होने लगा।

आज कई दिनों से वे काशीवास का विचार कर रही है। केवल देवदास के अविवाहित होने के कारण वे अभी नही जा सकती है। जब-जब यही कहती है कि, ‘देवदास, अब तुम विवाह कर लो, मेरी साध पूरी हो जाय।’ किन्तु यह कब सम्भव था! एक तो पिता की अभी वर्षी नही हुई, दूसरे अभी कोई इच्छानुकूल कन्या नही मिली। इसी से माता आजकल कभी-कभी दुखित हो जाया करती है कि यदि उस समय पार्वती का विवाह हो गया होता, तो अच्छा होता। एक दिन उन्होने देवदास को बुलाकर कहा‘अब मै यहां नही रहना चाहती, कुछ दिनो के लिए काशी जाके रहने की इच्छा है।’ देवदास की भी यही इच्छा थी, कहा-‘मेरी भी यही सम्मति है। छः महीने के बाद लौट आना।’

‘ऐसा ही करो। फिर लौट के आने पर उनकी क्रिया-कर्म हो जाने के बाद तुम्हारा विवाह कर, तुम्हे गृहस्थ बना देख, मै फिर जाके काशीवास करूंगी।’

देवदास सहमत होकर माता को कुछ दिनो के लिए काशी पहुंचाकर कलकत्ता चले गये।

कलकत्ता आकर देवदास ने तीन-चार दिनो तक चुन्नीलाल को ढूंढा। वे नही मिले, उसे मैस को छोड़कर किसी दूसरी जगह चले गये थे। एक दिन संध्या के समय देवदास को चन्द्रमुखी की बात याद आयी। एक बार देख आना अच्छा होगा। इतने दिनो तक कुछ भी स्मरण नही आया था। इससे कुछ लज्जा-सी मालूम हुई। एक किराये की गाड़ी करके चले। कुछ संध्या हो जाने पर चन्द्रमुखी के मकान के सामने गाड़ी आ खड़ी हुई। बहुत देर तक बुलाने-चिल्लाने के बाद भीतर से स्त्री के कंठ-स्वर मे उत्तर मिला-‘यहां नही है।’ सामने एक बिजली की रोशनी का खम्भा खड़ा था, देवदास ने उसके पास होकर कहा -‘कह सकती हो, वह कहां गयी है?’ खिड़की खोलकर उसने कुछ क्षण देखने के बाद कहा-‘क्या आप देवदास है?’

‘हा।’

‘खड़े रहिये-दरवाजा खोलती हूं।’ दरवाजा खोलकर उसने कहा-‘आइये!’ कंठ-स्वर कुछ परिचितसा जान पड़ा, किन्तु फिर भी पहचान नही सके। थोड़ा अन्धकार भी हो चला था। सन्देह से कहा‘

चन्द्रमुखी कहां रहती है, कुछ कह सकती हो?’

स्त्री ने मीठी हंसी हंसकर कहा-‘हां, तुम ऊपर चलो।’ इस बार देवदास ने पहचान लिया-‘है! तुम्ही हो?’

‘हां, मै ही हूं। देवदास, मुझे एकदम भूल गये?’

ऊपर जाकर देवदास ने देखा, चन्द्रमुखी एक काले किनारे की मैली धोती पहने है, हाथ मे केवल दो कड़ो को छोड़, शरीर पर कोई आभूषण नही है, सिर के केश इधर-उधर बिखरे हुए है, विस्मित होकर देवदास ने पूछा-‘तुम्ही?’ अच्छी तरह से देखा, चन्द्रमुखी पहले की अपेक्षा बहुत दुबली हो गयी है।

देवदास ने पूछा-‘तुम क्या बीमार थी?’

‘कोई शारीरिक बीमारी नही थी, तुम अच्छी तरह से बैठो।’

देवदास ने चारपाई पर बैठकर देखा, घर मे पहले की अपेक्षा आकाश-जमीन का अन्तर हो गया है।

गृहस्वामिनी की भांति उसकी दुर्दशा की भी सीमा नही थी। एक भी सामान नही था। अलमारी, टेबिल, कुर्सी आदि सबके स्थान खाली पड़े है। केवल एक शैया पड़ी थी, चादर मैली थी। दीवाल पर से चित्र हटा दिये गये थे। लोहे की कांटियां अब भी गड़ी हुई थी। दो-एक लाल फीते भी इधर-उधर लटके हुए थे। पहले की वह घड़ी भी बाकेट पर रखी हुई थी, किन्तु निःशब्द थी। आस-पास मकड़ाें ने अपनी इच्छानुकूल जाला बुन रखा था। एक कोने मे एक तेल का दीया धीमी-धीमी रोशनी फैला रहा था, उसी के सहारे से देवदास ने घर की इस नयी सजावट को देखा। कुछ विस्मित और कुछ क्षुब्ध होकर कहा‘दुर्दशा!

तुमसे किसने कहा? मेरा तो भाग्य प्रसन्न हुआ है।’

देवदास समझ नही सके कहा-‘तुम्हारे सब गहने क्या हुए?’

‘बेच डाले।’

‘माल-असबाब?’

‘वह भी बेच डाला।’

‘घर की तस्वीरे भी बेच डाली?’

इस बार चन्द्रमुखी ने हंसकर सामने के एक मकान को दिखाकर कहा-‘उस मकान के मालिक के हाथ बेच दी।’

देवदास ने कुछ देर तक उसके मुंह की ओर देखकर कहा-‘चुन्नी बाबू कहां है?’

‘नही कह सकती। दो महीने हुए, लड़-झगड़कर चले गये, फिर तब से नही आये।’

देवदास को अब और आश्चर्य हुआ। पूछा-‘झगड़ा क्यो हुआ?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘क्या झगड़ा नही होता?’

‘होता है,पर क्यो?’

‘दलाली करने आये थे, इसी से हटा दिया।’

‘किसकी दलाली?’

चन्द्रमुखी ने हंसकर कहा-‘पट्‌टू की।’ फिर कहा-‘तुम नही समझते? एक बड़े आदमी को पकड़ लाये थे। महीने मे दो सौ रुपये, एक सेट गहना और दरवाजे के सामने रहने को एक सिपाही मिलता था, समझे!’

देवदास ने सब समझने के बाद हंसकर कहा-‘वह सब एक भी तो नही देखता हूं।’

‘रहते तब न देखते! मैने उन लोगो को हटा दिया।’

‘उन लोगो का अपराध?’

‘उन लोगो का अपराध कुछ ज्यादा नही था, पर मुझे अच्छा नही लगा।’

देवदास ने बहुत सोचकर कहा- ‘उसी दिन से यहां और कोई नही आया?’

‘नही। उस दिन से क्यो? तुम्हारे जाने के बाद से ही यहां कोई नही आता। सिर्फ बीच-बीच में चुन्नीलाल आ जाते थे, किन्तु दो मास से वी भी नही आते।’

देवदास बिछौने के ऊपर लेट गये। दूसरी ओर देखने लगे, बहुत देर तक चुप रहने के बाद धीरे से कहा-‘चन्द्रमुखी, तब दुकानदारी सब उठा दी?’

‘हां, दिवाला निकाल दिया।’

देवदास ने इस बात का उत्तर न देकर कहा-‘लेकिन रोटी-पानी कैसे चलेगा?’

‘इसीलिए तो जो कुछ गहना-पत्तर था, बेच दिया।’

‘उसमे अब कितना बचा है?’

‘ज्यादा नही, कोई आठ-नौ सौ रुपये होगे। उन्हे एक मोदी के पास रख दिया है, वह मुझे महीने मे बीस रुपये देता है।’

‘बीस रुपये से तो पहले तुम्हारा काम नही चलता था?’

‘नही, आज भी अच्छी तरह से नही चलता है। तीन महीने से महान का किराया बाकी है, इसी से इच्छा होती है कि इन दोनो कड़ो को बेचकर, सब पटाकर और कही चली जाऊं।’

‘कहां जाओगी?’

‘यह अभी निश्चय नही किया है। किसी सस्ते देश, गवंई-गांव मे जाऊंगी जिसमे बीस रुपये महीने मे निर्वाह हो जाय।’

‘इतने दिन से क्यो नही गयी? अगर सचमुच ही तुम्हारा और कोई मतलब नही था तो फिर इतने दिन रहकर व्यर्थ कर्ज क्यो बढ़ाया?’

चन्द्रमुखी सिर नीचा करके कुछ सोचने लगी। उसके जीवन-भर मे बातचीत करने का यह पहला अवसर है। देवदास ने पूछा-चुप क्यो हो?’

चन्द्रमुखी ने शैया के एक ओर संकुचित भाव से बैठकर धीरे-ध्धीरे कहा-‘क्रोध मत करना; जाने के पहले सोचा था कि तुमसे भेट कर लेना अच्छा होगा। आशा करती थी कि एक बार तुम आओगी। आज तुम आये हो, अब कल ही जाने का उद्योग करूंगी। पर कहा जाऊं, कुछ कह सकते हो?’

देवदास विस्मित होकर उठ बैठे; कहा-‘सिर्फ मुझे देखने की आशा से रुकी थी। लेकिन क्यो?’

‘एक ख्याल। तुम मुझसे बहुत घृणा करते थे। इतनी घृणा किसी ने मुझसे कभी नही की, शायद इसीलिए। तुम्हे अब याद है या नहीं, यह मैं नही कह सकती, पर मुझे अच्छी तरह स्मरण है कि जिस दिन तुम पहले-पहल हां पर आये थे, उसी दिन मेरी नजर तुम पर पड़ी। तुम धनी की सन्तान हो, यह मैं जानती थी; पर धन की आशा से मै तुम्हारी ओर नही खिंची थी। तुम्हारे पहले कितने ही लोग यहां पर आये और गये, पर किसी मे इतना तेज नही पाया। तुमने आने के साथ ही मुझे घायल किया; एक

आयाचित, उपयुक्त, परन्तु अनुचित रूढ़ व्यवहार आरम्भ किया, घृणा से मुंह फेर लिया और अन्त मे तमाशे की तरह कुछ देकर चले गये। ये सब बाते क्या तुम्हारे ध्यान मे आती है?’

देवदास चुप रहे, चन्द्रमुखी फिर कहने लगी-‘उसी दिन से मेरी तुम्हारे ऊपर नजर पड़ी। मै न तुमसे प्रेम करती और न घृणा करती थी, एक नयी चीज को देखकर जैसे मन में हमेशा ध्यान बना रहता है, तुमको भी देखकर उसी तरह किसी भांति नही भूल सकी। तुम्हारे आने पर बड़े भय और सतर्क के साथ रहती थी, पर न आने से कुछ अच्छा भी नहीं लगता था। फिर जाने कैसा मतिभम्र हुआ कि इन दोनो आंखो को सब ही चीजें एक-सी दीखने लगी। मैं पहले की अपेक्षा बिल्कुल बदल गयी, जो पहले थी वह अब नहीं रही। फिर तुमने शराब पीना शुरू किया; शराब से मुझे बड़ी घृणा है। किसी के मतवाला होने पर मुझे उस पर बड़ा क्रोध आता है। पर तुम्हारे मतवाला होने से क्रोध नही होता था, बल्कि बड़ा दुख होता था।’

यह कहकर चन्द्रमुखी ने देवदास के पांव पर हाथ रखकर डबडबायी हुई आंखो से कहा-‘मै बहुत अधम हूं, मेरे अपराधो पर ध्यान नही देना। तुम जितनी ही बाते कहते थे और घृणा करते थे, मै उतनी ही तुम्हारे पास आना चाहती थी।’ अन्त मे सो जाने पर-‘रहने दो, ये बाते नही कहूंगी, नही तो क्रोध कर बैठोगे।’ देवदास ने कुछ नही कहा, नयी तरह बातचीत से उसे कुछ वेदना पहुंचा रही थी। चन्द्रमुखी ने छिपा के आंख पोछकर कहा-‘एक दिन तुमने कहा कि हम लोग कितना सहन करती है, लांछना, अपमान, जघन्य अत्याचार, उपद्रव की बाते! उसी दिन से मुझे बड़ा अभियान हुआ-‘मैने सब बन्द कर दिया।’

देवदास ने बैठकर पूछा-‘लेकिन यह जीवन कैसे कटेगा?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘वह तो पहले ही कह चुकी।’

‘और सोचो, यदि उसने तुम्हारा सब रुपया दाब रखा तो?’

चन्द्रमुखी इससे भयभीत नहीं हुई। शान्त-सहज भाव से कहा-‘आश्चर्य नही, किन्तु इसे भी मैने सोच रखा है कि विपत्ति पड़ने पर तुमसे कुछ भीख मांग लूंगी।’

देवदास ने सोचकर कहा-‘वह पीछे लेना। अभी और कही जाने का उद्योग करो।’

‘कल ही करूंगी। कड़ा बेचकर एक बार मोदी से भेट करूंगी।’

देवदास ने पॉकेट से सौ-सौ रुपये के पांच नोट निकालकर तकिये के नीचे रखकर कहा-‘कड़ा बेचो, सिर्फ मोदी के साथ भेट कर लेना। पर जाओगी कहां, किसी तीर्थ-स्थान मे?’

नही देवदास, तीर्थ और धर्म के ऊपर मेरी अधिक श्रद्धा नही है। कलकत्ता से अधिक दूर नहीं जाऊंगी। आस-ही-पास के किसी गांव मे जाकर रहूंगी।

‘क्या किसी अच्छे घर मे दासी का काम करोगी?’

चन्द्रमुखी की आंखो मे फिर आंसू भर आये। पोछकर कहा-‘इच्छा नही होती। स्वाधीन-भाव से स्वच्छन्द होकर रहूंगी। क्यो दुख करने जाऊं? शारीरिक दुख कभी उठाया नही है, अब भी नही उठा सकूंगी। और अधिक खीचातानी करने से छिन्न-भिन्न हो जाऊंगी।’

देवदास ने विष्ण्ण मुख से कुछ हंसकर कहा-‘पर शहर के पास रहने से प्रलोभन मे पड़ सकती हो।

मनुष्य के मन का विश्वास नही।’

इस बार चन्द्रमुखी का मुख खिल उठा। हंसकर कहा-‘यह बात सच है, मनुष्य का विश्वास नही। पर मै प्रलोभन मे नही पडूंगी। स्त्रियो मे लोभ अधिक है-यह मानती हूं, पर जिस चीज का लोभ रहता है जब उसे ही इच्छापूर्वक छोड़ दिया है, तो फिर मेरे लिए कोई भय नही है। एकाएक अगर किसी झोक मे आकर छोड़ती, तब सावधान होना आवश्यक था, लेकिन इतने समय मे एक दिन भी तो पछतावा नही हुआ, मैं बड़े सुख से हूं।’

देवदास ने सिर हिलाकर कहा-‘स्त्रियो का मन बड़ा चंचल, बड़ा अविश्वासी होता है।’

इस बार चन्द्रमुखी कुछ खिसककर एकदम पास मे आकर बैठी, हाथ पकड़कर कहा-‘देवदास!’

देवदास उसके मुंह की ओर देखते रहे। इस बार वे नही कह सके कि मुझे मत छुओ।

चन्द्रमुखी ने स्नेह से चक्षु विस्फारित कर, कुछ कम्पित कंठ से उनके हाथो को अपनी गोद मे खीचकर कहा-‘आज अन्तिम दिन है, आज क्रोध मत करना। एक बात तुमसे पूछने की बड़ी लालसा है।’-यह कहकर कुछ देर देवदास के मुंह की ओर देखकर कहा-‘पार्वती ने क्या तुम्हे बड़ी गहरी चोट पहुंचायी है?’

देवदास ने भ्रू-कुंचित कर कहा-‘यह क्यो पूछती हो?’

चन्द्रमुखी विचलित नही हुई। शान्त और दृढ़ स्वर से कहा-‘मुझे काम है। मै सच कहती हूं,

तुम्हे दुख पहुंचने से मुझे भी दुख होता है। इसे छोड़ शायद मैं बहुत-सी बाते जानती हूं। बीच-बीच मे नशे के जोर मे तुम्हारे मुंह से अनेक ऐसी बाते सुनी है। फिर भी मुझे विश्वास नही होता कि पार्वती ने तुम्हे ठगा है; वरन्‌ मन में उठता है कि तुमने अपने-आपको ठगा है। देवदास, मै तुमसे उम्र मे बड़ी हूं, इस संसार मे बहुत-कुछ देखा सुना है। मेरे मन मे क्या बात उठती है, जानते हो? मैं दृढ़ चित्त से कहती हूं कि इसमें तुम्हारी ही भूल है। मन मे आता है, चंचल और अस्थिर-चित्त कहकर स्त्रियो की जितनी निन्दा की जाती है, वे उतनी निन्दा के योग्य नही है। निन्दा करने वाले भी तुम्ही हो, प्रशंसा करने वाले भी तुम्ही हो। तुम लोगो के मन मे जो कुछ आता है, सहज ही कह देते हो। लेकिन वे ऐसा नही कर सकती। अपने मन की बात नही कर सकती। प्रकट करने पर भी जब लोग अच्छी तरह नही समझते; क्योकि बहुत अस्पष्ट होता है। तुम लोगो के तर्क के सामने वह दब जाता है। फिर वही निन्दा के मुंह पर स्पष्ट और स्पष्टतर हो उठती है।’

चन्द्रमुखी ने थोड़ा ठहरकर अपने कंठ-स्वर को और परिष्कृत करकेे कहा-‘इस जीवन मे प्रेम का व्यवसाय बहुत दिनो तक किया है, लेकिन प्रेम केवल एक बार किया है। उस प्रेम का मूल्य बहुत बड़ा है, उससे अनेक शिक्षाएं मिलती है। जानते हो, प्रेम एक वस्तु है और रूप का मोह दूसरी। इन दोनो मे बड़ा गोलमाल है और पुरुष ही अधिक गोलमाल करते है। रूप का मोह तुम लोगो की अपेक्षा हम लोगो मे बहुत कम है, इसी से हम लोग तुम लोगों की तरह एकबारगी उन्मत्त नही हो उठती। तुम लोग जब आकर अपना प्रेम दिखलाते हो, अनेको प्रकार के भाव प्रकट करते हो, तब हम लोग चुप हो रहती है। कितनी ही बार तुम लोगो के मन को क्लेश देने में लज्जा मालूम होती है, दुख और संकोच होता है। मुंह देखने से अगर घृणा भी होती है, तब भी अक्सर लज्जा से यह नही कह सकती कि मैं तुमको ह्रश्वयार नही करती। फिर एक बाह्म प्रणय का अभिनय आरम्भ होता है; किसी दिन जब उसका अन्त हो जाता है तो पुरुष अस्थिर होकर कहते है कि कितनी विश्वासघातिनी है। तब सब लोग उसी बात को सुनते है और उसी पर विश्वास करने लग जाते है। हम लोग तब भी चुप रहती है। मन मे कितना ही क्लेश होता है, किन्तु उसे कौन देखने जाता है?’ देवदास ने कुछ नही कहा। वह भी बहुत देर तक निःशब्द मुंह की ओर देखती रही फिर कहा-‘यदि कुछ होता है तो शायद थोड़ी-बहुत ममता उत्पन्न होती है, स्त्रियां मन मे सोचती है कि यही प्रेम है। शान्त-धीर भाव से गृहस्थी को काम-काज करती है। दुख के समय प्राणपण से सहायता करती है। जब तुम लोग खूब प्रशंसा करते हो, सब लोगो के मुख से कितनी ही बार धन्य-धन्य निकलता है, लेकिन उस समय तक उसका प्रेम का वर्ण-परिचय भी आरम्भ होता है। इसके बाद अगर किसी अशुभ मुहूर्त मे अपने हृदय की असह्य वेदना के कारण छटपटाती हुई द्वार के बाहर आकर खड़ी होती है तो तुम लोग चिल्लाकर कह उठते हो-‘कलंकिनी!

छिः! छिः!’ अकस्मात देवदास चन्द्रमुखी के मुंह को हाथ से दबाकर कह उठे-‘चन्द्रमुखी, यह क्या?’

चन्द्रमुखी ने धीरे-धीरे हाथ हटाकर कहा-‘डरो नही देवदास, मै तुम्हारी पार्वती की बात नही कहती हूं।’

यह कहकर वह चुप हो रही। देवदास ने कुछ क्षण चुप रहकर अन्यमनस्क होकर कहा-‘किन्तु कर्त्तव्य है,

धर्म-अधर्म तो है?’ चन्द्रमुखी ने कहा-‘हां, वह तो है, और इसीलिए देवदास से वह सच्चा प्रेम करती और उसे सहन भी करती है; आन्तरिक प्रेम से जो सुख और तृप्ति मिलती है, उसे और बढ़ाने के लिए वह घर मे अशान्ति नही लाना चाहती। पर देवदास, मैं सच कहती हूं, पार्वती ने तुम्हे कुछ भी नही ठगा है, तुम्ही ने अपने-आपको ठगा है। आज इस बात को समझने की शक्ति तुममे नही है, यह बात मैं जानती हूं। अगर कभी समय आयेगा तो तुम देखोगे कि मै सच कहती थी।’ देवदास की दोनो

आंखो मे जल भर आया। वे दुखी होकर सोचने लगे कि क्या चन्द्रमुखी की बाते सच है? आंखो के आंसुओ को चन्द्रमुखी ने देखा, किन्तु पोछने की चेष्ट नही की। मन-ही-मन कहने लगी-तुम्हे मैने अनेको रूप में देखा है। इससे तुम्हारे मन की गति को मै भली-भांति जानती हूं। साधारण पुरुषो की भांति तुम मांगकर प्रेम प्रकाशित नही कर सकते। तब रूप की बात-रूप को कौन नहीं चाहता? किन्तु इसीलिए तुम अपने इतने तेज का, रूप के पांव मे आत्म-विसर्जन कर दोगे, यह बात विश्वास में नही आती। पार्वती है तो बड़ी रूपवती, लेकिन फिर भी यही विश्वास होता है कि पहले उसी ने प्रेम का द्वार खोला, पहले उसी ने प्रेमालाप प्रारम्भ किया।

मन-ही-मन कहते-कहते सहसा उसके मुख से अस्फुट स्वर से बाहर निकल पड़ा-‘अपने को देखकर यह समझती हूं कि वह तुमको कितना ह्रश्वयार करती होगी।’

देवदास ने चटपट बैठकर कहा-‘क्या कहती हो?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘कुछ नही। कहती थी कि वह तुम्हारा रूप देखकर नही भूल सकती। तुम्हारे रूप है, लेकिन उसमे भूल नही होती। इस तीव्र-रूक्ष रूप पर सबकी दृष्टि नही पड़ती। किन्तु जिसकी पड़ती है, उसकी दृष्टि फिर नहीं हट सकती।

यह कहकर एक दीर्घ निःश्वास लेकर कहा-‘तुममे न जाने कैसा एक आकर्षण है कि उसे जान सकता है, जिसने तुम्हे ह्रश्वयार किया है। इस स्वर्ग के पाने की इच्छा करके फिर कौन मुड़ सकता है, ऐसी स्त्री इस पृथ्वी पर कौन है?’

और कुछ क्षण नीरव रहने के बाद उसने मुख की ओर देखकर कहा-यह रूप सिर्फ चार दिन की चांदनी है। देखते-देखते ही इसका अन्त हो जाता है और चिता के साथ अग्नि मे भस्म होकर राख हो जाता है।’

देवदास ने विह्वल दृष्टि से चन्द्रमुखी के मुख की ओर देखकर कहा-‘आज तुम यह सब क्या बक रही हो?’

चन्द्रमुखी ने मधुर हंसी हंसकर कहा-‘इससे बढ़कर और कोई मन को उबाने वाली बात नही होती देवदास, कि जिसे हम ह्रश्वयार न करे वही बलपूर्वक प्रेम की बाते सुनाए। लेकिन मै यह सिर्फ पार्वती के लिए वकालत करती हूं, अपने लिए नही।’

देवदास ने चलने को उद्दत होकर कहा-‘अब मैं चलूंगा।’

‘थोड़ा और बैठो। कभी तुमको संज्ञान नही पाया था-कभी इस तरह दोनो हाथ पकड़कर बातचीत नही कर सकी थी-यह कैसी तृप्ति है!’-कहकर वह हठात्‌ हंस पड़ी।

देवदास ने आश्चर्य से पूछा-हंसी क्यो?’

‘कुछ नही। सिर्फ एक पुरानी बात की याद आ गई। आज दस बरस की बात है, जब मै प्रेम के आवेश मे घर छोड़कर चली आई थी, तब मन में होता था कि कितना ह्रश्वयार करूं-सम्भवतः उस समय प्राण भी दे सकती थी। फिर एक दिन एक तुच्छ गहन के लिए ऐसा झगड़ा हुआ कि फिर किसी का मुंह नही देखा, मन को यह कहकर संतोष दिया कि यह मुझे अच्छी तरह ह्रश्वयार नही करते, नही तो क्या एक गहना न देते?’

चन्द्रमुखी एक बार फिर अपने मन में हंस उठी। दूसरे ही क्षण शान्त-गम्भीर मुख से धीरे-धीरे कहा‘भाड ़ में जाये ऐसा गहना, तब क्या यह जानती थी कि एक मामूली सिर-दर्द के अच्छा करने मे प्राण तक को देना पड़ेगा। तब मै सीता और दमयन्ती की व्यथा को नही समझती थी, जगाई माधव की कथा पर विश्वास नही करती थी। अच्छा देवदास, इस संसार मे सभी कुछ सम्भव है?’

देवदास कुछ उत्तर नही सके; हत्बुद्धि की भांति कुछ क्षण देखकर कहा-‘मै जाता हूं।’

‘डर क्या है, जरा और बैठो। मै तुमको और भुलावे में नही रखना चाहती-मेरे वे दिन अब बीत गये।

अब तुम मुझसे जितनी घृणा करते हो, मै भी अपने से उतनी ही घृणा करती हूं। लेकिन देवदास, तुम विवाह क्यो नहीं कर लेते?’

अब मानो देवदास मे निःश्वास पड़ा। थोड़ा हंसकर कहा-‘उचित है, पर इच्छा नही होती।’

‘न होने पर भी करो। स्त्री का मुख देखकर बहुत कुछ शान्ति पाओगे। इसे छोड़ मेरे लिए भी एक राह खुल जायेगी-तुम्हारी गृहस्थी मे दासी की भांति रहकर स्वच्छन्द भाव से जीवन व्यतीत करूंगी।’

देवदास ने हंसकर कहा-‘अच्छा, तब मैं तुम्हे बुला लूंगा।’

चन्द्रमुखी ने मानो उनकी हंसी न देखकर कहा-‘देवदास, और एक बात पूछने की इच्छा होती है।’

‘क्या?’

‘तुमने इतनी देर तक मेरे साथ बातचीत क्यो की?’

‘क्या कुछ अनुचित है?’

‘यह नही जानती, लेकिन नयी बात है। शराब पीकर ज्ञान न रहने के पहले तुम कभी मुझसे बातचीत नही करते थे।’

देवदास ने उस प्रश्न का कोई उत्तर न देकर, विषण्ण मुख से कहा-‘आजकर शराब नही छूता, मेरे पिता की मृत्यु हो गयी है।’

चन्द्रमुखी बहुत देर तक उनके मुख की ओर करूणा-भरे नेत्रो से देखती रही, फिर कहा-‘इसके बाद फिर पियोगे क्या?’

‘कह नहीं सकता।’

चन्द्रमुखी ने उनके दोनो हाथो को कुछ खीचकर अश्रुपूर्ण और व्याकुल स्वर से कहा-‘अगर हो सके तो छोड़ देना। ऐसा अमूल्य जीवन-रत्न को नष्ट मत करो!’

देवदास सहसा उठकर खड़े हो गये, कहा-‘मैं चलता हूं। तुम जहां जाओ वहां से खबर देना, और अगर कुछ काम हो तो लिखना। मुझसे लज्जा मत करना।’

चन्द्रमुखी ने प्रणाम करके पद-धूलि लेकर कहा-‘आशीर्वाद दो, जिससे मै सुखी होऊं और एक भीख मांगती हूं, ईश्वर न करे, किन्तु यदि कभी दासी की आवश्यकता हो, तो मुझे स्मरण करना।’

‘अच्छा’ कहकर देवदास चले गये। चन्द्रमुखी ने दोनो हाथो से मुख ढांपकर रोते-रोते कहा‘भगवान! ऐसा करो जिसमे एक बार और दर्शन मिले।’

दो वर्ष हुए, पार्वती महेेन्द्र का विवाह करके निश्चिन्त हुई है। जलदबाला बुद्धिमती और कार्य-पटु है।

अब पार्वती के बदले गृहस्थी का बहुत-कुछ काम-काज वही करती है। पार्वती ने अब अपना मन दूसरी ओर लगाया है। आज पांच वर्ष हुए, उसका विवाह हुआ था; किन्तु अभी तक उसके कोई सन्तान नही हुई। अपने लड़की-लड़के के न रहने के कारण वह दूसरो के लड़की-लड़को को बहुत ह्रश्वयार करती है।

गरीब-गुरबे की बात को छोड़िये जिनके पास कुछ रुपये पैसे भी है, उनके पुत्र-पुत्रियो का भी अधिकांश भार वही वहन करती है। इसके अतिरिक्त ठाकुरबाड़ी के काम-काज, साधु-सन्यासियो की सेवा, लंगड़े-लूलो की शुश्रूषा मे अपना सारा दिन बिता देती थी। इसका व्यसन स्वामी को लगाकर पार्वती ने एक और अतिथिशाला भी निर्माण किया है। उससे निराश्रय और असहाय लोग अपनी इच्छा के अनुकूल रह सकते है। जमीदार के घर से उन लोगो को खाना-पीना मिलता है। और एक काम

पार्वती बहुत छिपाकर करती है, स्वामी को भी नही जानने देती। वह ऊंचे घराने के दरिद्र लोगो को गुप्त रूप से रुपये-पैसे से सहायता देती है। यही उसका निजी खर्च है। स्वामी के पास से प्रति मास जो कुछ उसको मिलता है, सब इसी मे खर्च कर देती है। किन्तु चाहे जिस तरह से जो कुछ व्यय होता था, वह सदर कचहरी के नायब और गुमाश्ता से नहीं छिपा रहता था। वे लोग आपस मे इस विषय पर बक-बक, झक-झक किया करते थे। दासियां लुक-छिपकर सुन आती है कि गृहस्थी का व्यय आजकल पहले की अपेक्षा दूना हो गया है; तहवील खाली पड़ गई, कुछ भी बचने नहीं पाता। गृहस्थी के बेजा खर्च बढ़ने से दास-दासियो को मर्मन्तक पीड़ा होती है। वे लोग ये सब बाते जलदबाला को सुना आती है। एक दिन रात मे उसने स्वामी से कहा-‘तुम क्या इस घर के कोई नही हो?’

महेन्द्र ने कहा-‘क्यों, क्या बात है?’

स्त्री ने कहा-‘दास-दासियां जानती है और तुम नही जानते? ससुर को तो नई मां प्राणो से बढ़कर है, वे तो कुछ कहेगे ही नही, परन्तु तुम्हे तो कहना उचित है!’

महेन्द्र ने बात नहीं समझी, परन्तु उत्सुक हो पूछा-‘किसकी बात कहती हो?’

जलदबाला गम्भीर भाव से स्वामी को मन्त्रणा देने लगी-‘नयी मां के कोई लड़की-लड़का तो है ही नही, फिर उन्हे गृहस्थी से क्यो प्रेम होने लगा, देखते ही नही हो सब उड़ाये डालती है?’

जलदबाला ने भू-कुंचित करके कहा-‘क्यो कैसे?’

जलदबाला ने कहा-‘तुम्हारे आंखे होती तो देखते! आजकल गृहस्थी का खर्च दूना हो गया, सदाव्रत, दान-खैरात, अतिथि-फकीर आदि के ऊपर अन्धाधुन्ध व्यय चढ़ रहा है। अच्छा, वे तो अपना परलोक सुधार रही है, किन्तु तुम्हारे लड़की-लड़के है? तब वे लोग क्या खायेगे? अपनी पूंजी बिकवाकर अन्त मे भीख मांगोगे क्या?’

महेन्द्र ने शैया पर बैठकर कहा-‘तुम किसकी बात कहती हो, मां की?’

जलदबाला ने कहा-‘मेरा भाग्य जल गया, जो ये सब बाते तुमसे मुझे कहनी पड़ती है।’

महेन्द्र ने कहा-‘इसीलिए तुम मां के नाम नालिश करने आई हो?’

जलदबाला ने क्रोध से कहा-‘मुझे नालिश-मुकदमे से काम नही, केवल भीतर की बाते जता दी, नही तो मुझी को दोष देते।’

महेन्द्र बहुत देर तक चुपचाप बैठे रहे, फिर कहा-‘तुम्हारे बाप के घर तो रोज हांडी भी नही चढ़ती, तुम जमीदार के घर के काम को क्या जानोगी?’

इस बार जलदबाला ने भी क्रोध करके कहा-‘तुम्हारे मां-बाप के घर कितनी अतिथिशालाएं है, जरा मै सुनूं तो?’

महेन्द्र ने तर्क-वितर्क नही किया, चुपचाप सो गये। सुबह उठकर पार्वत के पास आकर कहा-‘कैसा विवाह किया मां, इसको साथ लेकर गृहस्थी चलाना कठिन है। मै कलकत्ता जाऊंगा।’

पार्वती ने अवाक्‌ होकर कहा-‘क्यो?’

‘तुम लोगो को कड़ी बाते कहती है, इसलिए मैने उसका त्याग किया।’

पार्वती कुछ दिन से बड़ी बहू के आचरण देखती आती है, किन्तु उसने उस बात को छिपा के हंसकर कहा-छिः! वह तो बहुत अच्छी लड़की है ऐसा न कहो!’ इसके बाद जलदबाला ने एकान्त मे बुलाकर पूछा-‘बहू! झगड़ा हुआ है क्या?’

सुबह से स्वामी के कलकत्ता जाने की तैयारी देख जलदबाला मन-ही-मन डरती थी, सास की बात सुनकर रोते-रोते कहा-‘मेरा दोष नही है मां! किन्तु यही दासी सब ख्खरच-वरच की बाते करती है।’

पार्वती ने तब सभी बाते सुनी और आप ही लज्जित होकर बहू की आंखें पोछकर कहा-‘बहू, तुम ठीक कहती हो। किन्तु मैं वैसी गृहस्थिन नही हूं, इसीलिए खर्च की ओर ध्यान नहीं रहा।’

फिर महेन्द्र को बुलाकर कहा-‘महेन्द्र, बिना किसी अपराध के क्रोध नही करना चाहिए। तुम स्वामी हो, तुम्हारी मंगल-कामना के सामने स्त्री के लिए सब-कुछ तुच्छ है। बहू लक्ष्मी है।’ किन्तु उसी दिन से पार्वती ने हाथ मोड़ लिया। अनाथ, अन्धे, फकीर आदि कितने ही लोग लौटने लगे। मालिक ने यह सुन पार्वती को बुलाकर कहा-‘क्या लक्ष्मी का भंडार खाली हो गया?’

पार्वती ने साहस के साथ उत्तर दिया-‘केवल देने से ही नही चलता कुछ दिन जमा भी करना चाहिए।

देखते नही, खर्च कितना बढ़ गया है?’

‘इससे क्या मतलब, मुझे कै दिन रहना है, पुण्य-कर्म करके परलोक तो बनाना ही चाहिए?’

पार्वती ने हंसकर कहा-‘यह तो बिल्कुल स्वार्थ की बात है। अपना ही देखोगे और लड़की-लड़को को क्या बहा दोगे? कुछ दिन तक चुप रहो फिर सब उसी तरह चलेगा। मनुष्य के काम का कभी अन्त नही होता।’

अस्तु, चौधरी जी चुप हो रहे।

पार्वती को कोई काम नहीं रहा, इसी से चिन्ता कुछ बढ़ गयी। किन्तु सारी चिन्ता रहती है जिसकी आशा नही रहती, उसकी दूसरे प्रकार की चिन्ता रहती है। पूर्वोक्त चिन्ता मे सजीवता है, सुख है, तृप्ति है, दुख है और उत्कंठा है। इसी से मनुष्य श्रान्त हो जाते है-अधिक काल तक चिन्ता नही करते। किन्तु नैराश्य मे सुख नही है, दुख नही, उत्कंठा नही है केवल तृप्ति है। नेत्र से जल झरता है, गम्भीरता भी रहती है, किन्तु नित्य नवीन मर्मवेदना नही होती। हल्के बादल के समान इधर-उधर मंडराती है। जब तक हवा नही लगती, तब तक स्थिरता रहती है और ज्यों ही हवा लगती है गायब हो जाती है। तन्मय मन उद्वेगहीन चिन्ता मे एक सार्थक लाभ करता है। पार्वती की भी आजकल ठीक यही दशा है। पूजापाठ करने के समय अस्थिर, उद्देश्यहीन और हताश-सी रहती है; मन चटपट तालसोनापुर के बंसीवाड़ी, आम के बगीचे, पाठशाला, घर, बांध के तीर आदि स्थानो मे घूम आती है। इसके बाद वह किसी ऐसे स्थान मे जा छिपती है कि पार्वती स्वयं अपने आपको ढूंढकर बाहर नही निकाल सकती।

पहले होठ पर कुछ हंसी की रेखा दिखाई पड़ती है, फिर तत्काल ही आंख से एक बूंद आंसू टपककर पंचपात्र के जल से मिल जाता है। तब भी दिन कटता ही है। काम-काज मे, मधुर-मधुर बातचीत मे, परोपकार और सेवा शुश्रुषा मे दिन कटता था और अब उसे छोड़ ध्यानमग्ना योगिनी की भांति भी कटता है। कोई लक्ष्मी-स्वरूपा अन्नपूर्णा कहता था और कोई अन्यमनस्का, उन्मादिनी कहता था। किन्तु कल सुबह से कुछ और ही परिवर्तन देखा जाता है। वह कुछ तीव्र और कठोर हो गयी है। ज्वार की गंगा मे हठात्‌ भाटा का आरम्भ हुआ। घर मे कोई इसका कारण नही जानता, केवल हम लोग जानते है।

मनोरमा ने गांव से एक चिट्ठी लिखी है। वह निम्न भांति है‘पार्वती, बहुत दिन हुए, हम दोनो मे से किसी ने किसी को चिट्ठी नहीं लिखी; अतएव दोनो ही का

दोष है। मेरी इच्छा है कि इसे मिटा दिया जाय। हम दोनो को दोष स्वीकार कर अभिमान कम करना चाहिए। किन्तु मै बड़ी हूं, इसीलिए मै ही मान की भिक्षा मांगती हूं। आशा है, शीघ्र उत्तर दोगी। आज प्रायः एक महीना हुआ, मै यहां आयी हूं। हम लोग गृहस्थ-घर की लड़कियां है, शारीरिक दुख-सुख पर उतना ध्यान नही देती। मरने पर कहती है गंगालाभ हुआ और जीते रहने पर कहती है कि अच्छी है।

मै भी उसी प्रकार अच्छी हूं। किन्तु यह तो हुई अपनी बात; अब रही दूसरो की बात। यद्यपि कुछ ऐसे काम की बात नही है, फिर भी एक सम्वाद सुनाने की बड़ी इच्छा होती है। कल से ही सोच रही हूं कि तुम्हे सुनाऊं कि नही। सुनाने से तुम्हे क्लेश होगा और सुनाये बिना मैं रह नहीं सकती-ठीक मारीच की दशा हुई है। देवदास की दशा को सुनकर तुम्हे तो क्लेश ही होगा, पर मै भी तुम्हारी बातो को स्मरण कर पाने से नही बच सकती। भगवान ने बड़ी रक्षा की, नही तो तुम सरीखी अभिमानिनी उनके हाथ मे पड़कर, इतने दिन के भीतर या तो गंगा मे डूब मरती या विष खा लेती! उनकी बात यदि आज सुनोगी तब भी सुनना है और चार दिन बाद भी सुनना है; उसे दबाने-छिपाने से लाभ ही क्या?

‘आज प्रायः छः-सात दिन हुए, वह यहां पर आये है। तुम तो जानती हो कि द्विज की मां काशीवास करती है और देवदास कलकत्ता मे रहते है, घर पर केवल भाई के साथ कलह करने और रुपया लेने आते है। सुनती हूं कि ऐसे ही वह बीच-बीच मे आया करते है। जितने दिन रुपया इकट्ठा नही होता उतने दिन रहते है, रुपया पाने पर चले जाते है।’

‘उनके पिता को मरे आज ढाई बरस हुए। सुनकर आश्चर्य होता है कि इसी थोड़े समय मे ही अपनी आधी सम्पत्ति फूंक दी। द्विजदास अपने हिसाब-किताब से रहते है, इसी से किसी भांति अपने पिता की सम्पत्ति को अपने ही पास बचा के रखा, नही तो आज दूसरे लोग लूट खाते। शराब और वेश्या के पीछे सारा धन स्वाहा हो रहा है, कौन उसकी रक्षा कर सकता है? एक हम कर सकते है और उसमे भी देरी नही है। बड़ी रक्षा हुई जो तुम्हारा उनसे विवाह नही हुआ।’

‘हाय-हाय! दुख भी होता है। वह सोने-जैसा वर्ण नही, वह रूप नही, वह श्री नही, मानो वह देवदास नहीं, कोई दूसरे ही है। रूखे सिर के बाल हवा मे उड़ा करते है। आंखे भीतर घुस गयी है और नाक खड़ग्‌ की भांति बाहर निकली हुई है। कितना कुत्सित रूप हो गया है, यह तुमसे कहां तक कहूं?

देखने से घृणा होती है, डर मालूम होता है। सारे दिन नदी के किनारे-किनारे और बांध के ऊपर हाथ मे बन्दूक लिये चिड़िया मारा करते है। धूप मे सिर चक्कर आने से वह बांध के ऊपर उसी बेर के पेड़ के साये में नीचा सिर किये बैठे रहते है। संध्या होने के बाद घर पर जाकर शराब पीते है, रात मे सोते है या घूमते है, यह भगवान जाने’

‘उस दिन संध्या के समय मै नदी से जल लेने गयी थी। देखा, देवदास का मुंह सूखा हुआ है, बन्दूक हाथ मे लिये इधर-उधर घूम रहे है। मुझे पहचानकर, पास आकर खड़े हुए, मै डर से मर गयी।

घाट पर कोई नही था, मैं उस दिन अपने आपे मे नही थी। ईश्वर ने रक्षा की कि उन्होने किसी किस्म की बुरी छेड़खानी नही की, केवल सज्जनोचित शान्त भाव से कहा-‘मनो, अच्छी तरह तो हो?’

‘मै और क्या करती, डरते-डरते सिर नीचा किये हुए कहा-‘हां।’

तब उन्होने एक दीर्घ निःश्वास फेककर कहा-‘सुखी रहो बहिन, तुम्हे देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई।’

फिर धीरे-धीरे चले गये। मैं गिरते-पड़ते वहां से बड़े जोर से भागी। बाप रे! भाग्य से उन्होने हाथ आदि कुछ नहीं पकड़ा। रहने दो इन बातो को-इस सब दुर्वृत्ति की बातो के लिखने की जगह चिट्ठी में नही है।

‘बड़ा कष्ट दिया, क्यों बहिन? आज भी यदि उन्हे नही भूली होगी तो अवश्य ही कष्ट होगा, किन्तु लाचारी है। और यदि असावधानतावश कोई अपराध हुआ हो, तो अपने सहज गुण से इस स्नेहाकांक्षिणी-मनो बहिन को क्षमा करना।’

कल चिट्ठी आयी है। आज उसने महेन्द्र को बुलाकर कहा-‘दो पालकी और बत्तीस कहारो को बुला दो, मै अभी तालसोनापुर जाऊंगी।’

महेन्द्र ने आश्चर्य से पूछा-‘पालकी और कहार तो मै बुलाये देता हूं; किन्तु दो क्यो मां?’

पार्वती ने कहा-‘तुम साथ चलोगे। रास्ते मे अगर मर जाऊंगी, तो मुंह मे आग देने के लिए बड़े लड़के की जरूरत पड़ेगी।’

महेन्द्र ने और कुछ नही कहा। पालकी आने पर दोनो आदमियो ने प्रस्थान किया।

चौधरी जी यह सुनकर व्यग्र हो उठे, दास-दासियो से पूछा, किन्तु कोई ठीक कारण नही बता सका।

तब उन्होने अपनी बुद्धि से पांच दरबान, दास-दासियां भेज दी।

एक सिपाही ने पूछा-‘रास्ते मे भेट होने पर पालकी लौटा लावे कि नही?’

उन्होने कुछ सोचकर कहा-‘नही, लौटा लाने का कोई काम नही है। तुम लाग साथ जाना, जिससे कोई तकलीफ न हो।’

उसी दिन संध्या के बाद दोनो पालकियां तालसोनापुर पहुंची। किन्तु देवदास गांव मे नही थे, उसी दिन दोपहर मे कलकत्ता चले गये थे।

पार्वती ने सिर पीटकर कहा-‘दुर्भाग्य!’ और फिर मनोरमा के साथ भेट की।

मनोरमा ने पूछा-‘क्या देवदास को देखने आयी थी?’

पार्वती ने कहा-‘नही, साथ ले जाने के लिए आयी थी। उनका यहां पर अपना कोई नही है।’

मनोरमा अवाक्‌ हो रही, कहा-‘क्या कहती हो? जरा भी लज्जा नही करती?’

‘लज्जा, और फिर किससे? अपनी चीज अपने साथ ले जाऊंगी! इसमे लज्जा क्या है?’

‘छिः-छिः! क्या कहती हो? जिससे जरा भी सम्पर्क नही-ऐसी बात मुंह पर न लाओ।’

पार्वती ने मलिन हंसी हंसकर कहा-‘मनो बहिन, ज्ञान होने के बाद से जो बात मेरे हृदय मे बस रही है, जब-तब वही मुख से बाहर निकल जाती है, तुम बहिन हो, इसी से इन बातो को सुन लेती हो।’

दूसरे दिन पार्वती माता-पिता के चरणो मे प्रणाम करके फिर पालकी पर सवार होकर चली गयी।

आज दो वर्ष हुए चन्द्रमुखी ने अपने रहने के लिए अशथझूरी गांव मे छोट नदी के तीर पर एक ऊंची जगह मे दो छोटे-छोटे मिट्टी के घर बनाये है। पास ही मे एक खलियान है, वहां पर उसकी एक हृष्टपुष्ट काली गाय बंधी रहती है। दो घरो मे, एक रसोईघर और भंडार है तथा दूसरे मे वह सोती है। सोकर उठने से पहले ही रामवाग्दी की स्त्री सब घर-द्वार झाड़-बुहारकर साफ कर देती है। मकान के चारो ओर सहन बना है, बीच मे एक बेर का पेड़ है और एक ओ एक तुलसी की चौतरिया है। सामने नदी की धार है, उसके आस-पास लोगो ने खजूर और केले आदि के वृक्ष लगा रखे है। चन्द्रमुखी को छोड़, इस घाट का उपयोग और कोई नही करता। वर्षा-काल मे नदी के फनफनाने पर चन्द्रमुखी के मकान के नीचे तक जल आ जाता है। उस समय लोग व्यग्र हो उठते है और कुदाली से मिट्टी खोदकर जगह को ऊंची बनाने के लिए दौड़ आते है। गांव मे ऊंची जाति के लोग नही रहते। किसान अहीर, कहार, कुर्मी, वाग्दी, दो घर कलवार और दो घर चमार रहते है। चन्द्रमुखी ने गांव मे आकर देवदास को सूचना दी; उत्तर मे उन्होने कुछ और रुपये भेज दिये। इन रुपयो मे से चन्द्रमुखी गांव के लोगो को उधार देती है। आपद-विपद मे सभी आकर उससे रुपया उधार ले जाते है। चन्द्रमुखी सूद नही लेती, उसके बदले कन्द-मूल, शाक-भाजी, जिसकी जो इच्छा होती है, दे जाता है। अमल के लिए भी किसी से जोरजबरदस्ती नही करती। जो नही दे सकते, वे नही देते।

चन्द्रमुखी हंसकर कहती-‘अब तुझे कभी न दूंगी।’

वह नम्र भाव से कहता-‘मां, ऐसा आशीर्वाद दो कि इस बार अच्छी फसल हो।’

चन्द्रमुखी आशीर्वाद देती; किन्तु यदि फिर अच्छी फसल न होती तो वे फिर रोते हुए आकर हाथ पसारते और चन्द्रमुखी फिर देती। मन-ही-मन हंसकर वह कहती-वे अच्छी तरह से रहे, मुझे रुपयेपैसे की क्या कमी है।

किन्तु वे कहां है? प्रायः छः महीने हुए, उसे कोई खबर नही मिली। चिट्ठी लिखी, किन्तु कोई जवाब नही मिला। रजिस्ट्री लगायी, वह लौट आयी। चन्द्रमुखी ने एक ग्वाले को अपने घर के पास बसा रखा था। उसके लड़के के विवाह मे साढ़े दस गंडे रुपये से सहायता दी थी; एक जोड़ा कड़ा भी खरीद दिया। उसका सारा परिवार चन्द्रमुखी का आश्रित और आज्ञाकारी था। एक दिन प्रातःकाल चन्द्रमुखी ने भैरव ग्वाला को बुलाकर कहा-‘भैरव, यहां से तालसोनापुर कितनी दूर है, जानते हो?’

भैरव ने सोचकर कहा-‘यहां से कोई दो धाप पर कचहरी है।’

चन्द्रमुखी ने पूछा-‘वहां पर जमीदार रहते है?’

भैरव ने कहा-‘हां, वे भारी जमीदार है। यह गांव भी उन्ही का है। आज तीन वर्ष हुए, उनका स्वर्गवास हो गया। उनके श्राद्ध मे सारी प्रजा ने एक महीने तक पूरी तरकारी खायी थी। अब उनके दो लड़के है; वे लोग बहुत भारी आदमी है-राजा है।’

चन्द्रमुखी ने पूछा-‘भैरव, तुम मुझे वहां तक पहुंचा सकते हो?’

भैरव ने कहा-‘क्यो नही पहुंचा सकता; जिस दिन इच्छा हो, चलो।’

चन्द्रमुखी ने उत्सुक होकर कहा-‘तब चलो न भैरव, मै आज ही चलूंगी।’

भैरव ने विस्मित होकर कहा-‘आज ही?’ फिर चन्द्रमुखी के मुख की ओर देखकर कहा-‘तो तुम जल्दी से रसोई-पानी से निबट लो और मै भी तब तक थोड़ी फरूही बांधकर आता हूं।’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘आज मै रसोई करूंगी नही। भैरव तुम फरूही लेकर आओ।’

भैरव घर पर गया और कुछ फरूही चादर मे बांधकर, एक लाठी हाथ मे लेकर तुरन्त लौट आया, कहा-‘तब चलो; पर क्या तुम क्या खाओगी नही?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘नही भैरव, अभी मेरा पूजा-पाठ नही हुआ है, अगर समय पाऊंगी तो वही पर सब करूंगी।’

भैरव आगे-आगे रास्ता दिखलाता हुआ चला। पीछे-पीछे चन्द्रमुखी बड़े कष्ट के साथ पगडंडी के ऊपर चलने लगी। अभ्यास न रहने के कारण दोनो कोमल पांव क्षत-विक्षत हो गये। धूप के कारण सारा मुख लाल हो उठा। खाना-पीना कुछ न होने पर भी चन्द्रमुखी खेत-पर-खेत पार करती हुई चलने लगी।

खेतिहर किसान लोग आश्चर्यित होकर उसके मुख की ओर देखते थे।

चन्द्रमुखी एक लाल पाढ़ की साड़ी पहने हुई थी, हाथ मे दो सोने के कड़े पड़े हुए थे, सिर पर ललाट तक घूंघट था और सारा शरीर एक मोटे बिछौने की चादर से ढंका हुआ था। सूर्यदेव के अस्त होने मे अब और अधिक विलम्ब नही है। उसी समय दोनो गांव मे आकर उपस्थित हुए। चन्द्रमुखी ने थोड़ा हंसकर कहा-‘भैरव, तुम्हारा दो धाप इतनी जल्दी कैसे समाप्त हो गया?’

भैरव ने इस परिहास को न समझकर सरल भाव से कहा-‘इस बार तो चली आयीं। पर क्या तुम्हारी सूखी देह आज ही फिर लौटकर चल सकेगी?’

चन्द्रमुखी ने मन-ही-मन कहा-आज क्या, जान पड़ता है कल भी ऐसे इतना रास्ता नही चल सकूंगी।

प्रकाश ने कहा-‘भैरव, क्या यहां गाड़ी नही मिलेगी?’

भैरव ने कहा-‘मिलेगी क्यो नही, बैलगाड़ी मिलेगी, कहो तो ठीक करके ले आवे?’ गाड़ी ठीक करने का आदेश देकर चन्द्रमुखी ने जमीदार के घर मे प्रवेश किया।

भैरव गाड़ी का प्रबन्ध करने दूसरी ओर चला गया। भीतर ऊपरी खंड मे-दालान मे, बड़ी बहू बैठी थी। एक दासी चन्द्रमुखी को वही लेकर आयी। दोनो ने एक दूसरे को एक बार ध्यानपूर्वक देखा।

चन्द्रमुखी ने नमस्कार किया। बड़ी बहू शरीर पर अधिक अलंकार नही धारण करती, किन्तु आंखो के कोण पर अहंकार झलका करता है। दोनो होठ और दांत पान और मिस्सी से काले पड़ गये है। गाल कुछ ऊपर उठे हुए है और सारा चेहरा भरा-पूरा। केशो को इस प्रकार सजाकर बांधती है कि कपाल जगमगा उठता है। दोनो कानो मे मिलाकर कोई बीस-तीस छोटी-बड़ी बालियां पड़ी है। नाक के नीचे एक बुलाक लटकता है। नाक के एक ओर लौग पहने है। जान पड़ता है, यह सुराख नथ पहनने के लिए बना है।

चन्द्रमुखी ने देखा, बड़ी बहू बहुत मोटी-सोटी है, रंग विशेष श्याम है, आंखे बड़ी-बड़ी है, गोल गठन का मुख है, काले पाढ़ की साड़ी पहने है और एक नारंगी रंग की कुरती पहने है-यह सब देख चन्द्रमुखी के मन मे कुछ घृणा-सी उत्पन्न हुई। बड़ी बहू ने देखा कि चन्द्रमुखी के वयस्क होने पर भी उसका सौन्दर्य कम नही हुआ है। दोनो ही सम्भवतः समवयस्क है, किन्तु बड़ी बहू ने मन-ही-मन इसे स्वीकार नही किया। इस गांव मे पार्वती के अतिरिक्त इतना सौन्दर्य और किसी मे नही देखा।

आश्चर्यित होकर पूछा-‘तुम कौन हो?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘मै आपकी ही एक प्रजा हूं, खजाने की मालगुजारी कुछ बाकी पड़ गयी थी, उसी को देने आयी हूं।’

बड़ी बहू ने मन-ही-मन प्रसन्न होकर कहा-‘तो यहां क्यो आयी, कचहरी मे जाओ।’

चन्द्रमुखी ने मीठी हंसी हंसकर कहा-‘मां, मै बड़ी दुखिया हूं, सब रूपया नही दे सकती। सुना है कि आप बड़ी दयावती है; इसी से आपके पास आयी हूं कि कुछ माफ कर दे।’

इस प्रकार की बात बड़ी बहू ने अपने जीवन मे पहली ही बार सुनी। उनमे दया है मालगुजारी माफ कर सकती हैं, आदि कहने के कारण चन्द्रमुखी तत्काल ही उनकी प्रिय-पात्री हो गयी। बड़ी बहू ने कहा-‘दिन-भर मे कितने ही रुपये मुझे छोड़ने होते है, कितने ही लोग मुझे आकर पकड़ते है; मै नाही नही कर सकती, इसलिए सभी मेेरे ऊपर क्रोध भी करते है। तो तुम्हारा कितना रुपया बाकी पड़ता है?’

‘अधिक नही, कुल दो रुपये; पर मेरे लिए यही दो रुपये पहाड़ा हो रहे है; सारे दिन आज रास्ता चलकर यहां आयी हूं।’

बड़ी बहू ने कहा-‘अहा! तुम दुखिया हो, तुम्हारे ऊपर मुझे दया करनी उचित है। ऐ बिन्दू! इनको बाहर लिये जाओ, दीवानजी से मेरा नाम लेकर कह देना कि दो रुपये माफ कर दे। अच्छा, तुम्हारा घर कहां है?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘आपके ही राज्य मे-अशयझूरी गांव मे। अच्छा मां, क्या छोटे मालिक नही है?’

बड़ी बहू ने कहा-‘अभागी! छोटा मालिक कौन है? दो दिन बाद सब मेरा ही तो होगा।’

चन्द्रमुखी ने उद्विग्न होकर पूछा-‘क्यो? जान पड़ता है, छोटे बाबू पर खूब कर्ज है?’

बड़ी बहू ने थोड़ा हंसकर कहा-‘मेरे यहां कई गांव बन्धक है। अब तक तो सब बिक गया होता।

कलकत्ता मे शराब और वेश्या के पीछे सारा धन लुटाये डाल रहे है, उसका कोई हिसाब नही, कोई अन्त नही।’

चन्द्रमुखी का मुख सूख गया, थोड़ा ठहरकर उसने पूछा-‘हां मां, तो छोटे बाबू इसी से घर भी नही आते?’

बड़ी बहू ने कहा-‘आते क्यो नही है! जब रुपये की जरूरत पड़ती है तो आते है। उधार काढ़ते है, जमीन बन्धक रखते है, फिर चले जाते है। अभी दो महीने हुए आये थे, बाहर हजार रुपये ले गये।

बचने की भी तो उम्मीद नही है, शरीर मे कई-एक बुरे रोग लग गये है! छिः! छिः!’

चन्द्रमुखी सिहर उठी, मलिन मुख से उसने पूछा-‘वे कलकत्ता मे कहा रहते है?’

बड़ी बहू ने सिर ठोक कर, प्रसन्न मुख से कहा-‘बड़ी बुरी दशा है! यह क्या कोई जानता है कि कहां, किस होटल मे रहते है, किस दोस्त के मकान मे पड़े रहते है-यह वही जाने या उनका दुर्भाग्य जाने।’

चन्द्रमुखी सहसा उठ खड़ी हुई, और बोली-‘अब मै जाती हूं।’

बड़ी बहू ने थोड़ा आश्चर्यित होकर कहा-‘जाओगी? अरी ओ बिन्दू...!’

चन्द्रमुखी ने बीच मे ही बाधा देकर कहा-‘ठहरो मां, मै खुद ही कचहरी जाती हूं।’ यह कहकर वह धीरे-धीरे चली गयी। घर के बाहर देखा, भैरव आसरा देख रहा है, और बैलगाड़ी एक किनारे खड़ी है।

उसी रात को चन्द्रमुखी घर लौट आयी। प्रातःकार भैरव को फिर बुलाकर कहा-‘भैरव, मै आज कलकत्ता जाऊंगी। तुम तो साथ जा नही सकोगे, इसलिए तुम्हारे लड़के को साथ ले जाऊंगी। बोलो, क्या कहते हो?’

भैरव-‘जैसी तुम्हारी इच्छा हो। लेकिन कलकत्ता क्यो जाती हो मां, क्या कोई खास काम है?’

चन्द्रमुखी-‘हां भैरव, खास काम है।’

‘भैरव-‘और जाओगी कब?’

चन्द्रमुखी-‘यह नही कह सकती भैरव। अगर हो सका तो जल्दी ही आऊंगी और नही तो देर लगेगी।

और अगर नही आ सकी तो घर-द्वार सब तुम्हारा ही होगा।’

पहले तो भैरव अवाक्‌ हो गया, फिर उसकी दोनो आंखो मे जल भर आया, कहा-‘यह कैसी बात कहती हो मां! तुम्हारे न आने से इस गांव के लोग कैसे रह सकेगे?’

चन्द्रमुखी के नेत्र भी सजल हो उठे, थोड़ी मीठी हंसी हंसकर कहा-‘यह क्यो भैरव, मै तो कुल दो ही वर्ष से आयी हूं, इसके पहले तुम लोग कैसे रहते थे?’

इसका उत्तर मूर्ख भैरव नही दे सकता, किन्तु चन्द्रमुखी हृदय मे सब-कुछ समझती थी। भैरव का लड़का केवला उसके साथ जायेगा। गाड़ी पर आवश्यक चीज-वस्तु लादकर चलने के समय सभी स्त्रीपुरुष देखने आये, देखकर रोने लगे। चन्द्रमुखी भी अपनी आंखो के आंसू नही रोक सकी। नाश हो ऐसे कलकत्ता का, यदि देवदास न होते तो कलकत्ता मे रानी का पद मिलने पर भी चन्द्रमुखी ऐसे प्रेम तृणवत त्यागकर कभी न जा सकती।

दूसरे दिन वह क्षेत्रमणि के घर पर आ उपस्थित हुई। उसके पहले घर मे इस समय दूसरे लोग रहते थे। क्षेत्रमणि अवाक्‌ हो गया, पूछा-‘बहिन, इतने दिनो तक कहां थी?’

चन्द्रमुखी ने सत्य बात को छिपाकर कहा-‘इलाहाबाद थी।’

क्षेत्रमणि ने एक बार अच्छी तरह से सारा शरीर देखकर कहा-‘तुम्हारे सब गहने क्या हुए, बहिन?’

चन्द्रमुखी ने हंसकर संक्षेप मे उत्तर दिया-‘सब है।’

उसी दिन मोदी से भेट करके कहा-‘दयाल, मेरे कितने रुपये चाहिए?’

दयाल बड़ी विपद मे पड़ा, कहा-‘यही कोई साठ-सत्तर रुपये चाहिए। आज नही, दो दिनो के बाद दूंगा।’

‘तुम्हे कुछ न देना होगा, यदि मेरा एक काम कर दो।’

‘कौन काम?’

‘दो-तीन दिन के भीतर ही हम लोगो के मुहल्ले मे एक किराये का घर ठीक कर दो-समझे?’

दयाल ने हंसकर कहा-‘समझा।’

‘अच्छा घर हो, अच्छे-अच्छे बिछौने-चादर, चारपाई, लैम्प, दो कुरसियां, एक टेबिल हो-समझे?’

दयाल ने सिर नीचा कर लिया।

‘साड़ी, कुरती, श्रृंगारदान, अच्छे गिलट के गहने आदि कहां मिल सकते है?’

दयाल मोदी ने ठिकाना बता दिया।

चन्द्रमुखी ने कहा-‘तब वह सब भी एक सेट अच्छा-सा देखकर खरीदना होगा। मै साथ चलकर पसन्द कर लूंगी।’ फिर हंसकर कहा-‘मुझे जो-जो चाहिए सो तो जानते ही हो, एक दासी भी ठीक करनी होगी।’

दयाल ने कहा-‘कब चाहिए?’

‘जितना जल्द हो सके। दो-तीन दिन के भीतर ही ठीक होने से अच्छा होगा।’ यह कहकर उसके हाथ मे सौ रुपये का नोट रखकर कहा-‘अच्छी-अच्छी चीजे ले आना, सस्ती नही देखना।’

तीसरे दिन वह नये घर चली गयी। सारा दिन केवलराम को साथ लेकर अपनी इच्छानुसार घर को सजाया एवं सन्ध्या के पहले अपने को सजाने बैठी। साबुन से मुंह धोया, इसके बाद पाउडर लगाया, लाल रंग से पांवो को रंगा और पान खाकर होठ रंगे। फिर सारे अंगो मे आभूषण धारण किये, कुरती और साड़ी पहनी। बहुत दिन बाद आज केश संवारकर सिर मे टीका लगाया। आईने मे मुंह देखकर मन-ही-मन कहा-अब और न जाने और क्या-क्या भाग्य मे बदा है।

देहाती बालक केवलराम ने यह साज-बाज और पोशाक देखकर भीत भाव से पूछा-‘यह क्या, बहिन?’

चन्द्रमुखी ने हंसकर कहा-‘केवल, आज मेरे पति आवेगे।’

केवलराम विस्मय नेत्रो से देखता रहा।

सन्ध्या के बाद क्षेत्रमणि आया, पूछा-‘बहिन, अब यह सब क्या?’

चन्द्रमुखी ने मुख नीचा कर, हंसकर कहा-‘क्यो, यह सब अब नही चाहिए?’

क्षेत्रमणि कुछ देर चुपचाप देखता रहा, फिर कहा-‘जितनी उम्र बढ़ती जाती है, उतना ही सौन्दर्य भी बढ़ता जाता है।’

वह चला गया। चन्द्रमुखी आज बहुत दिनो बाद फिर खिड़की पर आकर बैठी। एकटक रास्ते की ओर देखती रही। यही उसका काम है, यही करने वह आयी है। जितने दिन वह यहां रहेगी उतने दिन यही करेगी। कोई-कोई नये आदमी आना चाहते थे, द्वार ठेलते थे, किन्तु उसी समय केवलराम कहता था‘यहां नही आना।’

पुराने परिचित लोगो मे से यदि कोई आता तो चन्द्रमुखी बैठकर, हंस-हंसकर बाते करती। बात-ही बात मे देवदास की बात पूछता। जब वे न बता सकते, तो उदास मन से विदा कर देती। रात अधिक बीतने पर स्वयं बाहर निकल जाती थी। मुहल्ले-मुहल्ले, द्वार-द्वार घूमती-फिरती छिपकर लोगो की बाते कान देकर सुनती, कुछ लोग अनेको प्रकार की बाते करते थे, किन्तु वह जो सुनना चाहती थी, वह कही नही सुन जाती थी। आते-जाते हुए लोगो मे से वह बहुतो को देवदास समझकर पास जाती थी, किन्तु जब किसी दूसरे को देखती थी तो धीरे से लौट आती थी। दोपहर के समय वह अपनी पुरानी साथिनो के घर जाती। बात-ही-बात मे पूछती-‘क्यो, देवदास के विषय मे भी कुछ जानती हो?’

वह पूछती-‘कौन देवदास?’

चन्द्रमुखी उत्सुक भाव से परिचय देने लगती-‘गोरा रंग है, सिर पर घुंघराले बाल है, ललाट के एक ओर चोट का दाग है, धनी आदमी है, बहुत रुपया खर्च करते है, क्या तुम पहचानती हो?’

कोई पता नही बता सकता था। हताश होकर उदास मन से चन्द्रमुखी घर लौट आती थी। बड़ी रात तक रास्ते की ओर देखती रहती थी। नीद आने पर विरक्त भाव से मन-ही-मन कहती-यह क्या तुम्हारे सोने का समय है?

इस तरह एक महीना बीत गया। केवलराम भी ऊब उठा। चन्द्रमुखी को स्वयं पर सन्देह होने लगा कि वे यहां पर नही है। फिर भी आशा-भरोसा मे दिन पर दिन बीतने लगे।

कलकत्ता आये हुए डेढ़ महीना हो गया। आज उसके ब्रह्म प्रसन्न हुए। रात के ग्यारह बज गये थे, हताश मन से वह घर लौट रही थी। इतने मे ही देखा, रास्ते के एक ओर दरवाजे के सामने एक आदमी आप-ही-आप कुछ बड़बड़ा रहा है। इस कंठ-स्वर से वह भली-भांति परिचित थी। करोड़ो लोगो के बीच मे भी वह उस स्वर को पहचान सकती थी। उस स्थान पर कुछ अन्धकार था, वही पर कोई मनुष्य नशे मे चूर पड़ा हुआ था। चन्द्रमुखी ने पास जाकर शरीर पर हाथ रखकर पूछा-‘तुम कौन हो, जो यहां पर इस तरह पड़े हो?’

उस मनुष्य ने जोर से कहा-‘सुनो तो सही मेरे मन की बाते, यदि पाऊं मै अपने स्वामी को।’

चन्द्रमुखी को अब और कुछ सन्देह नही रहा, उसने पुकारा-‘देवदास!’

देवदास ने उसी भांति कहा-‘हूं?’

‘यहां क्यो पड़े हो, घर चलोगे?’

‘नही, अच्छी तरह हूं।’

‘थोड़ी शराब पियोगे?’

‘हां पिऊंगा’-कहकर एकाएक चन्द्रमुखी का गला जकड़ लिया, कहा-‘ऐसी भलाई करने वाले तुम कौन हो भाई?’

चन्द्रमुखी की आंखो से आंसू गिरने लगे। बड़े परिश्रम के साथ गिरते-पड़ते चन्द्रमुखी के कन्धे का सहारा लेकर उठे। कुछ देर मुख की ओर देखने के बाद कहा-‘भाई यह बड़ी अच्छी चीज है।’

चन्द्रमुखी ने आह भरी हंसी हंसकर कहा-‘हां, बड़ी अच्छी चीज है। जरा मेरे कन्धे का सहारा लेकर कुछ आगे चलो, एक गाड़ी ठीक करनी होगी।’

‘गाड़ी क्या होगी?’-रास्ते मे आते-आते देवदास ने बैठे हुए गले से कहा-‘सुन्दरी, तुम मुझे पहचानती हो?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘पहचानती हूं।’

देवदास ने हकलाते हुए कहा-‘और लोगो ने तो मुझे भुला दिया है, भाग्य है जो तुम पहचानती हो।’

फिर गाड़ी पर सवार होकर, चन्द्रमुखी के शरीर पर बोझ दिये ही घर पर आये। दरवाजे के पास खड़े होकर जेब मे हाथ डालकर कहा-‘सुन्दरी; गाड़ी तो ले आयी, किन्तु जेब मे कुछ नही है।’

चन्द्रमुखी ने कोई उत्तर नही दिया। चुपचाप हाथ पकड़े हुए ऊपर लाकर लिटाकर कहा-‘सो जाओ।’

देवदास ने उसी भांति बैठे हुए गले से कहा-‘क्या कुछ चाहिए नही?

मैने जो कहा कि जेब खाली, कुछ मिलने की आशा नही है। समझी सुन्दरी?’

सुन्दरी उसे समझ गयी, कहा-‘कल देना।’

देवदास ने कहा-‘इतना विश्वास तो ठीक नही। क्या चाहिए, खुलकर कहो?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘कल सुनना।’-यह कहकर वह बगले के दूसरे कमरे मे चली गयी।

देवदास की जब नीद टूटी तो दिन चढ़ गया था। घर मे कोई नही था। चन्द्रमुखी स्नान करके भोजन पकाने की तैयारी मे थी। देवदास ने चारो और आश्चर्य से देखा कि इस स्थान मे वे कभी नही आये थे, एक चीज भी नही पहचान सके। पिछली रात की एक बात भी याद नही आती थी; केवल किसी की आन्तरिक सेवा का कुछ-कुछ स्मरण आता था। किसी ने मानो बड़े स्नेह के साथ लाकर सुला दिया।

इसी समय चन्द्रमुखी ने घर मे प्रवेश किया। रात की सज-धज मे इस समय बहुत कुछ परिवर्तन हो गया था। शरीर पर गहने तो अब भी वे ही थे। किन्तु रंगीन साड़ी, माथे का टीका, मुख मे पान का दाग आदि कुछ भी नही थे। केवल एक धोई हुई श्वेत साड़ी पहने हुए वह घर मे आयी। देवदास चन्द्रमुखी को देखकर खिल उठे, बोले-‘कहां से कल मुझे यहां बुला ले आयी?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘बुला नही लायी, रास्ते मे तुम्हे पड़ा हुआ देखकर उठा ले आयी।’

देवदास ने कुछ गम्भीर होकर कहा-‘अच्छा, यह तो हुआ सो हुआ, पर तुम्हे यहां कैसे पाता हूं? तुम कब आयी? तुम तो गहना नही पहनती थी, फिर कैसे पहनने लगी?’

चन्द्रमुखी ने देवदास के मुख पर एक तीव्र दृष्टि डालकर कहा-‘फिर से...!’

देवदास ने हंसकर कहा-‘नही-नही, यह हो नही सकता; ऐसी हंसी करने मे भी दोष है। आयी कब?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘डेढ़ महीना हुआ।’

देवदास ने मन-ही-मन कुछ हिसाब लगाया, फिर कहा-‘मेरे मकान से लौटने के बाद ही यहां पर आयी?’

चन्द्रमुखी ने विस्मित होकर कहा-‘तुम्हारे घर पर मेरे जाने की खबर तुम्हे कैसे मिली?’

देवदास ने कहा-‘तुम्हारे लौटने के बाद ही मै मकान पर गया था। एक दासी से, जो तुम्हे बड़ी बहू के पास ले गयी थी, सुनने मे आया कि कल अशथझूरी गांव से एक बड़ी सुन्दर स्त्री आयी थी। फिर समझना कितना कठिन था? किन्तु इतना गहना कहां से गढ़ाया?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘गढ़ाया नही; ये सब गिलट के गहने है, इन्हे कलकत्ता मे आकर खरीदा है।

तुम्हे देखने के लिए मैने कितना फिजूल खर्च किया है, और कल तो तुम मुझे पहचान भी नही सके।’

देवदास ने हंसकर कहा-‘एकबारगी नही पहचान सका, कोशिश करने पर पहचाना था। कई बार मन मे आया कि चन्द्रमुखी को छोड़कर मेरी ऐसी सेवा कौन करेगा?’

मारे हर्ष के चन्द्रमुखी को रोने की इच्छा हुई। कुछ देर तक चुप हो रहने के बाद कहा-‘देवदास, मुझसे अब वैसी घृणा करते हो या नही?’

देवदास ने जवाब दिया-‘नही, वरन्‌ प्रेम करता हूं।’

दोपहर मे स्नान करने के समय चन्द्रमुखी ने देखा कि देवदास की छाती मे एक फलालेन का टुकड़ा बंधा है। भयभीत होकर पूछा-‘यह क्या फलालेन क्यो बांधा है?’

देवदास ने कहा-‘छाती मे एक प्रकार की पीड़ा होती है, तुम तो सुख से हो?’

चन्द्रमुखी ने सिर धुनकर कहा-‘सर्वनाश करना चाहते हो क्या? फेफड़े मे पीड़ा है?’

देवदास ने हंसकर कहा-चन्द्रमुखी ऐसा ही कुछ है। उसी दिन डॉक्टर ने आकर बहुत देर तक परीक्षा करने के बाद यही आशंका स्थिर की। औषध लिख दी तथा बताया कि यदि विशेष सावधानीपूर्वक न रहा जायेगा तो भारी अनिष्ट होने की सम्भावना है। दोनो ही ने इसका तात्पर्य समझा। पत्र द्वारा घर से धर्मदास को बुलाया गया और चिकित्सा के लिए बैक से रुपया आया। दो दिन इसी भांति बीत गये, किन्तु तीसरे दिन ज्वर का आविर्भाव हुआ।’

देवदास ने चन्द्रमुखी को बुलाकर कहा-‘बड़े अच्छे समय से आयी, नही तो मुझे यहां कौन देखता?’

आंसू पोछकर चन्द्रमुखी प्राणपण से सेवा करने बैठी। दोनो हाथ जोड़कर प्रार्थना की-‘भगवान्‌, ऐसे असमय मे इतना काम आ पड़ेगा, यह स्वह्रश्वन मे भी आशा नही थी। किन्तु देवदास को शीघ्र अच्छा कर दो!’

प्रायः एक मास से ऊपर अधिक देवदास चारपाई पर पड़े रहे, फिर धीरे-धीरे आरोग्य होने लगे। रोग अधिक बढ़ने नही पाया।

इसी समय एक दिन देवदास ने कहा-‘चन्द्रमुखी, तुम्हारा नाम बहुत बड़ा है। पुकारने मे कुछ असुविधा-सी होती है, इसे थोड़ा छोटा कर देना चाहता हूं।’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘अच्छी बात है।’

देवदास ने कहा-‘आज से तुम्हे ‘बहू’ कह के पुकारूंगा।’

चन्द्रमुखी हंस पड़ी, कहा-‘इसे पुकारने का कोई मतलब भी होना चाहिए।’

‘क्या सभी बातो का मतलब हुआ करता है? मेरी इच्छा।’

‘यदि इच्छा ही है तो कहो। किन्तु यह इच्छा कैसी, यह तो कहो!’

‘नही, कारण मत पूछो।’

चन्द्रमुखी ने सिर नीचा करके कहा-‘अच्छी बात है, यही सही।’

देवदास ने बहुत देर तक चुप रहने के बाद हठात्‌ गम्भीर भाव से पूछा-‘अच्छा बहू, तुम मेरी कौन हो, जो इतने प्राणपण से मेरी सेवा करती हो?’

चन्द्रमुखी न तो लज्जाशील वधू ही है और न बातचीत मे अनभ्यस्त बालिका; देवदास के मुख की ओर स्थिर-शान्त दृष्टि रखकर स्नेह-जड़ित कंठ से कहा-‘तुम मेरे सर्वस्व हो, क्या यह अब भी नही समझ सके?’

देवदास दीवाल की ओर देख रहे थे। उसी ओर देखते हुए धीरे-धीरे कहा-‘यह सब समझता हूं, किन्तु इससे आनन्द नही मिलता। पार्वती को मै कितना ह्रश्वयार करता था और वह भी मुझे कितना ह्रश्वयार करती थी, पर इससे अन्त मे मिला कष्ट ही। बहुत दुख पाने पर सोचा था कि अब कभी प्रेम के फंदे मे पांव नही दूंगा। जानते हुए दिया भी नही। परन्तु तुमने यह क्या किया? जोर देकर फिर उसमे मुझे क्यो फंसाया?-यह कहकर कुछ क्षण चुप रहने के बाद फिर कहा-‘बहू, जान पड़ता है, तुम भी पार्वती की भांति दुख उठाओगी।’

चन्द्रमुखी मुख पर आंचल देकर चारपाई के एक ओर चुपचाप बैठी रही।

देवदास ने फिर मृदु-कंठ से कहना आरम्भ किया-‘तुम दोनो मे कितनी विषमता है। एक कितनी अभिमानिनी और उद्धत है और दूसरी कितनी शांत और कितनी संयम है। वह कुछ भी नही सह सकती और तुम कितना सहती हो! उसका कितना यश और कितना नाम है और तुम कितनी कलंकिता हो!

सभी उसे ह्रश्वयार करते है, पर तुम्हे कोई ह्रश्वयार नही करता! फिर मै ह्रश्वयार करता हूं-‘कैसे करता हूं!’-

कहकर एक दीर्घ निःश्वास फेककर फिर कहा-‘पाप-पुण्य के विचारकर्ता तुम्हारा कैसा विचार करेगे, यह नही कह सकता, पर मृत्यु के बाद यदि मिलन होगा तो मै तुमसे कभी दूर नही रहूंगा।’

चन्द्रमुखी भीतर-ही-भीतर रो पड़ी, दिल बड़ा छोटा हो गया, मन-ही-मन प्रार्थना करने लगी‘भगवान! किसी काल या किसी जन्म मे अगर इस पापिष्ठा का प्रायश्चित हो जाय तो मुझे इन्हे ही पुरस्कार मे देना!

दो महीने बीत गये। देवदास आरोग्य हो गये, पर अभी शरीर नही भरा। वायु-परिवर्तन आवश्यक था।

कल पश्चिम की ओर जायेगे, साथ मे केवल धर्मदास रहेगा।

चन्द्रमुखी ने देवदास का हाथ पकड़कर कहा-‘तुम्हे एक दासी भी तो चाहिए-मुझे साथ लेते चलो।’

देवदास ने कहा-छिः! यह क्या हो सकता है? और जो चाहे सो करूं, परन्तु इतनी बड़ी निर्लज्जता नही कर सकता।’’

चन्द्रमुखी चुप हो रही। वह अबूझ नही है, सब बाते सहज ही समझ गयी, और जो हो, पर इस संसार मे उसका सम्मान नही है, उसके रहने से देवदास की अच्छी सेवा होगी, सुख मिलेगा, किन्तु कही भी सम्मान नही मिलेगा। आंख पोछकर कहा-‘अब फिर कब देख सकूंगी?’

देवदास ने कहा-‘यह नही कह सकता। चाहे कही भी होऊं, परन्तु तुम्हे भूलूंगा नही, तुम्हे देखने की तृष्णा कभी मिटेगी नही।’

प्रणाम करके चन्द्रमुखी अलग खड़ी हो गयी। मन-ही-मन कहा-यही मेरे लिए यथेष्ट है, इससे अधिक आशा करना व्यर्थ है।’

जाने के समय देवदास ने चन्द्रमुखी के हाथ मे और दो हजार रुपये रखकर कहा-‘इन्हे रखो। मनुष्य के शरीर का कोई विश्वास नही है, पीछे तुम दुख-सुख मे किसके आगे हाथ पसारोगी?’

चन्द्रमुखी ने इसे भी समझा, इसी से रुपया ग्रहण कर लिया। आंसू पोछकर पूछा-‘तुम एक बात मुझे बताते जाओ।’

देवदास ने मुख की ओर देखकर कहा-‘क्या?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘बड़ी बहू-तुम्हारी भाभी-ने कहा था कि तुम्हारे शरीर मे बुरा रोग उत्पन्न हो गया है, यह क्या सच है?’

प्रश्न सुनकर देवदास को दुख हुआ, कहा-‘बड़ी बहू सब कह सकती है, किन्तु क्या तुम नही जानती? मेरा कौन-सा भेद तुम नही जानती? एक विषय मे तो पार्वती से भी बढ़ी हुई हो।’

चन्द्रमुखी ने एक बार आंख पोछकर कहा-‘सब समझ गयी। परन्तु फिर भी खूब सावधानी से रहना।

तुम्हारा शरीर निर्बल है, देखो किसी प्रकार की त्रुटि न होने पावे।’ प्रत्युत्तर मे देवदास ने केवल हंस दिया।

चन्द्रमुखी ने कहा-‘और एक भिक्षा है, तनिक भी तबीयत खराब होने पर मुझे खबर अवश्य देना।

देवदास ने उसके मुख की ओर देखकर सिर नीचा करके कहा-‘दूंगा-अवश्य दूंगा बहू।’ फिर एक बार प्रणाम करके चन्द्रमुखी रोती हुई दूसरे कमरे मे चली गयी।

कलकत्ता से आकर देवदास कुछ दिन इलाहाबाद रहे। उसी बीच उन्होने चन्द्रमुखी को एक चिट्ठी लिखी-‘बहू, मैने विचार किया है कि अब किसी से प्रेम न करूंगा। एक तो प्रेेम करके खाली हाथ लौटने से बड़ी यातना मिलती है, दूसरे इस संसार मे प्रेम का पथ ही दुख और दैन्य से पूर्ण है।’

इसके उत्तर मे चन्द्रमुखी ने क्या लिखा, इसके लिखने की यहां आवश्यकता नही है, पर इस समय देवदास मन-ही-मन केवल यही सोचते रहते थे कि एक बार उसका यहां आना ठीक होगा या नही?

दूसरे ही क्षण सोचते-‘नही-नही, कोई काम नही है। यदि किसी दिन पार्वती सुन लेगी, तो क्या कहेगी? इस भांति कभी पार्वती और कभी चन्द्रमुखी उनके हृदय-आवास मे वास करती थी। और कभी दोनो के ही सुख एक साथ उनके हृदय-पट पर अंकित होते थे...

हृदय ऐसा शून्य हो जाता था कि केवल एक निजीव अतृप्ति उनके हृदय मे मिथ्या प्रतिध्वनि की भांति गूंज उठती थी। इसके बाद देवदास लाहौर चले गये। वहां चुन्नीलाल नौकरी करते थे, खबर पाकर भेट करने के लिए आये। बहुत दिनो के बाद आज दोनो मित्र एक-दूसरे को देखकर लज्जित और साथ ही सुखी हुए। फिर देवदास ने शराब पीना शुरू किया। चन्द्रमुखी की छाया उनके मन मे बनी हुई थी, उसने शराब का निषेध किया था। सोचते, वह कितनी बड़ी बुद्धिमती है! कैसी धीरा और शान्त है, कितना उसका स्नेह है! पार्वती इस समय स्वह्रश्वनवत्‌ विस्मृत हो रही थी-केवल बुझते हुए दीप के समान जब-तब उसकी स्मृति भभक उठती थी। परन्तु यहां की जलवायु उनके अनुकूल नही पड़ी। बीच-बीच मे बीमार पड़ने लगे, छाती मे फिर कड़क जान पड़ती थी। धर्मदास ने एक दिन रोते-रोते कहा-‘देवता, तुम्हारा शरीर फिर गिर चला, इसलिए और कही चलो!’

देवदास ने अनमने भाव से जवाब दिया-‘अच्छा, चला जायेगा।’

देवदास प्रायः घर पर शराब नही पीते। किसी दिन चुन्नीलाल के आने पर पीते है और किसी दिन बाहर चले जाते है। रात के तीसरे-चौथे पहर घर लौटते थे और किसी-किसी दिन नही भी आते थे।

आज दो दिन से उनका पता नही है। मारे शोक के धर्मदास ने अब तक अन्न-जल भी नही ग्रहण किया।

तीसरे दिन वे ज्वर लेकर घर लौटे। चारपाई पकड़ ली। तीन डॉक्टरो ने आकर चिकित्सा आरम्भ की।

धर्मदास ने पूछा-‘देवता काशी मे मां को यह खबर भेज दूं?’ देवदास ने तत्काल बाधा देकर कहा-‘छिः-छिः! मां को क्या यह मुंह दिखाने लायक है?’

धर्मदास ने इसके प्रतिवाद मे कहा-‘रोग-शोक तो सभी को होते है, पर क्या इसी से इतने बड़े दुख को मां से छिपाया जा सकता है? तुम्हे कोई लज्जा नही है देवता, काशी चलो।’

देवदास ने मुंह फिराकर कहा-‘नही धर्मदास, इस समय उनके पास नही जा सकूंगा। अच्छा होने के बाद देखा जायेगा।’

धर्मदास ने मन मे सोचा कि चन्द्रमुखी की चर्चा करे, किन्तु वह स्वयं ही उससे इतना घृणा करता था कि यह विचार उठने पर भी वह चुप ही रहा।

देवदास की चन्द्रमुखी को बुलाने की स्वयं भी इच्छा होती थी, पर कह कुछ नहीं सकते थे। अस्तु, कोई आया नही। कुछ दिन के बाद धीरे-धीरे आरोग्य होने लगे। एक दिन उन्होने धर्मदास से कहा‘अगर तुम्हारी इच्छा हो तो चलो इस बार और कही चला जाये’

इस समय और कही चलने की जरूरत नही है, अगर हो सके तो घर चलो, नही तो मां के पास चलो।’

माल-असबाब बांधकर, चुन्नीलाल से विदा लेकर, देवदास फिर इलाहाबाद चले आये। शरीर इस समय भली-भांति अच्छा हो गया था। कुछ दिन रहने के बाद उन्होने एक दिन धर्मदास से कहा-‘धर्म, किसी नयी जगह नही चलोगे? अभी तक बम्बई नही देखी, वहां चलोगे?’

उनका अतिशय आग्रह देखकर इच्छा न रहते हुए भी धर्मदास बम्बई चलने को तैयार है....

यहां आकर देवदास को बहुत कुछ आराम मिला।

एक दिन धर्मदास ने कहा-‘यहां रहते बहुत दिन हो गये, अब घर चलना अच्छा होगा।’

देवदास ने कहा-‘नही, यहां अच्छी तरह हूं। अभी कुछ दिन यहां और रहूंगा।’

एक वर्ष बीत गया। भादो का महीना था। एक दिन प्रातःकाल देवदास धर्मदास के कन्धे के सहारे से बम्बई-अस्पताल से बाहर आकर गाड़ी मे बैठे। धर्मदास ने कहा-‘देवता, मेरी सलाह से इस समय मां के पास चलना अच्छा होगा।’

देवदास की दोनो आंखे डबडबा आयी। आज कई दिन से वे भी मां को स्मरण कर रहे थे। अस्पताल मे पड़े-पड़े वे जब-तब यही सोचते थे कि इस संसार मे उनके सभी है और कोई भी नही है। उनके मां है, बड़ा भाई है, बहिन से बढ़कर पार्वती है, चन्द्रमुखी भी है। उनके सभी है, पर वे किसी के नही है। धर्मदास रोने लगा, कहा-‘भाई, इससे अच्छा है कि मां के पास चलो।’

देवदास ने मुंह फेरकर आंसू पोछकर कहा-‘नही धर्मदास, मां को मुंह दिखाने लायक नही हूं। जान पड़ता है, अभी मेरा समय नही आया।’

वृद्ध धर्मदास फूट-फूट कर रोने लगा, कहा-‘भैया, अभी तो मां जीती ही है।’

इस बात मे कितना भाव भरा हुआ था-इसका उन्ही दोनो की अन्तरात्मा अनुभव कर सकी। देवदास की अवस्था इस समय बड़ी शोचनीय थी। सारे पेट की ह्रश्वलीहा और फेफडे़ ने छेक लिया था, उस पर ज्वर और खांसी का प्रबल प्रकोप था। शरीर का रंग एकदम काला पड़ गया था, केवल ठठरी मात्र बच रही थी। आंखे भीतर की ओर घुस गयी थी, उनमे एक प्रकार की अस्वाभाविक उज्ज्वलता चमका करती थी। सिर के बाल बड़े रूखे-रूखे हो रहे थे, सम्भवतः चेष्टा करने से गिने भी जा सकते थे। हाथ की उंगलियो को देखने से घृणा उत्पन्न होती थी-एक तो वे नितान्त दुबली-पतली, दूसरे कुत्सित रोगो के दाग से खराब हो गयी थी। स्टेशन पर आकर धर्मदास ने पूछा-‘कहां का टिकट कटाया जायेगा देवता?’

देवदास ने कुछ सोचकर कहा-‘चलो पहले घर चले, फिर देखा जायेगा।’

गाड़ी ह्रश्वलेटफार्म पर आयी। वे लोग हुगली का टिकट खरीदकर बढ़ गये। धर्मदास देवदास के पास हो रहा। संध्या के कुछ पहले ही देवदास की आंखो से चिनगारियां निकलने लगी। धीरे-धीरे धुआंधार बुखार चढ़ आया। उन्होने धर्मदास को बुलाकर कहा-‘धर्मदास आज ऐसा मालूम पड़ता है कि घर भी पहुंचना कठिन होगा।’

धर्मदास ने डरकर कहा-‘क्यो भैया?’

देवदास ने हंसने की चेष्टा करके कहा-‘फिर बुखार चढ़ आया धर्मदास!’

काशी को गाड़ी पार कर गयी तब तक देवदास अचेत थे। पटना के पास आकर जब उन्हे होश हुआ, तो कहा-‘तब तो धर्मदास, मां के पास सचमुच नही जा सके।’

धर्मदास ने कहा-चलो, भैया, पटना मे उतरकर हम डॉक्टर को दिखा ले।’

उत्तर मे देवदास ने कहा-‘रहने दो, अब हम लोग घर पर ही चलकर उतरेगे।’

गाड़ी जब पंडुआ स्टेशन पर आकर खड़ी हुई, तब पौ फट चुकी थी। रात-भर खूब वर्षा हुई थी,

अभी थोड़ी देर से थमी हुई है। देवदास उठ खड़े हुए। नीचे धर्मदास सोया हुआ था। धीरे से उसके सिर पर हाथ रखा, किन्तु लज्जावश जगा नही सके। फिर द्वार खोलकर धीरे से नीचे ह्रश्वलेटफार्म पर उतर गये।

गाड़ी सोये हुए धर्मदास का लेकर चली गयी। कांपते-कांपते देवदास स्टेशन के बाहर आये। एक गाड़ीवान को बुलाकर पूछा-‘क्या हाथीपोता चल सकता है?’

उसने एक बार मुंह की ओर, फिर एक बार इधर-उधर देखकर कहा-‘नही बाबू, रास्ता अच्छा नही है।

घोड़े की गाड़ी ऐसे कीचड़ पानी मे उधर नही जा सकेगी।’

देवदास ने उद्विग्न होकर पूछा-‘क्या पालकी मिल सकती है?’

गाड़ीवान ने कहा-‘नही।’

देवदास इसी आशंका मे धप्‌ से बैठ गये कि क्या तब जाना नही होगा? उनके मुख से उनकी अन्तिम अवस्था के चिन्ह सुस्पष्ट प्रकट हो रहे थे। एक अन्धा भी उसे भलीभांति देख सकता था।

गाड़ीवान ने दयार्द्र होकर पूछा-‘बाबूजी, एक बैलगाड़ी ठीक कर दे?’

देवदास ने पूछा-‘कब पहुंचूंगा?’

गाड़ीवान ने कहा-‘रास्ता अच्छा नही है, इससे शायद दो दिन लग जायेगे।’

देवदास ने मन-ही-मन हिसाब लगाने लगे कि दो दिन जीते रहेगे या नही। पर पार्वती के पास जाना जरूरी है। इस समय उनके मन मे पिछले दिनो के बहुत-से झूठे आचार-व्यवहार और बहुत-सी झूठी बाते एक-एक करके स्मरण आने लगी। किन्तु अन्तिम दिन की इस प्रतिज्ञा को सच करना ही होगा।

चाहे जिस तरह से हो, एक बार उसे दर्शन देना ही होगा। पर अब इस जीवन की अधिक मियाद बाकी नही है, इसी की विशेष चिन्ता है।

देवदास जब बैलगाड़ी मे बैठ गये, तो उन्हे माता का ध्यान आया। वे व्याकुल होकर रो पड़े। जीवन के इस अन्तिम समय मे एक और स्नेहमयी पवित्र प्रतिमा की छाया दिखायी पड़ी-यह छाया चन्द्रमुखी की थी। जिसे पापिष्ठा कहकर सर्वदा घृणा की, आज उसी को जननी की बगल मे गौरवमय आसन पर आसीन देख उनकी आंखो से झर-झर जल झरने लगा। अब इस जीवन मे उससे फिर कभी भेट नही होगी और तो क्या वह बहुत दिन तक उनके विषय मे कोई खबर तक न पायेगी! तब भी पार्वती के पास चलना होगा। देवदास ने प्रतिज्ञा की थी कि एक बार वे और भेट करेगे। आज उस प्रतिज्ञा को पूर्ण करना होगा। रास्ता अच्छा नही है। वर्षा के कारण कही-कही जल जमा हो गया है और कही अगलब गल की पगडंडी कटकर गिर पड़ी है। सारा रास्ता कीचड़ से भरा हुआ है। बैलगाड़ी हचक-हचक कर चलती है। कही उतर कर चक्का ठेलना पड़ता है, कही बैलो को बेरहमी के साथ मारना पड़ता है-चाहे जिस तरह से हो, यह सोलह कोस का रास्ता तय करना ही होगा। हर-हर करके ठंडी हवा बह रही थी।

आज भी उन्हे संध्या के बाद विषम ज्वर चढ़ आया। उन्होने डरकर पूछा-‘गाड़ीवान, और कितना चलना होगा?’

गाड़ीवान ने जवाब दिया-‘बाबू, अभी आठ-दस कोस और चलना है।’

‘जल्दी से चलो, तुम्हे अच्छा इनाम मिलेगा।’-जेब मे सौ रुपये का नोट था, उसी को दिखलाकर कहा-‘जल्दी चलो, सौ रुपये इनाम दूंगा।’

इसके बाद कब और किस भांति सारी रात बीत गयी-देवदास को इसकी खबर नही। बराबर अचेत रहे। सुबह जब ज्ञान हुआ तो कहा-‘अरे अभी कितनी दूर है? क्या इस रास्ते का अन्त नही होगा?’

गाड़ीवान ने कहा-‘अभी छः कोस है।’ देवदास ने एक गहरी सांस लेकर कहा-‘जरा जल्दी चलो, अब समय नही है।’

गाड़ीवान इसे समझ न सका, किन्तु नये उत्साह से बैलो को ठोक-ठाककर और गाली-गलौज देकर हांकने लगा। प्राणपण से गाड़ी चल रही थी, भीतर देवदास छटपटा रहे थे। एकमात्र यही विचार चक्कर लगा रहा था कि भेट होगी या नही? पहुंच सकेगे या नही? दोपहर के समय गाड़ीवान ने बैलो को भूसी खाने को दी, स्वयं भी दाना पानी किया। फिर पूछा-‘बाबू, आप कुछ अन्न-जल नही करेगे?’

‘नही, बड़ी ह्रश्वयास लगी है, थोड़ा पानी दे सकते हो?’

उसने पास की पोखरी से पानी ला दिया। आज सन्ध्या के बाद बुखार के साथ देवदास की नाक की राह बूंद-बूंद खून गिरने लगा। उन्होने भर-जोर नाक को दबाया। फिर मालूम हुआ कि दांत के पास से खून बाहर आ रहा है। सांस लेने मे भी कष्ट होने लगा। हांफते-हांफते कहा-‘और कितनी दूर...?’

गाड़ीवान ने कहा-‘दो कोस और है। रात को दस बजे पहुंचेगे।’

देवदास ने बड़े कष्ट के साथ रास्ते की ओर देखकर कहा-भगवन!’

गाड़ीवान ने पूछा-‘बाबू, कैसी तबीयत है?

देवदास इस बात का जवाब नही दे सके। गाड़ी चलने लगी, पर दस बजे नही पहुंची। लगभग बारह बजे रात को गाड़ी हाथीपोता के जमीदार के मकान के सामने पीपल के पेड़ के नीचे आकर खड़ी हुई।

गाड़ीवान ने बुलाकर कहा-‘बाबू, नीचे उतरिये।’

कोई उत्तर नही मिला। तब उसने डरकर मुंह के पास दीया लाकर देखा, कहा-‘बाबू, क्या सो गये है?’

देवदास देख रहे थे, होठ हिलाकर कुछ कहा, किन्तु कोई शब्द नही हुआ। गाड़ीवान ने फिर बुलाया‘बाबू!’

देवदास ने हाथ उठाना चाहा, किन्तु उठा नही सके। केवल दो बूंद आंसू उनकी आंखो के कोण से बाहर ढुलक पड़े। गाड़ीवान ने तब अपनी बुद्धि के अनुसार बांसो को बांधकर एक पलंग बनाया, उसी पर बिस्तर बिछाकर बड़े कष्ट से देवदास को लाकर सुला दिया। बाहर एक मनुष्य भी दिखायी नही पड़ता था। जमीदार के घर मे सब लोग सो रहे थे। देवदास ने अपनी जेब से बड़े कष्ट से सौ रुपये का एक नोट बाहर निकाला। लालटेन की रोशनी मे गाड़ीवान ने देखा कि बाबू उसी की ओर देख रहे है, परन्तु कुछ कह नही सकते है। उसने अवस्था देखकर नोट लेकर चादर मे बांध लिया। शाल से देवदास का सारा शरीर ढंका था, सामने लालटेन जल रही थी और पास मे नया साथी गाड़ीवान था।

पौ फटी। सुबह के समय जमीदार के घर से लोग बाहर निकले। एक आश्चर्यमय दृश्य! पेड़ के नीचे एक आदमी मर रहा था। देखने से सद्‌कुल का जान पड़ता था। शरीर पर शाल, पांव मे चमकता हुआ जूता, हाथ मे अंगूठी पडी़ हुई थी। एक-एक करके बहुत-से लोग जमा हो गये। क्रम से भुवन बाबू के कान तक यह बात पहुंची, वे डॉक्टर को साथ लेकर स्वयं आये। देवदास ने सबकी ओर देखा; किन्तु उनका कंठ रूद्ध हो गया था-एक बात भी नही कह सके केवल आंखो से जल बहता रहा। गाड़ीवान जो कुछ जानता था, कह सुनाया, परन्तु उससे कुछ विशेष बाते नही मालूम हुई। डॉक्टर ने कहा-‘ऊर्ध्व श्वास चल रहा है, अब शीघ्र ही मृत्यु होगी।’

सबने कहा-‘आह!’

घर मे ऊपर बैठी हुई पार्वती ने यह दयनीय कहानी सुनकर कहा-‘आह!’

किसी एक आदमी ने तरस खाकर दो बूंद जल और तुलसी की पत्ती मुंह मे छोड़ दी। देवदास ने एक बार उसकी ओर करूण-दृष्टि से देखा, फिर आंखे मूंद ली। कुछ क्षण सांस चलती रही, फिर सर्वदा के लिए सब शान्त हो गया। अब कौन दाह-कर्म करेगा, कौन छुएगा, कौन जाति है आदि विविध प्रश्नो को लेकर तर्क-वितर्क होने लगा। भुवन बाबू के पास के पुलिस स्टेशन मे इसकी खबर दी।

इंसपेक्टर आकर जांच-पड़ताल करने लगे। ह्रश्वलीहा और फेफड़े के बढ़ने के कारण मृत्यु हुई है, नाक और मुख मे खून के दाग लगे है। जेब से दो पत्र निकले। एक तालसोनापुर के द्विजदास मुखोपाध्याय ने बम्बई के देवदास को लिखा था कि रुपये का इस समय प्रबन्ध नही हो सकता। और एक काशी से हरिमती देवी ने उक्त देवदास को लिखा था कि कैसे हो?

बाएं हाथ मे अंग्रेजी मे नाम का पहला अक्षर गुदा हुआ था। इन्सपेक्टर ने निश्चित करके कहा-‘यह मनुष्य देवदास है।’

हाथ मे नीलम की अंगूठी थी-दाम अन्दाजन डेढ़ सौ था। शरीर पर एक जोड़ा शाल था-दाम अन्दाजन दो सौ था। कोट, कमीज, धोती आदि सब लिखे गये। चौधरी और महेन्द्रनाथ दोनो ही वहां पर उपस्थित थे। तालसोनापुर का नाम सुनकर महेन्द्र ने कहा-‘छोटी मां के मायके के तो नही...!’

चौधरी जी ने तुरन्त बात काटकर कहा-‘वह क्या यहां पर शिनाख्त करने आवेगी?’

दारोगा साहब ने हंसकर कहा-‘कुछ पागल तो नही हो।’

ब्राह्मण का मृत-देह होने पर भी गांव के किसी ने स्पर्श करना स्वीकार नही किया, अतएव चांडाल आकर बांध ल गये। फिर किसी सूखे हुए पोखरे के किनारे आधे झुलसे हुए शरीर को फेक दिया, कौवे और गिद्ध उस पर आकर बैठ गये, सियार और कुत्ते परस्पर कलह मे प्रवृत हुए। तब भी जिस किसी ने सुना, कहा-‘आह!’ दास-दासी भी जहां-तहां भी उसकी चर्चा करने लगे-‘कोई बड़े आदमी थे! दो सौ रुपये का शाल, डेढ़ सौ रुपये की अंगूठी, सब दारोगा के पास जमा है; दो चिट्ठी थी वे भी उन्ही लोगो ने रख ली है।’

यह सब समाचार पार्वती के कान तक भी पहुंचे; किन्तु वह आजकल बड़ी अनमनी रहती है, किसी विषय पर विशेष ध्यान नही देती। अस्तु, इस व्यापार के विषय मे भी कुछ ठीक नही समझ सकी। पर जब सभी के मुख पर इस चर्चा को पाया तो पार्वती ने भी इसके विषय मे कुछ विशेष जानने की इच्छा से एक दासी से पूछा-‘क्या हुआ है? कौन मरा है?’

दासी ने कहा-‘आह, यह कोई नही जानता मां! पिछले जन्म का कोई यहां की मिट्टी का धरता था, वही यहां केवल मरने आया था। कल सारी रात यहीं पर पड़ा रहा। आज सुबह मर गया।’

पार्वती ने एक लम्बी सांस लेकर कहा-‘क्या उसके बारे मे कोई कुछ नही जानता?’

दासी ने कहा-‘महेन्द्र बाबू जानते होगे, मै कुछ नही जानती।’

महेन्द्र की बुलाहट हुई। उन्होने कहा-‘तुम्हारे देश के देवदास मुखोपाध्याय थे।’

पार्वती महेन्द्र के अत्यन्त निकट सरक आयी, एक तीव्र दृष्टि से देखकर पूछा-‘क्या देव दादा? कैसे जाना?’

‘जेब मे दो चिट्ठियां थी। एक द्विजदास की...’

पार्वती ने बाधा देकर कहा-‘हां, उनके बड़े भाई की।’

‘और एक काशी से हरिमती देवी ने लिखा था...’

‘हां, वे मां है।’

‘हाथ पर नाम गुदा था...’

पार्वती ने कहा-‘हां, जब पहले-पहल कलकत्ता गये थे तो लिखाया था।’

‘एक नीलम की अंगूठी थी...’

‘पिता के समय मे उसे बड़े चाचा ने दिया...मै जाऊंगी...’

कहते-कहते पार्वती दौड़ पड़ी। महेन्द्र ने हत्बुद्धि होकर कहा-‘ओ मां, कहां जाओगी?’

‘देवदास के पास।’

‘वे अब नही है, डोम ले गये।’

‘अरे, बाप रे बाप!’-कहकर रोती-रोती पार्वती दौड़ी।

महेन्द्र ने दौड़कर सामने आकर बाधा दी। कहा-‘क्या पागल हुई हो, मां! कहां जाओगी?’

पार्वती ने महेन्द्र की ओर एक तीव्र दृष्टि से देखकर कहा-‘महेन्द्र, क्या मुझे सचमुच पागल समझ रखा है? रास्ता छोड़ो।’

उसकी ओर देखकर महेन्द्र ने रास्ता छोड़ दिया, चुपचाप पीछे-पीछे चलने लगा। बाहर तब भी नायब-गुमाश्ता आदि काम कर रहे थे। वे लोग देखने लगे। चौधरी जी ने चश्मा लगाकर पूछा-‘कौन जा रहा है?’

महेन्द्र ने कहा-‘छोटी मां।’

‘यह क्यो? कहां जाती है?’

महेन्द्र ने कहा-‘देवदास को देखने।’

भुवन चौधरी ने चिल्लाकर कहा-‘तुम सभी की बुद्धि मारी गयी है! पकड़ो-पकड़ो, पकड़कर उसे ले आओ। सब पागल हो गये! ओ महेन्द्र, जल्दी करो, दौड़ो!’

इसके बाद नौकर-नौकरानियो ने मिलकर पार्वती को पकड़ा और उसकी मूर्च्छित देह को भीतर ले गये। दूसरे दिन उसकी मूर्च्छा टूटी, पर उसने कोई बात नही कही, केवल एक दासी को बुलाकर पूछा‘रात को वे आते थे या नही? सारी रात...!’

इसके बाद पार्वती चुप हो रही।

अब इतने दिनो बाद पार्वती का क्या हुआ, वह कैसी है, यह हम नही जानते; जानने की इच्छा भी नही होती। केवल देवदास के लिए हृदय बहुत क्षुब्ध रहता है। आप लोगो मे से भी जो कहानी को पढ़ेगे, सम्भवतः मेरे ही समान क्षुब्ध होगे। फिर भी यदि देवदास के समान हत्‌भाग्य, असंयमी और पापिष्ठ के साथ किसी का परिचय हो तो वह उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करे, प्रार्थना करे कि और चाहे जो हो, पर उनकी जैसी मृत्यु किसी की न हो! मृत्यु होने मे कोई हानि नही है, किन्तु उस समय एक स्नेहमयी हाथ का स्पर्श सिर पर अवश्य रहे, एक करूणार्द्र मुख को देखते-देखते इस जीवन का अन्त हो। जिससे मरने के समय किसी की आंखो का दो बूंद जल देखकर वह शान्ति से मर सके।

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