मानसून क्या है , यह कैसे बंनता है?. मानसून कितने प्रकार के है

20241

भारत में इसका स्वरुप कैसा है ...?  भारत में मानसून का आगमन, भारतीय मानसून की विशेषताए

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मानसून 

मानसून मूलतः हिन्द महासागर एवं अरब सागर की ओर से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर आनी वाली हवाओं को कहते हैं जो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि में भारी वर्षा करातीं हैं। ये ऐसी मौसमी पवन होती हैं, जो दक्षिणी एशिया क्षेत्र में जून से सितंबर तक, प्रायः चार माह सक्रिय रहती है। इस शब्द का प्रथम प्रयोग ब्रिटिश भारत में (वर्तमान भारत, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश) एवं पड़ोसी देशों के संदर्भ में किया गया था। ये बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से चलने वाली बड़ी मौसमी हवाओं के लिये प्रयोग हुआ था, जो दक्षिण-पश्चिम से चलकर इस क्षेत्र में भारी वर्षाएं लाती थीं। हाइड्रोलोजी में मानसून का व्यापक अर्थ है- कोई भी ऐसी पवन जो किसी क्षेत्र में किसी ऋतु-विशेष में ही अधिकांश वर्षा कराती है। यहां ये उल्लेखनीय है, कि मॉनसून हवाओं का अर्थ अधिकांश समय वर्षा कराने से नहीं लिया जाना चाहिये। इस परिभाषा की दृष्टि से संसार के अन्य क्षेत्र, जैसे- उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, उप-सहारा अफ़्रीका, आस्ट्रेलिया एवं पूर्वी एशिया को भी मानसून क्षेत्र की श्रेणी में रखा जा सकता है। ये शब्द हिन्दी व उर्दु के मौसम शब्द का अपभ्रंश है। मॉनसून पूरी तरह से हवाओं के बहाव पर निर्भर करता है। आम हवाएं जब अपनी दिशा बदल लेती हैं तब मॉनसून आता है।.जब ये ठंडे से गर्म क्षेत्रों की तरफ बहती हैं तो उनमें नमी की मात्र बढ़ जाती है जिसके कारण वर्षा होती है।

नामकरण एवं परिभाषा

अंग्रेज़ी शब्द मॉनसून पुर्तगाली शब्द monção (मॉन्सैओ) से निकला है, जिसका मूल उद्गम अरबी शब्द मॉवसिम (موسم "मौसम") से आया है। यह शब्द हिन्दी एवं उर्दु एवं विभिन्न उत्तर भारतीय भाषाओं में भी प्रयोग किया जाता है, जिसकी एक कड़ी आरंभिक आधुनिक डच शब्द मॉनसन से भी मिलती है।.इस परिभाषा के अनुसार विश्व की प्रधान वायु प्रणालियां सम्मिलित की जाती हैं, जिनकी दिशाएं ऋतुनिष्ठ बदलती रहती हैं।

अधिकांश ग्रीष्मकालीन मॉनसूनों में प्रबल पश्चिमी घटक होते हैं और साथ ही विपुल मात्रा में प्रबल वर्षा की प्रवृत्ति भी होती है। इसका कारण ऊपर उठने वाली वायु में जल-वाष्प की प्रचुर मात्रा होती है। हालांकि इनकी तीव्रता और अवधि प्रत्येक वर्ष में समान नहीं होती है। इसके विपरीत शीतकालीन मॉनसूनों में प्रबल पूर्वी घटक होते हैं, साथ ही फैलने और उतर जाने तथा सूखा करने की प्रवृत्ति होती है।

विश्व के मॉनसून

विश्व की प्रमुख मॉनसून प्रणालियों में पश्चिमी अफ़्रीका एवं एशिया-ऑस्ट्रेलियाई मॉनसून आते हैं। इस श्रेणी में उत्तरी अमरीका और दक्षिण अमरीकाई मॉनसूनों को सम्मिलित करने में कुछ मतभेद अभी भी जारी हैं।

दक्षिण एशियाई

भारतीय मॉनसून

 

भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की आरंभ की तिथियां एवं चलने वाली हवाएं
भारत में मॉनसून हिन्द महासागर व अरब सागर की ओर से हिमालय की ओर आने वाली हवाओं पर निर्भर करता है। जब ये हवाएं भारत के दक्षिण पश्चिम तट पर पश्चिमी घाट से टकराती हैं तो भारत तथा आसपास के देशों में भारी वर्षा होती है। ये हवाएं दक्षिण एशिया में जून से सितंबर तक सक्रिय रहती हैं। वैसे किसी भी क्षेत्र का मॉनसून उसकी जलवायु पर निर्भर करता है। भारत के संबंध में यहां की जलवायु ऊष्णकटिबंधीय है और ये मुख्यतः दो प्रकार की हवाओं से प्रभावित होती है - उत्तर-पूर्वी मॉनसून व दक्षिणी-पश्चिमी मॉनसून। उत्तर-पूर्वी मॉनसून को प्रायः शीत मॉनसून कहा जाता है। यह हवाएं मैदान से सागर की ओर चलती हैं, जो हिन्द महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी को पार करके आती हैं। यहां अधिकांश वर्षा दक्षिण पश्चिम मानसून से होती है। भारत में पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर से कर्क रेखा निकलती है। इसका देश की जलवायु पर सीधा प्रभाव पड़ता है। ग्रीष्म, शीत और वर्षा ऋतुओं में से वर्षा ऋतु को प्रायः मॉनसून भी कह दिया जाता है।

सामान्यत: मॉनसून की अवधि में तापमान में तो कमी आती है, लेकिन आर्द्रता (नमी) में अच्छी वृद्धि होती है। आद्रता की जलवायु विज्ञान में महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। यह वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प की मात्र से बनती है और यह पृथ्वी से वाष्पीकरण के विभिन्न रूपों द्वारा वायुमंडल में पहुंचती है।

पूर्व एशियाई

पूर्व एशियाई मॉनसून इंडो-चीन, फिलिपींस, चीन, कोरिया एवं जापान के बड़े क्षेत्रों में प्रभाव डालता है। इसकी मुख्य प्रकृति गर्म, बरसाती ग्रीष्मकाल एवं शीत-शुष्क शीतकाल होते हैं। इसमें अधिकतर वर्षा एक पूर्व-पश्चिम में फैले निश्चित क्षेत्र में सीमित रहती है, सिवाय पूर्वी चीन के जहां वर्षा पूर्व-पूर्वोत्तर में कोरिया व जापान में होती है। मौसमी वर्षा को चीन में मेइयु, कोरिया में चांग्मा और जापान में बाई-यु कहते हैं। ग्रीष्मकालीन वर्षा का आगमन दक्षिण चीन एवं ताईवान में मई माह के आरंभ में एक मॉनसून-पूर्व वर्षा से होता है। इसके बाद मई से अगस्त पर्यन्त ग्रीष्मकालीन मॉनसून अनेक शुष्क एवं आर्द्र शृंखलाओं से उत्तरवर्ती होता जाता है। ये इंडोचाइना एवं दक्षिण चीनी सागर (मई में) से आरंभ होक्र यांग्तज़े नदी एवं जापान में (जून तक) और अन्ततः उत्तरी चीन एवं कोरिया में जुलाई तक पहुंचता है। अगस्त में मॉनसून काल का अन्त होते हुए ये दक्षिण चीन की ओर लौटता है।

अफ़्रीका

पश्चिमी उप-सहारा अफ़्रीका का मॉनसून को पहले अन्तर्कटिबन्धीय संसृप्ति ज़ोन के मौसमी बदलावों और सहारा तथा विषुवतीय अंध महासागर के बीच तापमान एवं आर्द्रता के अंतरों के परिणामस्वरूप समझा जाता था।[8] ये विषुवतीय अंध महासागर से फरवरी में उत्तरावर्ती होता है और फिर लगभग २२ जून तक पश्चिमी अफ़्रीका पहुंचता है और अक्टूबर तक दक्षिणावर्ती होते हुए पीछे हटता है। शुष्क उत्तर-पश्चिमी व्यापारिक पवन और उनके चरम स्वरूप हारमट्टन, ITCZ में उत्तरी बदलाव से प्रभावित होते हैं और परिणामित दक्षिणावर्ती पवन ग्रीष्मकाल में वर्षाएं लेकर आती हैं। सहेल और सूडान के अर्ध-शुष्क क्षेत्र अपने मरुस्थलीय क्षेत्र में होने वाली अधिकांश वर्षा के लिये इस शैली पर ही निर्भर रहते हैं।

उत्तरी अमरीका

उत्तर अमरीकी मॉनसून (जिसे लघुरूप में NAM भी कहते हैं) जून के अंत या जुलाई के आरंभ से सितंबर तक आता है। इसका उद्गम मेक्सिको से होता है और संयुक्त राज्य में मध्य जुलाई तक वर्षा उपलब्ध कराता है। इसके प्रभाव से मेक्सिको में सियेरा मैड्र ऑक्सीडेन्टल के साथ-साथ और एरिज़ोना, न्यू मेक्सिको, नेवाडा, यूटाह, कोलोरैडो, पश्चिमी टेक्सास तथा कैलीफोर्निया में वर्षा और आर्द्रता होती है। ये पश्चिम में प्रायद्वीपीय क्षेत्रों तथा दक्षिणी कैलीफोर्निया के ट्रान्स्वर्स शृंखलाओं तक फैलते हैं, किन्तु तटवर्ती रेखा तक कदाचित ही पहुंचते हैं। उत्तरी अमरीकी मॉनसून को समर, साउथवेस्ट, मेक्सिकन या एरिज़ोना मॉनसून के नाम से भी जाना जाता है।इसे कई बार डेज़र्ट मॉनसून भी कह दिया जाता है, क्योंकि इसके प्रभावित क्षेत्रों में अधिकांश भाग मोजेव और सोनोरैन मरुस्थलों के हैं।

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भारतीय मानसून की विशेषताएं

भारत की जलवायु के बारे में कहा गया है कि भारत में केवल तीन ही मौसम होते हैं, मानसून पूर्व के महीने, मानसून के महीने और मानसून के बाद के महीने। यद्यपि यह भारतीय जलवायु पर एक हास्योक्ति है, फिर भी भारत की जलवायु के मानसून पर पूर्णतः निर्भर होने को यह अच्छी तरह व्यक्त करता है।

मानसून अरबी भाषा का शब्द है। अरब सागर में बहने वाली मौसमी हवाओं के लिए अरब मल्लाह इस शब्द का प्रयोग करते थे। उन्होंने देखा कि ये हवाएं जून से सितंबर के गरमी के दिनों में दक्षिण-पश्चिम दिशा से और नवंबर से मार्च के सर्दी के दिनों में उत्तर-पूर्वी दिशा से बहती हैं। 

एशिया और यूरोप का विशाल भूभाग, जिसका एक हिस्सा भारत भी है, ग्रीष्मकाल में गरम होने लगता है। इसके कारण उसके ऊपर की हवा गरम होकर उठने और बाहर की ओर बहने लगती है। पीछे रह जाता है कम वायुदाब वाला एक विशाल प्रदेश। यह प्रदेश अधिक वायुदाब वाले प्रदेशों से वायु को आकर्षित करता है। अधिक वायुदाब वाला एक बहुत बड़ा प्रदेश भारत को घेरने वाले महासागरों के ऊपर मौजूद रहता है क्योंकि सागर स्थल भागों जितना गरम नहीं होता है और इसिलए उसके ऊपर वायु का घनत्व अधिक रहता है। उच्च वायुदाब वाले सागर से हवा मानसून पवनों के रूप में जमीन की ओर बह चलती है। सागरों से निरंतर वाष्पीकरण होते रहने के करण यह हवा नमी से लदी हुई होती है। यही नमी भरी हवा ग्रीष्मकाल का दक्षिण-पश्चिमी मानसून कहलाती है।

भारतीय प्रायद्वीप की नोक, यानी कन्याकुमारी पर पहुंचकर यह हवा दो धाराओं में बंट जाती है। एक धारा अरब सागर की ओर बह चलती है और एक बंगाल की खाड़ी की ओर। अरब सागर से आनेवाले मानसूनी पवन पश्चिमी घाट के ऊपर से बहकर दक्षिणी पठार की ओर बढ़ते हैं। बंगाल की खाड़ी से चलनेवाले पवन बंगाल से होकर भारतीय उपमहाद्वीप में घुसते हैं।

ये पवन अपने मार्ग में पड़ने वाले प्रदेशों में वर्षा गिराते हुए आगे बढ़ते हैं और अंत में हिमालय पर्वत पहुंचते हैं। इस गगनचुंभी, कुदरती दीवार पर विजय पाने की उनकी हर कोशिश नाकाम रहती है और विवश होकर उन्हें ऊपर उठना पड़ता है। इससे उनमें मौजूद नमी घनीभूत होकर पूरे उत्तर भारत में मूसलाधार वर्षा के रूप में गिर पड़ती है। जो हवा हिमालय को लांघ कर युरेशियाई भूभाग की ओर बढ़ती है, वह बिलकुल शुष्क होती है।

दक्षिण-पश्चिमी मानसून भारत के ठेठ दक्षिणी भाग में जून 1 को पहुंचता है। साधारणतः मानसून केरल के तटों पर जून महीने के प्रथम पांच दिनों में प्रकट होता है। यहां से वह उत्तर की ओर बढ़ता है और भारत के अधिकांश हिस्सों पर जून के अंत तक पूरी तरह छा जाता है। 

अरब सागर से आने वाले पवन उत्तर की ओर बढ़ते हुए 10 जून तक बंबई पहुंच जाते हैं। इस प्रकार तिरुवनंतपुरम से बंबई तक का सफर वे दस दिन में बड़ी तेजी से पूरा करते हैं। इस बीच बंगाल की खाड़ी के ऊपर से बहने वाले पवनों की प्रगति भी कुछ कम आश्चर्यजनक नहीं होती । ये पवन उत्तर की ओर बढ़कर बंगाल की खाड़ी के मध्य भाग से दाखिल होते हैं और बड़ी तेजी से जून के प्रथम सप्ताह तक असम में फैल जाते हैं। हिमालय रूपी विघ्न की दक्षिणी छोर को प्राप्त करके यह धारा पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। इस कारण उसकी आगे की प्रगति बर्मा की ओर न होकर गंगा के मैदानों की ओर होती है।

मानसून कलकत्ता शहर में बंबई से कुछ दिन पहले पहुंच जाता है, साधारणतः जून 7 को। मध्य जून तक अरब सागर से बहनेवाली हवाएं सौराष्ट्र, कच्छ व मध्य भारत के प्रदेशों में फैल जाती हैं।

इसके पश्चात बंगाल की खाड़ी वाले पवन और अरब सागर वाले पवन पुनः एक धारा में सम्मिलित हो जाते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, पूर्वी राजस्थान आदि बचे हुए प्रदेश जुलाई 1 तक बारिश की पहली बौछार अनुभव करते हैं।

उपमहाद्वीप के काफी भीतर स्थित दिल्ली जैसे किसी स्थान पर मानसून का आगमन कुतूहल पैदा करने वाला विषय होता है। कभी-कभी दिल्ली की पहली बौछार पूर्वी दिशा से आती है और बंगाल की खाड़ी के ऊपर से बहनेवाली धारा का अंग होती है। परंतु कई बार दिल्ली में यह पहली बौछार अरब सागर के ऊपर से बहनेवाली धारा का अंग बनकर दक्षिण दिशा से आती है। मौसमशास्त्रियों को यह निश्चय करना कठिन होता है कि दिल्ली की ओर इस दौड़ में मानसून की कौन सी धारा विजयी होगी।

मध्य जुलाई तक मानसून कश्मीर और देश के अन्य बचे हुए भागों में भी फैल जाता है, परंतु एक शिथिल धारा के रूप में ही क्योंकि तब तक उसकी सारी शक्ति और नमी चुक गई होती है।

सर्दी में जब स्थल भाग अधिक जल्दी ठंडे हो जाते हैं, प्रबल, शुष्क हवाएं उत्तर-पूर्वी मानसून बनकर बहती हैं। इनकी दिशा गरमी के दिनों की मानसूनी हवाओं की दिशा से विपरीत होती है। उत्तर-पूर्वी मानसून भारत के स्थल और जल भागों में जनवरी की शुरुआत तक, जब एशियाई भूभाग का तापमान न्यूनतम होता है, पूर्ण रूप से छा जाता है। इस समय उच्च दाब की एक पट्टी पश्चिम में भूमध्यसागर और मध्य एशिया से लेकर उत्तर-पूर्वी चीन तक के भू-भाग में फैली होती है। बादलहीन आकाश, बढ़िया मौसम, आर्द्रता की कमी और हल्की उत्तरी हवाएं इस अवधि में भारत के मौसम की विशेषताएं होती हैं। उत्तर-पूर्वी मानसून के कारण जो वर्षा होती है, वह परिमाण में तो न्यून, परंतु सर्दी की फसलों के लिए बहुत लाभकारी होती है।

उत्तर-पूर्वी मानसून तमिलनाडु में विस्तृत वर्षा गिराता है। सच तो यह है कि तमिलनाडु का मुख्य वर्षाकाल उत्तर-पूर्वी मानसून के समय ही होता है। यह इसलिए कि पश्चिमी घाट की पर्वत श्रेणियों की आड़ में आ जाने के कारण उत्तर-पश्चिमी मानसून से उसे अधिक वर्षा नहीं मिल पाती। नवंबर और दिसंबर के महीनों में तमिलनाडु अपनी संपूर्ण वर्षा का मुख्य अंश प्राप्त करता है।

भारत में गिरने वाली अधिकांश वर्षा मानसून काल में ही गिरती है। संपूर्ण भारत के लिए औसत वर्षा की मात्रा 117 सेंटीमीटर है। वर्षा की दृष्टि से भारत बड़ा विरोधपूर्ण प्रसंग प्रस्तुत करता है। चेरापुंजी में साल में 1100 सेंटीमीटर वर्षा गिरती है, तो जयसलमेर में केवल 20 सेंटीमीटर। मानसून काल भारत के किसी भी भाग के लिए निरंतर वर्षा का समय नहीं होता। कुछ दिनों तक वर्षा निर्बाध रूप से होती रहती है, जिसके बाद कई दिनों तक बादल चुप्पी साध लेते हैं। वर्षा का आरंभ भी समस्त भारत या उसके काफी बड़े क्षेत्र के लिए अक्सर विलंब से होता है। कई बार वर्षा समय से पहले ही समाप्त हो जाती है या देश के किसी हिस्से में अन्य हिस्सों से कहीं अधिक वर्षा हो जाती है। यह अक्सर होता है और बाढ़ और सूखे की विषम परिस्थिति से देश को जूझना पड़ता है।

भारत में वर्षा का वितरण पर्वत श्रेणियों की स्थिति पर काफी हद तक अवलंबित है। यदि भारत में मौजूद सभी पर्वत हटा दिए जाएं तो वर्षा की मात्रा बहुत घट जाएगी। मुंबई और पूणे में पड़ने वाली वर्षा इस तथ्य को बखूबी दर्शाती है। मानसूनी पवन दक्षिण-पश्चिमी दिशा से पश्चिमी घाट को आ लगते हैं जिसके कारण इस पर्वत के पवनाभिमुख भाग में भारी वर्षा होती है। मुंबई शहर, जो पश्चिमी घाट के इस ओर स्थित है, लगभग 187.5 सेंटीमीटर वर्षा पाता है, जबकि पूणे, जो पश्चिमी घाट के पवनविमुख भाग में केवल 160 किलोमीटर के फासले पर स्थित है, मात्र 50 सेंटीमीटर। 

पर्वत श्रेणियों के कारण होने वाली वर्षा का एक अन्य उदाहरण उत्तर-पूर्वी भारत में स्थित चेरापुंजी है। इस छोटे से कस्बे में वर्ष में 1100 सेंटीमीटर की वर्षा औसतन गिरती है जो एक समय विश्वभर में सर्वाधिक वर्षा हुआ करती थी। यहां प्रत्येक बारिश वाले दिन 100 सेंटीमीटर तक की वर्षा हो सकती है। यह विश्व के अनेक हिस्सों में वर्ष भर में होने वाली वर्षा से भी अधिक है। चेरापुंजी खासी पहाड़ियों के दक्षिणी ढलान में दक्षिण से उत्तर की ओर जानेवाली एक गहरी घाटी में स्थित है। इस पहाड़ी की औसत ऊंचाई 1500 मीटर है। दक्षिण दिशा से बहनेवाली मानसूनी हवाएं इस घाटी में आकर फंस जाती हैं और अपनी नमी को चेरापुंजी के ऊपर उंड़ेल देती हैं। एक कुतूहलपूर्ण बात यह है कि चेरापुंजी में अधिकांश बारिश सुबह के समय गिरती है।

चूंकि भारत के अधिकांश भागों में वर्षा केवल मानसून के तीन-चार महीनों में ही गिरती है, बड़े तालाबों, बांधों और नहरों से दूर स्थित गांवों में पीने के पानी का संकट उपस्थित हो जाता है। उन इलाकों में भी जहां वर्षाकाल में पर्याप्त बारिश गिरती है, मानसून पूर्व काल में लोगों को कष्ट सहना पड़ता है, क्योंकि पानी के संचयन की व्यवस्था की कमी है। इसके साथ ही भारतीय वर्षा बहुत भारी होती है और एक बहुत छोटी अवधि में ही हो जाती है। इस कारण से वर्षा जल को जमीन के नीचे उतरने का अवसर नहीं मिलता। वह सतह से ही तुरंत बहकर बरसाती नदियों के सूखे पाटों को कुछ दिनों के लिए भर देता है और बाढ़ का कारण बनता है। जमीन में कम पानी रिसने से वर्ष भर बहने वाले झरने कम ही होते हैं और पानी को सोख लेने वाली हरियाली पनप नहीं पाती। हरियाली रहित खेतों में वर्षा की बड़ी-बड़ी बूंदें मिट्टी को काफी नुकसान पहुंचाती हैं। मिट्टी के ढेले उनके आघात से टूटकर बिखर जाते हैं और अधिक मात्रा में मिट्टी का अपरदन होता है।
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भारत में मानसून उन ग्रीष्मकालीन हवाओं को कहते हैं जिनसे वर्षा होती हैं, ये हवाएं बंगाल की खाड़ी, अरब सागर एवं हिंद महासागर से होकर आती है। इनकी दिशा दक्षिण पश्चिम एवं दक्षिण से उत्तर एवं उत्तर पश्चिम की ओर होती है। इस कारण इन्हें दक्षिण पश्चिम मानसून हवाओं के नाम से भी जाना जाता है। ग्रीष्मकाल में मानसून हवाएं सागर से स्थल की ओर एवं शीतकाल में स्थल से सागर की ओर चला करती है। दिशा बदलने के कारण प्रथम को दक्षिण पश्चिम मानसून एवं द्वितीय को उत्तर पूर्वी मानसून या लौटता मानसून कहते हैं। ये मानसून हवाएं इतनी प्रबल होती हैं कि इनके प्रभाव से उत्तरी हिंद महासागर में सागरीय धारा प्रवाहित होने लगती है तथा इन हवाओं की दिशा के साथ उक्त सागरीय धारा भी इन हवाओं की दिशा में अपनी दिशा बदल लेती हैं। इस प्रकार सागरीय धाराओं का वर्ष में दो बार दिशा बदलना केवल हिंद महासागर में होता है। विश्व के किसी महासागर में इस प्रकार की घटना नहीं होती। मानसून हवाओं के नाम पर उत्तरी हिंद महासागर की इस धारा को मानसून धारा कहते हैं।

उत्पत्ति

भारतीय मानसून हवाओं की उत्पत्ति पर अनेक मत हैं लेकिन आधुनिक विचारधारा को सर्वाधिक समर्थन प्राप्त है। इस विचारधारा के अनुसार मानसून हवाओं के विकास में परिध्रुवीय भंवर, हिमालय एवं तिब्बत पठार एवं जेट स्ट्रीम का महत्वपूर्ण योगदान है। इस विचारधारा के अनुसार, 22 सितंबर के बाद सूर्य का दक्षिणायन होना प्रारंभ होता है। फलस्वरूप उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने लगती हैं। ध्रुवों की ओर जाने पर किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है। तिरछी किरणें सुबह की किरणों की तरह होती हैं जिनसे प्रकाश तो मिलता है लेकिन तापमान कम मिलता है। किरणों के तिरछेपन के साथ-साथ दिन की अवधि भी कम होती जाती। सूर्य के दक्षिणायन के साथ-साथ उत्तरी गोलार्द्ध में रातें लंबी व दिन छोटे होते जाते हैं। इस प्रकार का सर्वाधिक प्रभाव उत्तरी ध्रुव पर पड़ता है। 66 अंश 30 मिनट उत्तरी अक्षांश पर रात की अवधि 24 घंटे, 70 अंश उत्तरी अक्षांश पर 4 माह एवं 90 अंश उत्तरी अक्षांश पर 6 माह तक की होती है। किरणों के तिरछेपन एवं रातें लंबी होने से उत्तरी गोलार्द्ध में ध्रुवों की ओर ठंड बढ़ती जाती है। धरातल ठंडा होने से वायु भी ठंडी होने लगती है। ठंडी वायु भारी होती है इस कारण ऊपर से नीचे बैठती है। इस ठंडी वायु के ऊपर से नीचे बैठने के कारण ध्रुवीय धरातल पर उच्च वायुदाब एवं धरातल से ऊपर वायुमंडल में जहां की वायु सरककर नीचे बैठती है धरातलीय उच्चदाब के विपरीत निम्न वायुदाब बन जाता है। ध्रुव के ऊपर उच्च वायुमंडल तल में बने इस निम्न वायुदाब के चारों ओर घड़ी की विपरीत दिशा में वायु संचार होने लगता है जिससे वायुमंडलीय उच्चतल में ध्रुव के चारों ओर एक भंवर का निर्माण होता है। जिसे परिध्रुवीय भंवर कहते हैं। जैसे-जैसे ध्रुव पर तापमान कम होता जाता है।

परिध्रुवीय भंवर के विस्तार में विकास होता जाता है। इसका विस्तार 35 अंश उत्तरी अक्षांश से 20 अंश उत्तरी अक्षांश तक हो जाता है। इस परिध्रुवीय भंवर में वायु पूर्व से पश्चिम दिशा में प्रवाहित होती है। 20 अक्षांश उत्तरी अक्षांश से 35 अंश उत्तरी अक्षांश के मध्य इस उच्चतलीय परिध्रुवीय भंवर को पछुआ जेट स्ट्रीम कहते हैं। इस जेट स्ट्रीम की ऊंचाई सामान्यतः 7 से 14 किमी तक होती है। यह जेट स्ट्रीम दक्षिण अफगानिस्तान, उत्तरी पाकिस्तान के उच्च वायुमंडलीय तल से होकर पूर्व की ओर जाती है। यहां जेट स्ट्रीम के हिमालय एवं तिब्बत पठार से टकराने से दो भाग हो जाते हैं। एक भाग हिमालय के दक्षिण में प्रवाहित होने लगता है। जब यह भाग हिमालय के दक्षिण की ओर मुड़ता है तो मुड़ने के कारण उच्चतल में घड़ी के अनुकूल दिशा में पवन संचार होने लगता है। घड़ी की दिशा में पवन संचार प्रतिचक्रवात की दशा उत्पन्न करता है। उच्च तल में स्थित प्रति चक्रवात के कारण वर्षा नहीं होती है एवं आसमान साफ रहता है क्योंकि वर्षा के लिए हवाओं का ऊपर उठना आवश्यक है। फिर शीतकाल में उत्तर भारत में पश्चिमी विक्षोभों से अल्प वर्षा हो जाती है इस वर्षा का संबंध भूमध्यसागरीय प्रदेश से चलने वाली हवाओं से है।

शीतकाल में उत्तर भारत में अल्प वर्षा

यूरोप में धरातल के समीप पूर्व से पश्चिम की ओर पछुआ हवाएं प्रवाहित होती है। शीतकाल में इन हवाओं का विस्तार दक्षिण में भूमध्यसागर तक हो जाता है। इन हवाओं के साथ पश्चिम से पूर्व की ओर शीतोष्ण चक्रवात चला करते हैं जिनसे यूरोप एवं भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में वर्षा होती है। शीतकाल में ये हवाएं भारत के उत्तर-पश्चिम में पंजाब एवं जम्मू-कश्मीर से होकर भारत में प्रवेश करती है। इन हवाओं के सथ शीतोष्ण चक्रवात भी प्रवेश करते हैं। चक्रवातों में हवाएं चक्राकार रूप में ऊपर उठती हैं जिनसे वर्षा होती है। लेकिन भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित उत्तरी पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान के उच्चतलीय वायुमंडल में स्थित प्रतिचक्रवातीय पवन संचार में हवाएं ऊपर से नीचे बैठती हैं जो शीतोष्ण चक्रवात की हवाओं को ऊपर उठने नहीं देती जिससे शीतोष्ण चक्रवात भारत में चक्रवात के रूप में प्रवेश न कर उनके क्षीण रूप अवदाब या विक्षोभ के रूप में प्रवेश करते हैं जिन्हें भारत में शीतकालीन पश्चिमी विक्षोभ के नाम से जाना जाता है। इन विक्षोभों की मुख्य वर्षा पंजाब व हरियाणा में एवं गौण वर्षा पूर्व में पटना एवं दक्षिण में जबलपुर तक होती है। इनके द्वारा हिमालय क्षेत्र के जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तरांचल में हिमपात हो जाता है। यह वर्षा भारत की वार्षिक वर्षा की अल्प मात्रा है लेकिन उत्तर भारत में गेहूं की फसल के लिए अत्यंत लाभकारी है। शीतकाल में दक्षिण भारत में भी कुछ वर्षा होती है लेकिन यह वर्षा पश्चिमी विक्षोभ से नहीं बल्कि लौटते मानसून से होती है।

शीतकाल में दक्षिण भारत में वर्षा

शीतकाल में भारत में हवाएं उत्तर से दक्षिण की ओर एवं स्थल से सागर की ओर चलती हैं। इन्हें लौटता मानसून भी कहते हैं। लौटता मानसून भारत के पूर्वी तट से तमिलनाडु तट पर जल से स्थल में प्रवेश कर जाता है। जल से ऊपर से आने के कारण इन हवाओं में सागरीय नमी आ जाती है इसलिए इनके दावारा मुख्य रूप से तमिलनाडु तट पर तथा गौण रूप से केरल, कर्नाटक एवं दक्षिण आंध्र प्रदेश में दिसंबर-जनवरी में वर्षा हो जाती है। उक्त पश्चिमी विक्षोभ एवं लौटती मानसून वर्षा को छोड़कर शेष भारत शीतकाल में शुष्क एवं ठंडा रहता है।

भारत में ग्रीष्मकालीन वर्षा

21 मार्च से सूर्य उत्तरायण होना प्रारंभ होता है जिससे उत्तरी गोलार्द्ध के तापमान में वृद्धि होने लगती है और उत्तरी ध्रुवीय धरातलीय उच्च वायुदाब कम होने लगता है। इसका प्रभाव उच्चतलीय वायुमंडलीय परिध्रुवीय भंवर पर भी पड़ता है। मध्य जून तक परिध्रुवीय भंवर का 35 से 20 अंश उत्तरी अक्षांशों की ओर बढ़ा हुआ भाग लुप्त होने लगता है। उच्चतलीय पछुआ जेट स्ट्रीम उत्तर की ओर खिसकने लगती है। इस कारण हिमाचल के दक्षिण से होकर जाने वाली शीतकालीन जेट स्ट्रीम शाखा समाप्त हो जाती है लेकिन तिब्बत के उत्तर से होकर जाने वाली जेट स्ट्रीम की शाखा पहले की भांति प्रवाहित होती रहती है। यह शाखा हिमालय एवं तिब्बत पठार के कारण उत्तर की ओर मुड़ती है। उत्तरी पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान के उच्चतलीय वायुमंडल में इस मोड़ पर पवन संचार दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर घड़ी की विपरीत दिशा में हो जाता है जिससे उच्चतलीय चक्रवातीय पवन संचार का निर्माण होता है क्योंकि उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी के विपरीत दिशा में पवन संचार होने से गतिजन्य चक्रवात बनता है।

यह चक्रवात धरातलीय हवाओं को अपनी ओर खींचता है। ग्रीष्मकाल के कारण उत्तर भारत एवं उत्तरी पाकिस्तान में धरातलीय तापमान अधिक होते हैं जिससे धरातल के समीप हवाएं गर्म हो जाती हैं और स्वतः ऊपर उठती हैं। इन उठती हवाओं का उच्चतलीय चक्रवात द्वारा चूषण होने के कारण हवाओं के ऊपर उठने की क्रिया में तीव्रता आ जाती है। इस तीव्रता के कारण पूरे प्रायद्वीपीय भारत से हवाएं तेजी से उत्तर-पश्चिमी भारत की ओर झपटती है इन हवाओं को दक्षिण पश्चिम मानसून कहते हैं। मानसून हवाओं का उत्तर की ओर तेजी से बढ़ने का एक और कारण दक्षिणी परिध्रुवीय भंवर भी है। जिस समय उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्मकाल होता है। उसी समय दक्षिणी गोलार्द्ध में शीतकाल होता है। उत्तरी ध्रुव की भांति दक्षिणी गोलार्द्ध में भी परिध्रुवीय भंवर का निर्माण होता है। जिसका विस्तारित भाग उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (भूमध्यरेखीय पेटी एवं व्यापारिक पवनों को पृथक करने वाला संक्रमण क्षेत्र मध्य संक्रमण क्षेत्र जो इन दोनों के मध्य स्थित होता है) को उत्तर की ओर धकेलता है। भूमध्यरेखा पार करने के बाद इनकी दिशा दक्षिणी पश्चिमी हो जाती है। ये हवाएं सागर के ऊपर से भारतीय भूमि में प्रवेश करती हैं। सागरों के ऊपर से आने वाली ये हवाएं जब भारतीय भूमि के ऊपर से गुजरती है तो तीव्र वर्षा करती है। इसे मानसून का प्रस्फोट कहते हैं।

भारत में दक्षिण पश्चिम मानसून हवाओं का वितरण

ग्रीष्मकालीन मानसून जल से स्थल में प्रवेश करता है तो बंगाल की खाड़ी के ऊपर से आने वाले मानसून को बंगाल की खाड़ी का मानसून एवं अरब सागर के ऊपर से आने वाली हवाओं को अरब सागर का मानसून कहते हैं।

अरब सागर शाखा

अरब सागर का मानसून भारत के पश्चिमी तट से भारत में प्रवेश करता है। अरब सागर की एक शाखा केरल से महाराष्ट्र तक फैले हुए पश्चिमी घाट पर्वत से टकराती है। पश्चिमी घाट तट से सीधे खड़े हुए पर्वत (ऊंचाई 800 से 2000 मी.) जिनसे मानसूनी हवाएं टकराकर ऊपर उठती हैं चूंकि वह मानसूनी हवाएं आर्द्रता से युक्त होती हैं, इस कारण तीव्र वर्षा करती हैं। अतः पश्चिमी घाट पर्वत भारत के अधिकतम वर्षा क्षेत्र में से हैं। ये हवाएं पश्चिमी घाट पर्वत को पार करके जब दूसरी ओर उतरती हैं तो इनकी वर्षा क्षमता कम हो जाती है क्योंकि पश्चिमी घाट पर ये हवाएं वर्षा कर चुकी होती हैं। उतरते समय यह गर्म होने लगती हैं जससे संघनन क्रिया मंद पड़ जाती है जिससे इनकी वर्षा कराने की क्षमता में और कमी आ जाती है। इन कम वर्षा वाले क्षेत्रों को वृष्टिछाया क्षेत्र कहते हैं। महाबलेश्वर, मुंबई व मंगलोर क्रमशः 650 सेमी. 188 सेमी व 330 सेमी. वर्षा प्राप्त करते हैं जबकि इनके पास स्थित किंतु पश्चिमी घाट के दूसरी ओर वृष्टिछाया क्षेत्र में स्थित कोंकण, पुणे एवं बंगलुरु क्रमशः 55 सेमी व 50 सेमी वर्षा प्राप्त करते हैं। मध्य भारत मानसून शाखा नर्मदा एवं ताप्ती नदियों से होती हुई गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड राज्यों को वर्षा प्रदान करती है तत्पश्चात इसकी वर्षा क्षमता कम हो जाती है। छत्तीसगढ़ एवं झारखंड में यह बंगाल की खाड़ी की शाखा में मिल जाती है। एक अन्य साखा उत्तर में गुजरात के कच्छ, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा होते हुए हिमालय से टकराती है इससे गुजरात में कुछ वर्षा हो जाती है। राजस्थान में अरावली के दक्षिणी भाग में कुछ वर्षा हो जाती है। अधिकांश हवाएं बिना वर्षा किए आगे बढ़ जाती है क्योंकि हवाओं के मार्ग में समकोण पर कोई भी अवरोधक पर्वत स्थित नहीं है तथा राजस्थान की गर्म एवं शुष्क भूमि वर्षा के प्रतिकूल दशाएं उत्पन्न करती हैं ये हवाए आगे जाकर हिमालय पर्वत से टकराती हैं एवं समीपवर्ती क्षेत्र पंजाब में वर्षा करती हैं।

बंगाल की खाड़ी की शाखा

यह शाखा भारत के पूर्वी तट एवं पूर्वोत्तर भारत को वर्षा प्रदान करती है। दक्षिण भारत में तमिलनाडु का तट इन हवाओं के समानांतर होता है जिस कारण से तमिलनाडु इन हवाओं से ज्यादा वर्षा प्राप्त नहीं कर पाता है। ये हवाएं आगे चल कर आंध्र प्रदेश एवं ओडिशा तट से टकराती है जिनसे आंध्र प्रदेश ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश व पूर्वी राजस्थान में वर्षा करती है। दूसरी शाखा बांग्लादेश एवं पश्चिम बंगाल होते हुए बिहार उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब व पूर्वी राजस्थान को वर्षा प्रदान करती है। तीसरी मेघालय एवं पूर्वोत्तर शाखा बंगाल की खाड़ी से होकर आने वाली हवाएं मेघालय स्थित गारो, खासी, जयंतिया पहाड़ियों से टकराती हैं। ये कीपाकर पहाड़ियां हैं जो केवल दक्षिण की ओर खुली हुई हैं। इनमें मानसून हवाएं प्रवेश कर जाने के बाद बिना ऊपर उठे बाहर नहीं निकल पाती। ऊपर उठने से तीव्र वर्षा होती है इस कारण यहां चेरापूंजी एवं मासिनराम जहां विश्व की सर्वाधिक वर्षा होती है उत्तर-पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी की एक और शाखा पूर्वोत्तर में हिमालय एवं अराकानयोमा पर्वत श्रेणी से टकराती है। यहां बंगाल की खाड़ी से अनवरत आर्द्र हवाएं प्रवेश करती हैं लेकिन इन हवाओं को निकलने के लिए स्थान नहीं होता है। पीछे से आने वाली हवाएं इन आर्द्र हवाओं की आर्द्रता घनत्व को और बढ़ा देती है। उच्च आर्द्रता से युक्त मानसून हवाएं अराकान एवं हिमालय पर्वत के कारण ऊपर उठती हैं और वर्षा करती हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र भारत के अधिक वर्षा वाले क्षेत्र हैं। हवाओं का घनत्व लगातार बढ़ते रहने से हवाएं मुड़कर हिमालय के साथ-साथ पश्चिम की ओर जाती हैं। इन हवाओं से समस्त पूर्वोत्तर राज्य तथा पश्चिम की ओर उत्तरी पं. बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब, हरियाणा एवं जम्मू-कश्मीर राज्य वर्षा पाते हैं। पश्चिम की ओर बंगाल की खाड़ी की शाखाएं एक-दूसरे से मिल जाती है और परस्पर आर्द्रता को बढ़ाती हैं। जिससे पंजाब, हरियाणा तक वर्षा होती है। जैसे-जैसे हवाएं सागर तट से दूर जाती हैं सतत वर्षा करने के कारण उसमें आर्द्रता में कमी हो जाती है। इस कारण तट से दूर स्थित क्षेत्र कम वर्षा प्राप्त करते हैं। जैसे पूर्व से पश्चिम की ओर कोलकाता 157 सेमी, पटना 117 सेमी, इलाहाबाद 107 सेमी, लखनऊ 101 सेमी, दिल्ली 65 सेमी, हिसार 43 सेमी, में कम वर्षा होती है।

चक्रवातीय वर्षा

ग्रीष्मकाल होने के कारण सागरीय सतह गर्म होती है जिन पर चक्रवातों का निर्माण होता है। ये मानसन हवाओं के साथ भारतीय भूमि की ओर आते हैं। इन चक्रवातों में हवाएं ऊपर उठती हैं। आर्द्रता से भरी ये हवाएं ऊपर उठकर ठंडी होती है। ठंडी हवाओं की आर्द्रता धारण करने की क्षमता कम होती है जिससे हवा में उपस्थित जलवाष्प, जल में परिवर्तित हो जाती है और बादलों का निर्माण होता है जलवाष्प की गुप्त उष्मा मुक्त हो जाती है जो चक्रवात को ऊर्जा प्रदान करती है जिससे चक्रवात ऊर्जा प्राप्त करते हैं। जब ये चक्रवात जल से स्थल में प्रवेश करते हैं स्थल पर तेज हवाओं के साथ वर्षा प्रारंभ होती है। यदि किसी स्थान पर ये चक्रवात रुक जाते हैं तो वहां अधिक वर्षा हो जाती है। आगे बढ़ते हुए चक्रवातों के मार्ग में जब पर्वत आ जाते हैं तो पर्वतीय वर्षा व चक्रवातीय वर्षा दोनों एक साथ हो जाती है जिससे वर्षा की मात्रा अधिक हो जाती है।

मूसलाधार वर्षा

भारत में मानसून हवाओं से निर्मित बादल बरसते नहीं बल्कि पानी उड़ेलते हैं कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। भारत में वर्षा ऋतु के चार माह होते हैं लेकिन इस चार माह में सभी दिन वर्षा नहीं होती। दक्षिण भारत से उत्तर की ओर एवं उत्तर भारत में पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा के दिन कम होते जाते हैं। भारत में वर्षा मूसलाधार होती है। कभी-कभी वर्षा कई दिनों तक लगातार होती है जिससे अधिकांश वर्षाजल भूमिगत जल के रूप में संचय नहीं हो पाता। यह जल धरातलीय प्रवाह के रूप में नदियों के माध्यम से सागरों में पहुंच जाता है। नदियों में बाढ़ आ जाती है, निचले एवं मैदानी भागों में पानी भर जाता है, खेतों में फसलें नष्ट हो जाती है। मिट्टी का कटाव, भू-स्खलन एवं उत्तर भारत की नदियों द्वारा मार्ग बदलने की घटनाएं मूसलाधार वर्षा के परिणाम हैं।

मानसून की अनिश्चिता, अनियमितता एवं विभंगता

भारतीय मानसून का आगमन हमेशा निश्चित नहीं होता। कभी यह शीघ्र आ जाता है तो कभी यह देर से आता है। सामान्यतः एक जून को केरल, 10 जून तक मुंबई 12 से 15 जून तक मध्य भारत में, 25 जून तक पंजाब, हरियाणा एवं 1 जुलाई तक सुदूर पश्चिम में पहुंच जाता है। मानसून से होने वाली वर्षा भी नियमित नहीं है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में यह अनियमितता अधिक एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अनियमितता कम पाई जाती है। यही वजह है कि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता अधिक है।

पर्वतीय वर्षा

भारत में जहां कहीं भी पर्वत मानसून हवाओं के मार्ग में स्थित है वहां वर्षा की मात्रा अधिक हो जाती है। पर्वत मानसूनी आर्द्र हवाओं को ऊपर उठा देते हैं जहां आर्द्र वायु संघनित होकर वर्षा कर देती है। हिमालय पर्वत, अराकानयोमा श्रेणी, मेघालय की पहाड़ियां पूर्वी घाट, पश्चिमी घाट, विध्यांचल श्रेणी, सतपुड़ा श्रेणी आदि समीपवर्ती मैदानों से अधिक वर्षा प्राप्त करते हैं। राजस्थान में स्थित अरावली पर्वत अरब सागर की मानसून शाखा के सामानांतर स्थिति है फलस्वरूप यह पर्वत हवाओं को रोकने अथवा ऊपर उठाने में सहायक नहीं है। इसलिए वहां पर्वत होते हुए भी पर्याप्त वर्षा प्राप्त नहीं हो पाती है। पर्वतों से दूर जाने पर मैदानों की ओर वर्षा की मात्रा में कमी पाई जाती है। यही वजह है कि उत्तर भारत में पूर्व से पश्चिम पर्वतीय भागों जैसे दार्जिलिंग में 250 सेमी, मसूरी में 206 सेमी, शिमला में 122 सेमी वर्षा होती है जबकि इन्हीं के लगभग समानांतर स्थित मैदानी भागों में पूर्व से पश्चिम की ओर कोलकाता में 119 सेमी, इलाहाबाद में 76 सेमी, दिल्ली में 46 सेमी, गंगानगर में 25 सेमी वर्षा होती है जो कि पर्वतीय भागों से कम है।

वैश्विक तपन एवं मानसून वर्षा

विश्व के वायुमंडल में होने वाली तापमान वृद्धि को वैश्विक तपन कहते हैं। वायु के तापमान में वृद्धि होने से उसकी आर्द्रता धारण करने की क्षमता में वृद्धि होती है। जिससे वायु पहले की तुलना में अधिक जलवाष्प को धारण कर लेती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून सागरों के ऊपर से आती है जहां ग्रहण करने के लिए पर्याप्त जलवाष्प होती है। अधिक जल धारण करने की क्षमता एवं अधिक जल की उपलब्धता अधिक वर्षा की संभावनाओं को बढ़ा देती है। यदि अनुकूल वर्षा दशाएं उपलब्ध हो तो अधिक जलवाष्प युक्त हवाएं असाधारण रूप से अधिक वर्षा कर देती है। हाल के कुछ वर्षों में अनेक देशों में इसी प्रकार की असाधारण वर्षा हुई है। सितंबर 2009 में मुंबई में होने वाली वर्षा एवं बाढ़ भी इसी प्रकार की वर्षा है।

कैसे आता है मॉनसून

एशिया और यूरोप का विशाल भूभाग, जिसका एक हिस्सा भारत भी है, ग्रीष्मकाल में गरम होने लगता है। इसके कारण उसके ऊपर की हवा गरम होकर उठने और बाहर की ओर बहने लगती है। पीछे रह जाता है कम वायुदाब वाला एक विशाल प्रदेश। यह प्रदेश अधिक वायुदाब वाले प्रदेशों से वायु को आकर्षित करता है। अधिक वायुदाब वाला एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत को घेरने वाले महासागरों के ऊपर मौजूद रहता है क्योंकि सागर, स्थल भागों जितना गरम नहीं होता है और इसीलिये उसके ऊपर वायु का घनत्त्व अधिक रहता है। उच्च वायुदाब वाले सागर से हवा मानसून पवनों के रूप में ज़मीन की ओर बह चलती है। दक्षिण पश्चिमी मानसून भारत के ठेठ दक्षिणी भाग में जून 1 को पहुँचता है। साधारणतः मानसून केरल के तटों पर जून महीने के प्रथम पाँच दिनों में प्रकट होता है। यहाँ से वह उत्तर की ओर बढ़ता है और भारत के अधिकांश भागों पर जून के अन्त तक पूरी तरह छा जाता है।

अरब सागर से आने वाली पवन उत्तर की ओर बढ़ते हुए 10 जून तक मुम्बई पहुँच जाती है। इस प्रकार तिरूवनंतपुरम से मुम्बई तक का सफर वे दस दिन में बड़ी तेजी से पूरा करती हैं। इस बीच बंगाल की खाड़ी के ऊपर से बहने वाली पवन की प्रगति भी कुछ कम आश्चर्यजनक नहीं होती। यह पवन उत्तर की ओर बढ़कर बंगाल की खाड़ी के मध्य भाग से दाखिल होती है और बड़ी तेजी से जून के प्रथम सप्ताह तक असम में फैल जाती है। हिमालय रूपी विघ्न के दक्षिणी छोर को प्राप्त करके यह मानसूनी धारा पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। इस कारण उसकी आगे की प्रगति म्यांमार की ओर न होकर गंगा के मैदानों की ओर होती है।

मानसून कोलकाता शहर में मुम्बई से कुछ दिन पहले (साधारणतः जून 7 को) पहुँच जाता है। मध्य जून तक अरब सागर से बहने वाली हवाएँ सौराष्ट्र, कच्छ व मध्य भारत के प्रदेशों में फैल जाती हैं।

इसके पश्चात बंगाल की खाड़ी वाली पवन और अरब सागर वाली पवन पुनः एक धारा में सम्मिलित हो जाती हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, पूर्वी राजस्थान आदि बचे हुए प्रदेश 1 जुलाई तक बारिश की पहली बौछार अनुभव करते हैं।

उपमहाद्वीप के काफी भीतर स्थित दिल्ली जैसे किसी स्थान पर मानसून का आगमन कौतूहल पैदा करने वाला विषय होता है। कभी-कभी दिल्ली की पहली बौछार पूर्वी दिशा से आती है और कभी बंगाल की खाड़ी के ऊपर से बहने वाली धारा का अंग बनकर दक्षिण दिशा से आती है। मौसमशास्त्रियों को इस बात का निश्चय करना कठिन हो जाता है कि दिल्ली की ओर इस दौड़ में मानसून की कौन सी धारा विजयी होगी। मध्य जुलाई तक मानसून कश्मीर और देश के अन्य बचे हुए भागों में भी फैल जाता है। परन्तु एक शिथिल धारा के रूप में ही, क्योंकि तब तक उसकी सारी शक्ति और नमी खत्म हो चुकी होती है।

सर्दी में जब स्थल भाग अधिक जल्दी ठंडे हो जाते हैं तब प्रबल, शुष्क हवाएँ उत्तर-पूर्वी मानसून बनकर बहती हैं। इनकी दिशा गर्मी के दिनों की मानसून हवाओं की दिशा से विपरीत होती हैं। उत्तर-पूर्वी मानसून भारत के स्थल और जल भागों में जनवरी की शुरुआत तक, (जब एशियाई भूभाग का तापमान न्यूनतम होता हैं), पूर्ण रूप से छा जाता है। इस समय उच्च दाब की एक पट्टी पश्चिम में भूमध्य सागर और मध्य एशिया से लेकर उत्तर भाग में फैली होती है। बादलहीन आकाश, बढ़िया मौसम, आर्द्रता की कमी व हल्की उत्तरी हवाएँ इस अवधि में भारत के मौसम की विशेषताएँ होती हैं। उत्तर-पूर्वी मानसून के कारण वर्षा परिमाण में तो कम, परन्तु सर्दी की फ़सलों के लिये बहुत लाभकारी होती है।

उत्तरी-पूर्वी मानसून तमिलानाडु में विस्तृत वर्षा मानसून काल में ही करता है। सम्पूर्ण भारत के लिये औसत वर्षा की मात्रा 117 सेंटीमीटर है। वर्षा की दृष्टि से भारत एक ऐसा देश है जिसके एक भाग में प्रायः बाढ़ की स्थिति और दूसरे भाग में सूखे की स्थिति देखने को मिलती है। चेरापुँजी में साल में 1100 सेंटीमीटर वर्षा होती है, तो जैसलमेर में केवल 20 सेंटीमीटर ही। मानसून काल भारत के किसी भी भाग के लिये निरन्तर वर्षा का समय नहीं होता। कुछ दिनों तक वर्षा निर्बाध रूप से होती रहती है, जिसके बाद कई दिनों तक बादल चुप्पी साध लेते हैं। वर्षा का आरम्भ भी समस्त भारत या उसके काफी बड़े क्षेत्र के लिये अक्सर विलम्ब से होता है। कई बार वर्षा समय से पहले ही समाप्त हो जाती है या देश के किसी हिस्से में अन्य हिस्सों से कई अधिक वर्षा हो जाती है। यह अक्सर होता है और बाढ़ और सूखे की विषम परिस्थितियों से देश को जूझना पड़ता है।

भारत में वर्षा का वितरण पर्वत श्रेणियों की स्थिति पर काफी हद तक आधारित है। यदि भारत में मौजूद सभी पर्वत हटा दिये जाएँ तो वर्षा की मात्रा बहुत घट जाएगी। मुम्बई और पुणे में पड़ने वाली वर्षा इस तथ्य को बखूबी दर्शाती है। मानसूनी पवन दक्षिण पश्चिमी दिशा से पश्चिमी घाट को आने लगती है जिसके कारण इस पर्वत के पवनाभिमुख भाग में भारी वर्षा होती है। मुम्बई शहर, जो कि पश्चिमी घाट के इस ओर स्थित है, में लगभग 187.5 सेंटीमीटर वर्षा होती है, जबकि पुणे, जो कि पश्चिमी घाट के पवनाभिमुख भाग से केवल 160 किलोमीटर के फासले पर स्थित है, में मात्र 50 सेंटीमीटर वर्षा होती है।

पर्वत श्रेणियों के कारण होने वाली वर्षा का एक अन्य उदाहरण उत्तर-पूर्वी भारत में स्थित चेरापूँजी है। इस छोटे से कस्बे में वर्ष में औसतन 1100 सेंटीमीटर तक वर्षा होती है जो एक समय विश्वभर में सर्वाधिक समझी जाती थी। यहाँ वर्षा वाले प्रत्येक दिन 100 सेंटीमीटर तक वर्षा हो सकती है। यह विश्व के अनेक हिस्सों में वर्ष भर में होने वाली वर्षा से भी अधिक है।

चेरापूँजी खासी पहाड़ियों के दक्षिणी ढलान में दक्षिण से उत्तर की ओर जाने वाली एक गहरी घाटी में स्थित है। इस पहाड़ी की औसत ऊँचाई 1500 मीटर है। दक्षिण दिशा से बहने वाली मानसूनी हवाएँ इस घाटी में आकर फँस जाती हैं और अपनी नमी को चेरापूँजी के ऊपर उड़ेल देती हैं। एक कौतूहलपूर्ण बात यह है कि चेरापूँजी में अधिकांश बारिश सुबह के समय होती है।

चूँकि भारत के अधिकांश भागों में वर्षा केवल मानसून के तीन चार महीनों में होती है, बड़े तालाबों, बाँधों और नहरों से दूर स्थित गाँवों में शेष महीनों में पीने के पानी का संकट हो जाता है। उन इलाकों में भी जहाँ वर्षाकाल में पर्याप्त बारिश होती है। पानी के संचयन की व्यवस्था की कमी के कारण मानसून पूर्व काल में लोगों को कष्ट सहना पड़ता है।

भारतीय वर्षा न केवल बहुत भारी होती है बल्कि एक बहुत छोटी सी अवधि में ही हो जाती है, जिसके कारण वर्षाजल को ज़मीन के नीचे उतरने का अवसर नहीं मिल पाता। वर्षाजल तुरन्त बहकर बरसाती नदियों के सूखे पाटों को कुछ दिनों के लिये भर देता है और बाढ़ का कारण बनता है। ज़मीन में कम पानी रिसने से वर्षभर बहने वाले झरने कम ही होतेे हैं और पानी को सोख लेने वाली हरियाली पनप नहीं पाती। हरियाली रहित खेतों में वर्षा की बड़ी-बड़ी बूँदें मिट्टी को काफी नुकसान पहुँचाती हैं। मिट्टी के ढेले उनके आघात से टूटकर बिखर जाते हैं और अधिक मात्रा में मिट्टी का अपरदन होता है।

मानसून : समय में परिवर्तन

आज ग्लोबल वार्मिंग का असर पूरे भारत में साफ दिखाई देने लगा है। गत 37 वर्षों के मौसम सम्बन्धी आँकड़ों के विश्लेषण से साफ है कि प्रदेश में मानसून करीब 7 से 8 दिन की देरी से आ रहा है। तीन-चार दशक पहले की तरह अक्टूबर के दौरान अब अच्छी बारिश नहीं हो रही है। मौसम विभाग भी मानसून के आगमन की तारीख बदलने की तैयारी में जुट गया है। ऐसी स्थिति में कृषि योजना सहित खेती से जुड़ी सारी योजनाओं को नए सिरे से प्लान करना होगा।

मौसम विभाग के अनुसार छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और विदर्भ में मानसून के प्रवेश की सामान्य तिथि 10 जून होती है। लेकिन पिछले साढ़े तीन दशक के आँकड़े अलग ही कहानी कह रहे हैं। इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि मौसम वैज्ञानिकों ने मानसून के प्रवेश की सही तारीख का पता लगाने के उद्देश्य से वर्ष 1971 से लेकर 2008 तक के आँकड़ों का विश्लेषण किया जिसके फलस्वरूप यह ज्ञात हुआ कि इन 37 सालों में सबसे जल्दी मानसून 1971 में (तीन जून को) आया था। मानसून के सर्वाधिक विलम्ब से पहुँचने का रिकार्ड 1987 का है, जब बारिश की पहली झड़ी पाँच जुलाई को आई थी।

वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून के प्रदेश में प्रवेश की तारीख का औसत 18 जून है। इस तिथि से छह दिन आगे या पीछे (यानि 12 से 24 जून के बीच) मानसून आने लगा है। इस अवधि में केवल पाँच साल (1971, 1977, 1984, 1993, 2001) मानसून 18 जून के पहले और तीन साल (1987, 2006, 2008) इस तिथि के बाद आया। इस दौरान जून में बारिश का औसत 194 मिमी आ रहा है। मानसून का समय बदलने के पीछे सबसे अहम वजह ग्लोबल वार्मिंग है।

किसी एक दिन में बहुत ज्यादा बारिश या बहुत लम्बे समय तक सूखा इसके स्पष्ट संकेत हैं। ग़ौरतलब है कि 2007 में 18 जून को एक ही दिन में 370 मिमी बारिश हुई थी। 11 जून 2004 में भी 173 मिमी बारिश हुई थी। मौसम विभाग का अनुमान है कि आने वाले सालों में जलवायविक परिवर्तनों (क्लाइमेटिकल चेंजेज) की वजह से उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र (ट्राॅपिकल एरिया) में बारिश कम होगी।

मौसम विभाग के निदेशक एम एल साहू ने बताया कि 10 जून की तारीख वर्ष 1950 से 1980 तक के आँकड़ों के आधार पर तय की गई है, जबकि उसके बाद मौसम में काफी बदलाव आये हैं। 1980 से 2008 तक के आँकड़ों के आधार पर एक रिपोर्ट मुख्यालय को भेजी जा चुकी है। मध्य भारत में इसके हिसाब से मानसून के आने की तारीख करीब एक हफ्ते बाद 16 जून के आसपास की आ रही है।

वर्षा : दिन हो रहे हैं कम

सामान्यतः एक दिन में 3 मिमी या उससे अधिक बारिश होने पर उस दिन को वर्षा वाला दिन माना जाता है। सन् 2009 के मानसून में 3 मिमी से अधिक बारिश वाले दिनों की कुल संख्या 31 रही है जो पिछले 20 सालों में सबसे कम है। पिछले दो दशकोें के बारिश के आँकड़े बताते हैं कि राजधानी में वर्षा वाले दिनों की औसत संख्या 1980 के पूर्व के औसत की तुलना में लगातार घट रही है।

वैज्ञानिक इस तरह कम हो रहे वर्षा के दिनों की दीर्घकालीन औसत को राजधानी में जलवायु परिवर्तन की दस्तक मान रहे हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान, नई दिल्ली में जल-मौसम विज्ञान के अनुसार जलवायु परिवर्तन किसी स्थान पर तापमान, बारिश या आर्द्रता के दीर्घकालीन औसत (सामान्यतः एक या दो दशक या उससे अधिक) में आये परिवर्तनों के रूप में व्यक्त होता है। वर्षा के दिन कम होना और अतिवृष्टि की घटनाएँ बढ़ना जलवायु परिवर्तन के कई लक्षणों में से एक है।
वर्षा वाले दिन कम होने का अनुभव आज शहर के नागरिक भी कर रहे हैं। पर्यावरण पर नजर रखने वाले बागची का कहना है कि पहले सात-सात दिनों तक बारिश नहीं रुकती थी। उस दौरान लगातार कभी तेज तो कभी धीमी बारिश होती ही रहती थी। अब तो दिन में 3-4 घंटे लगातार बारिश होना भी बड़ी बात लगती है। जुलाई-अगस्त में कुछ दिन तेज बारिश होती है तो कुछ दिन तेज धूप और सूखा रहता है। यह जलवायु परिवर्तन के ही लक्षण हैं। प्रतिवर्ष कम हो रहे वर्षा के दिनों की जानकारी को निम्न सारणी में दर्शाया गया है:

ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानसून में देरी

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण अगली सदी तक विश्व के ग्रीष्मकालीन मानसून में पाँच से पन्द्रह दिन का विलम्ब हो सकता है। इसके अतिरिक्त भारत सहित दक्षिण एशिया के बड़े हिस्से में वर्षा का स्तर काफी कम भी हो सकता है। अध्ययन के अनुसार वैश्विक तापमान में वृद्धि से मानसून पूर्व की ओर रूख कर सकता है, जिससे हिन्द महासागर, म्यांमार और बांग्लादेश में तो खूब बारिश होगी लेकिन पाकिस्तान, भारत तथा नेपाल में वर्षा का स्तर कम ही रहेगा। इस वजह से वर्षा का मौसम भी लम्बे समय बाद आने की आशंका होगी और पश्चिमी भारत, श्रीलंका तथा म्यांमार के कुछ समुद्रतटीय इलाकों में औसतन वर्षा में बढ़ोत्तरी होने से घातक बाढ़ आने का खतरा भी बढ़ सकता है।

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भारत में दक्षिण पश्चिम मानसून और पूर्वानुमान पद्धति

मानसून की परिभाषा है – हवा के प्रवाह में आने वाला मौसमी बदलाव और तदनुरूपी निःसादन परिवर्तन और जमीन तथा समुद्र का असमान रूप से गर्म हो जाना। इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले अंग्रेजों ने भारत और आस-पास के देशों में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठने वाली उन हवाओं के संदर्भ में किया था जिनके कारण इस क्षेत्र में भारी वर्षा होती है। 
 

मानसून सृजन की प्रक्रिया


मानसून को बड़े पैमाने पर समुद्री बयार माना जा सकता है। कारण है, जमीन और उससे जुड़े समुद्री खंड का विभेदक तापन और महाद्वीपीय भू-भाग पर पैदा होने वाला परिणामी कम तापन। विभेदक तापन तब होता है जब गर्मी ऊर्ध्व रूप से मिली-जुली परत से मिल जाए (ये 50 मीटर तक गहरी हो सकती है)। मिलने का माध्यम होंगी – हवा और उठा-पठक से उत्पन्न गतिविधि। जहां भूतल ताप का वहन धीरे-धीरे करता है, मौसमी संकेत एक मीटर या इससे ज्यादा धंस सकते हैं। इसके अलावा तरल पानी की विनिदिष्ट तापन क्षमता जमीन के मुकाबले काफी ज्यादा होती है। कुल मिलाकर इसका मतलब यह है कि मौसमी चक्र में शामिल होने वाली परत की तापन प्रक्रिया समुद्र और भूखंड की तापन प्रक्रिया से काफी ज्यादा होती है जिसके परिणामस्वरूप जमीन पर मौजूद हवा जल्दी गर्म हो जाती है और उस हवा के मुकाबले अधिक तापमान वाली हो जाती है जो समुद्र पर मौजूद हैं। जमीन पर स्थित गर्म हवा की प्रवृत्ति ऊपर उठने की होती है जिससे उस क्षेत्र में कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है। इसके कारण वहां समान रूप से हवा चलने लगती है और समुद्री नम हवाएं आने लगती हैं। यह नम हवा ऊपर उठ जाती है। ऊपर जाने पर प्रसार के कारण ये हवाएं ठंडी हो जाती है जिससे निःसादन होता है।

जाड़े में भूभाग जल्दी ठंडे हो जाते हैं। लेकिन समुद्र अधिक समय तक गर्म बने रहते हैं। जमीन पर स्थित ठंडी हवा उच्च दबाव का क्षेत्र पैदा करती है जससे हवा भूमि से समुद्र की ओर बहने लगती है। मानसून की हवाएं समुद्र और भूभाग पर एक जैसा व्यवहार करती हैं। लेकिन यह बहुत बड़े पैमाने पर होती है और इसके कारण भारी मौसमी बदलाव आता है।
 

दक्षिण पश्चिम मानसून


दक्षिण पश्चिमी मानसून जून और सितंबर चित्र 1 के बीच आता है। थार का रेगिस्तान और आस-पास के इलाके उत्तरी और मध्य भारतीय महाद्वीप के भू-भाग गर्म हो जाते हैं जिसके चलते कम दबाव वाला क्षेत्र बन जाता है। कम दबाव वाला क्षेत्र उत्तरी और मध्य भारतीय क्षेत्र में बन जाता है। इस प्रकार से जो खाली जगह बनती है उसे भरने के लिए हिंद महासागर से भाप वाली हवा तेजी से उपमहाद्वीप की तरफ चल पड़ती है। इस प्रकार की हवाएं दक्षिणी हिंद महासागर से चलती है और उत्तर की ओर बढ़ती है। विषुवत रेखा पार करने के बाद ये हवाएं धरती के घूमने के चलते खाली हो जाती है। वे भारतीय भू-भाग पर दक्षिण पश्चिम की ओर बढ़ती है और इसीलिए इन्हें दक्षिण पश्चिम मानसून कहा जाता है। 
 

दक्षिण पश्चिम मानसून का आगमन


दक्षिण पश्चिमी मानसून आमतौर पर जून में शुरू होता है और सितंबर तक समाप्त हो जाता है। इसके अंतर्गत दक्षिण से आने वाली वाष्प से लदी हवाएं भारतीय उपमहाद्वीप की तरफ आती हैं और दो हिस्सों में बंट जाती है। एक भाग अरब सागर की शाखा कहलाती है और दूसरा भाग पश्चिम बंगाल शाखा। अरब सागर की शाखा पहले केरल में एक जून के आस-पास दाखिल होती है बाद में यह पश्चिमी घाट (कोंकण एवं गोवा) की तरफ बढ़ती है और 10 जून तक मुंबई पहुंच जाती है। इसके साथ ही, पश्चिम बंगाल शाखा बंगाल की खाड़ी की तरफ बढ़ जाती है और वहां से यह पूर्वोत्तर भारत की तरफ चलती है। बंगाल की खाड़ी में इसमें और नमी आ जाती है जिसके साथ यह मानसून एक जून के आस-पास उत्तर पूर्वी भारत के इलाकों में पहुंचता है। पूर्वोत्तर भारत पहुंच कर ये हवाएं पश्चिम की तरफ मुड़ जाती है और सिंध और गंगा के मैदानों की ओर चल पड़ती है। यही मानसून 15 जून के आस-पास उत्तर प्रदेश पहुंच जाता है। उधर अरब सागर वाली शाखा गुजरात पहुंचती है जहां पर दोनों शाखाएं देश के मध्य भाग में मिल जाती है। इसके बाद ये दोनों एक प्रवाह बन जाती है और जुलाई के मध्य तक देश के विभिन्न भागों को वर्षा से भिगोती हैं। दक्षिण पश्चिम मानसून के आने की समान्य तारीखें नीचे चित्र-2 में दी जा रही है।
 

दक्षिण पश्चिम मानसून के दौरान वर्षा


मानसून के चलते भारत में 80 प्रतिशत वर्षा होती है। भारत की खेती बहुत हद तक वर्षा पर निर्भर है और कपास, चावल, तिलहन और मोटे अनाज की खेती भी इसी पर निर्भर करती है। अगर मानसून के आने में कुछ हफ्तों की देरी हो जाती है या इसके कारण वर्षा जल्दी खत्म हो जाती है अथवा देर तक चलती है तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है। यह बात भारत में पड़ चुके कई बार के अकाल से सिद्ध हो चुकी है। 

भारत में दक्षिण पश्चिम मानसून के दिनों में होने वाली वर्षा में आमतौर पर समान्य हवा समकोण पर पश्चिमी घाट और खासी जयंतियां पहाड़ियों पर सीधे बढ़ती है अतः इन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा मौसमी वर्षा होती है। उत्तर भारत के मैदानों में कम से कम वर्षा वाले क्षेत्र उत्तर पश्चिम राजस्थान से लेकर पश्चिम बंगाल के मध्य भाग और मानसून के रास्ते में पड़ने वाले भू-भाग आते हैं। पश्चिम घाट के पूर्वी क्षेत्रों में वर्षा काफी कम होती है क्योंकि यह वर्षा के छाया वाले क्षेत्र में पड़ता है। पूर्वी और पश्चिमी घाट इलाकों पर इससे होने वाली वर्षा काफी होती है। अतः इससे एक फायदा यह होता है कि पश्चिमी घाट से निकलने वाली दक्षिण भारत की सारी नदियां पठारी क्षेत्र की तरफ बढ़ती है जो कम वर्षा वाला क्षेत्र है। हिमालय के पूर्वी और मध्य भाग ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्र हैं। जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से, राजस्थान के पश्चिमी भाग और भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिण पूर्वी क्षेत्र सबसे कम बारिश वाले इलाके हैं।

मानसून की वर्षा का अध्ययन करने से देश में विविधता के दर्शन होते हैं। प्रतिदिन वर्षा वाले क्षेत्र समान्य से अलग प्रकृति के होते हैं। चित्र-3 में मानसून सीजन 2007 के दौरान समान्य और वास्तविक वर्षा के आंकड़े दिखाए गए हैं। इस चित्र में सक्रिय और कमजोर मानसून के विवरण मिलेंगे। हालांकि कुल मिलाकर देश में सामान्य से 6 प्रतिशत वर्षा कम हुई लेकिन 5 विभिन्न प्रभागों में वर्षा सामान्य से कम रिकार्ड की गई (देखें चित्र-4) 

चित्र-5 में दर्शाया गया है कि वर्ष के दौरान अखिल भारतीय स्तर पर मौसमी मानसून के जरिए कितनी वर्षा हुई और वह लंबी अवधि के औसत से कितने प्रतिशत अलग है। जिन वर्षों के दौरान प्रतिशत में अंतर 10 प्रतिशत से कम है। (अथवा दस प्रतिशत से अधिक है) उन्हें अकाल (बाढ़) या कम (अधिक) मानसून वाले वर्ष कहा गया है। बाकी वर्षों को सामान्य मानसून वर्ष कहा गया है। 1901 से 2011 तक की अवधि में देखा जा सकता है कि 1918 में सबसे कम मौसमी वर्षा हुई (समान्य की 75.1 प्रतिशत) और 1972 में (76.04 प्रतिशत) इसी तरह से सबसे ज्यादा वर्षा वाला वर्षा 1917 रहा है (122.9 प्रतिशत) और 1961 (121.8 प्रतिशत) लाल बार अल नीनो (ला नीना) वर्ष है – 1901 से 2011 तक 20 साल सूखे वाले वर्ष हैं जबकि 13 वर्ष (65 प्रतिशत) अल नीनो वाले वर्ष थे। अधिकांश ला नीना वर्ष (नीले बार) के दौरान सामान्य वर्षा हुई अथवा अधिक वर्षा रिकार्ड की गई।
 

खेती की पैदावार और सघउ पर दक्षिण पश्चिम मानसून की वर्षा का प्रभाव


चित्र 6 में वे वर्ष दिखाए गए हैं जिनमें सामान्य से दस प्रतिशत कम या ज्यादा बारिश हुई, हालांकि मानसून में अंतर का यह विपथन बहुत ज्यादा नहीं है। लेकिन इसका खेती की पैदावार और देश के अर्थव्यवस्था पर काफी असर पड़ता है। शुरू-शुरू में सोचा जाता था कि देश की अर्थव्यवस्था पर मानसून का प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था का खेती पर निर्भर रहने के कारण पड़ता है। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब से नियोजित विकास शुरू हुआ तब से सकल घरेलू उत्पाद (सघउ) में खेती का योगदान काफी घटता गया। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था पर मानसून का प्रभाव कम हो जाना चाहिए था। लेकिन हाल ही में गाडगिल और गाडगिल ने एक अध्ययन किया (2006) जिससे जाहिर हुआ कि अत्यधिक अनावृष्टि का प्रभाव सघउ पर 2 से 5 प्रतिशत तक बना रहा। कहा जा सकता है कि सघउ पर अकाल का प्रभाव अर्थव्यवस्था के उन क्षेत्रों के कारण पड़ता है जो खेती पर निर्भर है। अप्रत्यक्ष रूप से इसका प्रभाव जनसंख्या की क्रयशक्ति पर पड़ता है। गाडगिल और राजीवन 2008 से लिए गए एक चित्र (चित्र-6) से स्पष्ट होता है कि अधिकांश वर्षों के दौरान कम वर्षा के बावजूद अनाज की पैदावार और सकल घरेलू उत्पाद पर प्रभाव सामान्य रहा। 

मानसून की वर्षा का (क) अनाज की उपज पर प्रभाव (ख) सघउ, अकाल और अधिक वर्षा वाले साल लाल और नीले रंग में दिखाए गए हैं।
 

मानसून की वर्षा का पूर्वानुमान


मानसून की वर्षा का पूर्वानुमान मोटे तौर पर 3 भागों में किया जाता है। कम अवधि (कम अवधि 1 से 3 दिन) औसत अवधि (4 से 10 दिन) और लंबी अवधि का पूर्वानुमान (10 दिन से ज्यादा लेकर पूरे मौसम अथवा अधिक के लिए) 
 

कम और औसत अवधि के पूर्वानुमान


कम और औसत अवधि के मौसम के पर्वानुमान आजकल सांख्यिकी मौसम पूर्वानुमान (एनडब्लयूपी) मॉडलों के इस्तेमाल से किए जा रहे हैं। एनडब्ल्यूपी का मुख्य आधार वातावरण का नमूना लेकर मौसम के बारे में पूर्वानुमान बताना होता है जो किसी खास समय के लिए होता है। इसके लिए भूतल निरीक्षण किया जाता है जो जमीन पर बनाए गए मानवचालित मौसम केंद्रों पर किए जाते हैं। समुद्र और भूतल के विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी इस प्रकार के केंद्र बनाए जाते हैं। इन केंद्रों में विशेष प्रकार के यंत्र (रेडियोसोंड) लगाए जाते हैं जिसमें हाइड्रोजन से भरे गुब्बारों के जरिये वातावरण का अनुमान किया जाता है। मौसम उपग्रहों में मिले आंकड़े परंपरागत रूप से मिले आंकडों से मिलाए जाते हैं। मौसम के रडारों से भी सूचना मिलती है। इन सबका इस्तेमाल करते हुए निःसादन और कुल मिलाकर प्रभाव का पूर्वानुमान लगाया जाता है।

प्रेक्षण के दौरान मिले आंकड़ों का इस्तेमाल करके मॉडलों से काम लेना शुरू किया जाता है। ये प्रेक्षण यदा-कदा किए जाते हैं और आंकड़ों के मिलान के जरिये ऑब्जटिव एनालिसिस तरीकों से प्रोसेस किए जाते हैं। इन आंकड़ों का प्रयोग मॉडलों के जरिये पूर्वानुमान लगाने में किया जाता है। आमतौर पर समीकरणों के सेट का इस्तेमाल वातावरण की स्थिति का पूर्वानुमान लगाने के लिए किया जाता है। ये समीकरण विश्लेषण आंकड़ों से तैयार किए जाते हैं और परिवर्तन की दरें निश्चित की जाती है। इन दरों के सहारे वातावरण में होने वाले परिवर्तनों का पूर्वानुमान कुछ समय के लिए अतवा भविष्य के लिए लगाया जाता है। इसके बाद इन आंकड़ों पर समीकरण लगाए जाते हैं और परिवर्तन की दरें निकाली जाती है। इन दरों के सहारे वातावरण में पूर्वानुमान किया जाता है। 

मॉडल सल्यूशन के जरिये जो दिखाई देने वाले परिणाम निकाले जाते हैं उन्हें प्रॉग्नोस्टिक चार्ट कहा जाता है। अक्सर कच्चे आंकड़ों को पूर्वानुमान से पहले संशोधित कर लिया जाता है। 

 

लंबी अवधि के पूरे मौसम के लिए मानसून का पूर्वानुमान


ग्रीष्म ऋतु का मानसून पूरे साल की वर्षा का पूरे देश के भूभाग के 75 प्रतिशत के बराबर होता है। भारत में मानसून की अवधि विभिन्न भागों में दो महीने से 6 महीने तक की हो सकती है। लेकिन लंबी अवधि के पूर्वानुमान आमतौर पर महीने-दर-महीने और मौसम के लिए जून से सितंबर तक जारी किए जाते हैं। भारतीय ग्रीष्म मानसून वर्षा में साल-दर-साल की विभिन्नता का प्रमुख कारण यह बताया जाता है कि धीरे-धीरे समुद्र तल बर्फ से ढके क्षेत्रों और मिट्टी की नमी आदि के तापमान से प्रभावित होती है। लंबी अवधि के पूर्वानुमानों के लिए दो प्रकार के मुख्य तरीके अपनाए जाते हैं, पहला तरीका आंकड़ों पर आधारित तरीके पर आधारित है जबकि दूसरा तरीका गतिशील मॉडलों पर आधारित होता है जिससे वातावरण के जनरल सर्कुलेशन मॉडल इस्तेमाल किए जाते हैं और जिनके जरिए ग्रीष्म ऋतु में होने वाली मानसून की वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जाता है।
 

आंकड़ों वाले लंबी अवधि के पूर्वानुमान


इस तरीके में आईएसएमआर और पुर्वानुमान कारकों के बीच ऐतिहासिक संबंधों के लिए आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। इन आंकड़ों के मॉडलों ने बेहतर परिणाम दिखाए हैं इसीलिए भारतीय मौसम विभाग में आंकड़ों संबंधी तरीकों का इस्तेमाल लंबी अवधि मासिक और मौसमी वर्षा के पूर्वानुमानों के लिए किया जा रहा है।

वर्तमान में भारतीय मौसम विभाग मासिक (जुलाई, अगस्त एवं सितंबर के लिए), दूसरी छमाही (अगस्त-सितंबर) और पूरे देश के लिए मौसमी वर्षा के पूर्वानुमान तथा चार भौगोलिक क्षेत्रों के लिए पूर्वानुमान किया जा रहा है। ये चार भौगोलिक क्षेत्र हैं- उत्तर पश्चिमी भारत, मध्य भारत, पूर्वोत्तर भारत और दक्षिणी प्रायद्वीप। पूरे देश के लिए मौसमी वर्षा का पूर्वानुमान दो चरणों में किया जाता है। ये चरण हैं अप्रैल और जून। इनमें आठ प्रकार के पूर्वानुमान कारक शामिल किए गए हैं और इन्हें आईएसएमआर के साथ जोड़ा गया है। अप्रैल के पूर्वानुमान के लिए 5 पूर्वानुमान कारक इस्तेमाल किए जाते हैं। जून में जारी अद्यतन पूर्वानुमान के लिए 6 पूर्वानुमान काक इस्तेमाल किए जाते हैं जिनमें से तीन पूर्वानुमान कारक अप्रैल के पूर्वानुमान में भी इस्तेमाल होते हैं।

जुलाई और अगस्त के महीने वे महीने हैं जब दक्षिण पश्चिम मानसून सीजन के दौरान सबसे ज्यादा वर्षा होती है। जो देश में होने वाली मौसमी की 33 प्रतिशत और 29 प्रतिशत के बराबर है। इसकी खरीफ की फसले उगाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हर साल देश में जुलाई और अगस्त के दौरान वर्षा के पूर्वानुमान का एलान किया जाता है जिसमें पूर्वानुमान के विभिन्न कारकों का इस्तेमाल किया जाता है। मानसून सीजन की दूसरी छमाही में होने वाली वर्षा (अगस्त-सितंबर) के लिए पूर्वानुमान और सितंबर के महीने में देश में होने वाली वर्षा का पूर्वानुमान अन्य तरीकों का इस्तेमाल करके किया जाता है।
 

मौसम के पूर्वानुमान क डायनेमिकल मॉडल


पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने एक राष्ट्रीय मानसून मिशन की शुरुआत की है जिसका उद्देश्य अति आधुनिक डायनेमिकल मानसून पूर्वानुमान व्यवस्था विकसित करना है। इसके लिए उष्ण कटिबंधीय मौसम विभाग का भारतीय संस्थान प्रयासों में तालमेल कर रहा है और देश विदेश के विभिन्न अनुसंधान केंद्रों में तालमेल का प्रयास कर रहा है। भारतीय मौसम विभाग ने एक आधुनिक हाई रिजोलुशन रिसर्च वर्जन भी अपनाया है जो आजमाइश के तौरपर दक्षिण पश्चिम मानसून की वर्षा का पूर्वानुमान घोषित करता है। ये पहला मौका है जब दुनिया में कहीं भी इस प्रकार के उपकरण का इस्तेमाल मानसून की वर्षा के पूर्वानुमान में किया जा रहा है। ये मॉडल अब भी आजमाइशी चरण में हैं और जैसे ही इसकी सटीकता वांछित स्तर पर आ जाएगी। इसे सक्रिय कर दिया जाएगा।
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